सोनागाछी की सैर

अरविन्द चतुर्वेद
एक शाम हम तीन दोस्त बड़ी हिम्मत जुटाकर बदनाम बस्ती सोनागाछी की निषिद्ध गली के मुहाने पर खड़े हुए। इरादा था कि गली के इस पार से सेंट्रल एवेन्यू तक निकल कर पूरी गली का  जायजा लिया जाए। इससे पहले हममें से कोई भी इस गली से होकर गुजरा नहीं था।
जबरन चेहरे पर सहजता लाने की कोशिश करते हुए हम गली में ऐसे घुसे, जैसे किसी भी गली या सड़क से आम तौर पर राहगीर गुजरते हैं। सोनागाछी की गली में मेला-सा लगा था। सड़क के दोनों किनारे पर बदन दिखाऊ पोशाकों में, चेहरे पर जरूरत से ज्यादा क्रीम-पावडर पोते अलग-अलग उम्र की किशोरियां, युवतियां और तमाम कोशिश के बावजूद बढ़ती उम्र की निशानियां न छिपा पाती अधेड़ औरतें।
यह जिस्म का बाजार है। ये औरतें-लड़कियां आपस में बातचीत भी कर रही हैं और आने-जाने वालों को तरह-तरह के इशारे भी। सारा माहौल रोशनी में जगमग है। छनती प्याज की पकौडिय़ों और आलूचाप की वजह से समूची गली में जलते तेल और बेसन की गंध समाई हुई है। पकौडिय़ों और पान-सिगरेट की इन छोटी-मोटी दुकानों पर दो-तीन दिनों की बढ़ी हुई दाढ़ी वाले तमाम लोग अड्डे जमाए हुए हैं।
इनमें कुछ लोग इधर-उधर चहलकदमी भी कर रहे हैं। सबकी निगाहें गली में आने-जाने वालों पर टिकी हैं। अजीब चमक है इन निगाहों में। आपसे अगर इनकी नजर मिली तो लगेगा जैसे निगाहों के जरिए आपके भीतर कुछ टटोला जा रहा है।
निगाहें हमारी भी मिलीं और उधर से इशारे भी हुए। पर हम बराबर सहज बने रहने की कोशिश के साथ यूं चलते रहे, जैसे इस दुनिया से हमारा कोई वास्ता नहीं है।
एक गुमटी के सामने सिगरेट सुलगाने के लिए हम खड़े ही हुए थे कि आजू-बाजू में तीन लोग आकर खड़े हो गए। हमारे कुछ बोले बिना ही किसी होटल के बेयरे की तरह उनका मुंहजबानी मेनू पेश हो गया-
- चलेगा, साब?
- बिल्कुल नया, ताजा माल है।
- एक बार देख तो लीजिए, तबियत खुश हो जाएगी।
फिर इसके बाद देश के जितने प्रदेशों के नाम उन्हें मालूम थे, उन सबका उन्होंने जाप कर डाला- बंगाली है, बिहारी है, यूपी है, पंजाबी है, मद्रासी है। नेपाली भी है। जो आपको पसंद हो, साहब।
इतना सुनते ही मेरे दोनों साथियों के चेहरे पर घबराहट उभर आई। अब वे जल्दी से जल्दी इस गली से निकल जाना चाहते थे। मैंने बात जारी रखने के खयाल से पूछा- कितने पैसे लगेंगे?
जवाब मिला- पचास रुपए से लेकर ढाई सौ तक। जैसी चीज, वैसा दाम। इससे ऊपर की भी हैं।
अब उनसे पीछा छुड़ाने के लिए काफी भरोसा दिलाते हुए मुझे कहना पड़ा- ठीक है, मैं अपने साथियों को सेंट्रल एवेन्यू तक छोड़कर अभी आता हूं। इन लोगों को नहीं जाना है।
(जारी)

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मुख्यमंत्री के चरण रज

अरविन्द चतुर्वेद
भक्ति की अपनी एक परंपरा है, जिसमें अपने गुरू या आराध्य के चरण रज माथे से लगाकर कोई भक्त अपने को धन्य समझता है और अपने आराध्य को स्वामी और खुद को उसका दास मानता है। इसी तरह सामंती जमाने से चली आ रही स्वामिभक्ति की परंपरा भी काफी लंबी है और सेवक बेचारे मालिक के पांव-पनही पर अपनी पगड़ी रखकर सेवकाई करते आए हैं। लेकिन यह जो हमारा लोकतंत्र है और जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की सरकार चल रही है, उसकी मुखिया के पांव-पनही की धूल अगर कोई अधिकारी अपनी जेब से रूमाल निकाल कर समेट ले और उस अमूल्य चरण रज को अपनी जेब में संचित करके कृतार्थ हो जाए तो इस कृत्य को किस कोटि में रखा जा सकता है? मुख्यमंत्री मायावती के औरैया दौरे के वक्त पुलिस के बड़े अफसर जो उनके प्रमुख सुरक्षा अधिकारी हैं, उस पद्म सिंह ने यह अदूभुत पराक्रम कर दिखाया है। अगर इसे प्रतीक मानें तो क्या इसमें कोई शक है कि प्रदेश की नौकरशाही बसपा सरकार की चेरी बन गई है। सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी का जो चुनाव चिन्ह हाथी अब गणेश बन गया है, कुछ अधिकारी और पुलिस विभाग के लोग अपना वास्तविक कामकाज छोड़कर इसके मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की वास्तव में गणेश परिक्रमा ही कर रहे हैं और इसका पुरस्कार लाभ ले रहे हैं। ऐसे अधिकारियों का मनोबल क्या उनकी दासवृत्ति के चलते सियासत के पांव के नीचे नहीं कुचला जा रहा है? तभी तो बलात्कार व यौन शोषण और महिला उत्पीड़न के आरोपी विधायकों और मंत्रियों का पुलिस व नागरिक प्रशासन हर संभव ढाल बन जाता है और पीड़िताओं को ही जेल में ठंूस दिया जाता है। गौरतलब है कि गत रविवार को औरैया में विकास कायों का जायजा लेने के लिए मुख्यमंत्री मायावती के अछलदा ब्लाक के नौनीपुर गांव पहुंचने पर उनके सुरक्षा प्रमुख पदूम सिंह ने अपने रूमाल से उनके जूते साफ किए थे। कुछ टेलीविजन चैनलों पर इसकी फुटेज भी दिखाई गई। कोई ताज्जुब नहीं कि स्वामिभक्ति की इस होड़ में इस घटना से शमिंदा होने के बजाय गणेश परिक्रमा को आतुर प्रदेश के दूसरे अफसर प्रेरणा लेने लगें। उत्तर प्रदेश में नौकरशाही क्यों विकास को जमीनी अमली जामा पहनाने के बजाय कागजी घोड़े दौड़ा रही है और कानून-व्यवस्था अराजकता का शिकार है, यह आसानी से समझा जा सकता है। मुख्यमंत्री का चरण रज लेने की यह परंपरा दरअसल पांवपुजाऊ उसी ब्राrाणवाद का नव संस्करण है, जिसकी आलोचना व निंदा हमारे संविधान निर्माता और खुद बसपा के प्रेरणा पुरूष बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर ने की थी। क्या गजब है कि सत्ता के सिंहासन ने समूचे विचार दर्शन को सिर के बल खड़ा करते हुए नव ब्राrाणवाद की नींव ही नहीं डाली है बल्कि भव्य भवन खड़ा कर लिया है। यह लोकतंत्र की मर्यादा और सरकार के आचरण दोनों के लिए वास्तव में शर्मनाक है।
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रात की बात

अरविन्द चतुर्वेद
सुबह होते ही जन समुद्र में शोर की उठती-गिरती लहरों पर किसी बड़े जहाज की तरह हिचकोले खाने लगता है अपना यह कोलकाता महानगर। रात की परछाइयां सुबह के उजाले में कहां छिप जाती हैं, पता ही नहीं चलता। पर शाम होते ही दूधिया रोशनी की झिलमिलाहट के बीच अंधेरे के साए जगह-जगह से उभरने लगते हैं। जैसे-जैसे रात गहराती जाती है, सड़कों पर आवाजाही थमती है, दुकानों के पट गिर जाते हैं और ऊंचे-नीचे मकानों की बंद खिड़कियों के शीशे से किसिम-किसिम की मद्धिम-सी रंगीन रोशनियां भर नजर आती हैं- तब शुरू होता है रात का सफर। दिन के उजाले में छिपी खामोश अंधेरी दुनिया रोज जब रात को बारह का गजर होता है, भरपूर अंगड़ाई लेकर जाग चुकी होती है। अपने कारोबार में, कमाल और करतूत में खामोशी से काम लेती रात की परछाइयों का कद बहुमंजिली इमारतों जितना बड़ा भी हो सकता है- होता है। सन्नाटे का ऐसा आलम कि कोई गहरी चीख भी उठे तो डूबकर रह जाए। दूसरे-तीसरे दिन लोग यह खबर पाते हैं कि पिछली रात फलां इलाके में लावारिश लाश मिली। फलां जगह लूट लिया। फलां जगह ये हुआ, फलां जगह वो हुआ... पिछली रात... वगैरह।
इस सबसे बेखबर रात की स्याह चादर ओढ़े फुटपाथ पर पसरे बेपनाह सपनों की दुनिया है- औरत-मर्द, बूढ़े-जवान-बच्चे, भिखमंगे, बीमार, विक्षिप्त-अर्धविक्षिप्त। जानवर और आदमी के बीच का फर्क बनाए रखने के लिए ही शायद आवारा कुत्ते उनसे हाथ-दो हाथ की दूरी बनाकर सोते हैं। यह सर्वहारा है कोलकाता का, जिसके सामने वाम मोर्चा सरकार का साम्यवाद फुस्स हो जाता है। किसी कड़वी सच्चाई की तरह नंगी, गैरपोशीदा इस फुटपाथी दुनिया में भी लुक-छिपकर कई पोशीदा काम होते रहते हैं। यह और बात है कि कम्यूनिज्म के पिता माक्र्स की सूक्ति दोहरा कर आप संतोष कर लें- नंगे-भूखे आदमी की कोई नैतिकता नहीं होती। पर हकीकत यही है कि धरती पर अगर कहीं नरक है तो हावड़ा पुल के कोलकाता-छोर के नीचे दो तरफ से आनेवाली सड़कों के बीच बने मूत्र सिंचित कूड़े के गोदामनुमा फुटपाथी रैन बसेरों में ही है। ऐसे नरक सियालदह स्टेशन के पुल के इर्द-गिर्द भी है।
महानगर के दोनों रेलवे स्टेशन हावड़ा और सियालदह तेज रोशनी में रतजगा मना रहे हैं। देर से आने या जाने वाली ट्रेनों के मुसाफिरों की आंखों में नींद करवट बदल रही है, कुछ झपकी ले रहे हैं, कुछ लम्बी जम्हाई। कुछ चाय-सिगरेट पीते हुए नींद से मुठभेड़ कर रहे हैं। इन सबसे कुछ गज की दूरी पर या झिलमिल अंधेरे कोने में स्टेशन में- प्लेटफार्म पर बिल्ली आंखें चमक रही हैं- घात लगाए शिकारी आंखें। कब आंख झपके और कब ब्रीफकेस गायब। कोई दिलफेंक मुसाफिर किसी लफड़े में फंस जाए। कुली के भेस में ही कोई गच्चा दे जाए।

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छह-छह पैसा चल कलकत्ता

अरविन्द चतुर्वेद
 तीन गांवों को  खरीद कर कलकत्ता उर्फ कोलकाता की नींव डालने वाले जॉब चार्नाक  ने भी कभी यह कल्पना नहीं की होगी कि  तीन सौ साल बाद यह महानगर इतना बड़ा मायावी, इतना बहुरूपिया बन जाएगा। बंगाली बाबुओं का कलकत्ता आजादी के बाद से ही लगातार सिमटता गया है। महानगर की कुछ खास पुरानी बस्तियों-गलियों में मिट्टी के कुल्हड़ में चाय की चुस्कियों के बीच बीड़ी के कश के साथ खांसी की ठक्-ठक् में सांसें नाप रहा है। यह वही कलकत्ता है, जिसकी ताक-झांक राजकमल चौधरी के उपन्यासों-कहानियों में बखूबी दिखाई देती है। दूसरी ओर, हाय महंगाई-हाय बेकारी में ऊभ-चूभ करता एक दूसरा कलकत्ता भी है जो बेकारों या सरकारी-गैर सरकारी कामगारों के रंग-बिरंगे जुलूस के रूप में सड़कों का यातायात जाम करता दिते हबे-दिते हबे (देना होगा-देना होगा) की रट लगाता शहीद मीनार धर्मतल्ला में धर्मघट (जनसभा) किए हुए है। पता नहीं, राजीव गांधी ने कलकत्ता के किस रूप को देखकर यह विवादास्पद टिप्पणी की थी कि कलकत्ता मरता हुआ शहर है। लेकिन इतना निश्चित ही कहा जा सकता है कि वे जो रूप देख सके होंगे, वह बहुरूपिया महानगर की कोई एक खास शक्ल होगी- मौत का इंतजार करते रोगी की। मगर कलकत्ता मर नहीं सकता। काली का यह शहर रक्तबीज है।
कलकत्ता जैसे महानगर तो अमरबेल की तरह होते हैं, जो और भी ज्यादा-ज्यादा फैलते जाते हैं, भले ही वह जिंदगी छीजती चली जाती है जिससे यह अमरबेल रस चूस कर अमर होती है।
कलकत्ता के जन-समुद्र में आबादी का ज्वार ही ज्वार है। वरना महानगर का तट तोड़कर बाड़ी-गाड़ी-बंगला वालों की साल्टलेक सिटी पैदा न होती।
आज दमदम हवाई अड्डा और उससे भी आगे तक फैली नई आबादी की बस्तियां जन-समुद्र में आबादी के ज्वार का ही नतीजा हैं। आबादी का यह ज्वार महानगर के चौतरफा देखा जा सकता है। मेट्रो रेल के चालू होने के बावजूद बसों में भीड़ कम होने के बजाय कुछ ज्यादा ही हुई है। महानगर में आबादी के उफान का अहसास चौबीस परगना और हावड़ा-हुगली जिलों के उपनगरों में रिहायशी जमीन की कीमत से भी किया  जा सकता है। जो जमीन दस-पंद्रह साल पहले चार-पांच हजार रुपए कट्ठा की दर से आसानी से मिल जाती थी, वही जमीन आज साठ-सत्तर हजार रुपए कट्ठा की कीमत पर भी मुश्किल से मिल पाती है।
मगर कलकत्ता इतना भर ही हो तो फिर कलकत्ता क्या! अमरबेल की तरह फैलते कलकत्ता में अगर जिंदगी की छीजन देखनी हो तो फुटपाथों पर, पुलों के नीचे, सरकारी और पुरानी इमारतों के अनुपयोगी बरामदों और कोनों में छितराई-सिमटी स्थाई-अस्थाई फुटपाथी आबादी को देखिए। फुटपाथ पर और खुले आसमान के नीचे जिंदगी बसर करने वालों की तादाद हजारों में नहीं, लाखों में है। खुले पार्कों और वृक्षों के नीचे रहने वाले पॉलिथिन, बोरे और टाट के टुकड़ों से अपना रैन बसेरा बनाए हुए हैं। कूड़े के ढेर से रद्ïदी बीनने वाले, होटलों के जूठन पर पेट पालने वाले, पैंतीस-चालीस की उम्र होने तक बुढ़ा जानेवाले लोगों की यह जिंदगी भले ही क्षण-भंगुर हो, मगर उनका संसार क्षण-भंगुर नहीं है। तमाम सरकारी फाइलें और योजनाएं मुंह चुराती फिरती हैं इस दुनिया से। यह न तो मुख्यमंत्री कामरेड ज्योति बसु का कलकत्ता था और न मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्ïटाचार्य का कलकत्ता है।
सियालदह में ऐसे ही एक फुटपाथ पर रहने वाले लगभग 35 वर्षीय मुकुंद दास ने बताया- भइया, इसी फुटपाथ पर चोर, गुंडे, पाकेटमार, वैगन-ब्रेकर आदि भी पैदा होते हैं, वे लोग तो किसी के लिए किराए पर या गिरोह में काम करते हैं, इसलिए धर-पकड़ होने पर आसानी से छूट जाते हैं, पर मेरे जैसा यदि कोई पेट के लिए मजबूर होकर कुछ करता है तो पिटाई अलग, जेल में ले जाकर ठूंस देते हैं।
इसी तरह सियालदह इलाके में ही फुटपाथ पर, मगर दिन के उजाले में नहीं, रात के अंधेरे में रहने वाली अस्थाई फुटपाथी लड़कियां शांति, विमला और वंदना ने काफी झिझक और ना-नुकुर के बाद यह कबूल किया कि वे देह का धंधा करती हैं। बहूबाजार में सड़क के नुक्कड़ पर वे शाम को खड़ी हो जाती हैं तो रातभर में सौ-डेढ़ सौ रुपए या कभी-कभी इससे ज्यादा भी कमा लेती हैं। कारण वही गरीबी, छोटे-छोटे भाई-बहन और बूढ़े-बीमार मां-बाप। चौबीस परगना जिले के देहात की हैं ये लड़कियां। पुलिस की वसूली और वजह-बेवजह तंग किए जाने की शिकायत इन्हें भी है। महानगर के जीवन की छीजन की यह आखिरी परत है। मगर एक परत और भी है, जिसे सोनागाछी, मुंशीगंज, बहूबाजार आदि देह व्यापार की बड़ी मंडियों के रूप में देखा जा सकता है।
बहरहाल, यह तो अकेले कोलकाता की ही नहीं, मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों की भी साझा त्रासदी है। मगर कोलकाता की सर्वाधिक मार्मिक और कारुणिक तसवीर तो वह है, जो उत्तर प्रदेश और बिहार की तरफ से होकर आनेवाली रेलगाडिय़ों की कोख से पैदा होती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, इलाहाबाद, जौनपुर, आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर, गोरखपुर और बिहार के आरा, छपरा, गया, सिवान, पटना, भागलपुर आदि जिलों के गांवों-कस्बों से कोलकाता कमाने आए लाखों परदेसियों की व्यथा-कथा इन जिलों के देहात में लोकगीत बनकर जैसे औरतों के कंठहार बन गई है। कोलकाता महानगर अपने परदेसी की प्रतीक्षा में दिन गुजारने वाली औरतों के लिए एक टीस है- किसी सौत से कम नहीं है। अकेले महानगर में रहने वाले भोजपुरी भाषा-भाषियों की तादाद पंद्रह लाख से ऊपर पहुंचती है। उत्तर प्रदेश और बिहार के जातियों की बेड़ी में जकड़े इन सामंती जिलों के नौजवान-अधेड़ और बूढ़े हर साल सूखा और बाढ़ की मार खाकर ट्रेनों में टिड्डियों के दल की भांति चढ़ते हैं और हावड़ा का पुल पार करके महानगर की मायावी गुफा में समा जाते हैं।
अच्छा कमाएंगे, चार पैसा जुटाएंगे और फिर घर वापस लौट जाएंगे- का सपना लेकर आनेवालों के सपने रास्ते में ही ट्रेन की भीड़भाड़ और धक्कामुक्की में जो दबना-कुचलना शुरू होते हैं तो महानगर में पहुंचते-पहुंचते लहूलुहान हो जाते हैं। कठिन मेहनत-मशक्कत से सालभर में कमाकर, कलेजे पर पत्थर रखे, पेट काटे किसी भोजपुरी मजदूर की जेब वापसी में अगर मोकामा पैसेंजर में कट जाए और वह बुक्का फाड़कर माई गे-बाबू गे की दुहाई देता हुआ रो पड़े तो उस महाकरुणा की गिरफ्त में आने से बच पाना किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए मुश्किल हो जाता है।
कोलकाता के मोटिया मजदूर, होटल-रेस्तराओं में पानी भरते, बर्तन धोते, झालमुड़ी बेचते, पार्कों में चलती-फिरती अंगीठियों में गरम चाय बेचते, खोमचा लगाते, ठेला खींचते, पीठ पर माल ढोते-माल उतारते और हावड़ा-सियालदह के प्लेटफार्म पर आधे बांह की लाल कमीज पहने कुलियों के रूप में यूपी-बिहार के ये भोजपुरी लोग मिल जाएंगे। उजड्ïड-गंवार की हिकारत झेलकर, कनपटी का पसीना पोंछ मुस्करा देनेवाले इस भोजपुरी बिहारी को पता नहीं कब लागा झुलनिया का धक्का, बलम कलकत्ता निकल गए। इन लाखों भोजपुरी भाषियों के लिए रवींद्र सदन, अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स, सिनेमा का सरकारी पे्रक्षागृह नंदन आदि कोई अर्थ नहीं रखते। रामऔतार उपाध्याय नामक तोता-भविष्य वाचक एक ज्योतिषी, जो चौरंगी के फुटपाथ पर बरसों से बैठते आ रहे हैं, बताते हैं कि वे पहली बार जब कलकत्ता आए थे तब उनकी उम्र पंद्रह साल थी, आज वे छप्पन साल के हैं। बीस साल पहले उनकी कमाई अच्छी थी, मगर अब दिनभर में पचास रुपए भी मिल जाएं तो गनीमत है। फिर भी कहते हैं- जब सारी उमर इसी कलकत्ते में कट गई तो अब अंत में कहां जाएंगे, बचवा?
पता नहीं, ऐसे कितने रामऔतार इस कोलकाता में होंगे, जो भिखारी ठाकुर के बिदेसिया का सच ढो रहे हैं-
छह रे महीना कहि के गइले कलकतवा,
बीति गइले बारह बरिस रे बिदेसिया...
अब कोयला इंजन वाली ट्रेन का जमाना तो रहा नहीं और न छह पैसे का एक आनेवाला, लेकिन उसी जमाने से यूपी-बिहार के लोग परदेसी बनकर कोलकाता खाने-कमाने आते रहे हैं। यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। उनको ढोनेवाले इंजन की छुक-छुक्, छक्-छक् भोजपुरी इलाकों के देहात में बच्चों के रेल के खेल का छह-छह पैसा चल कलकत्ता बन गया है। देखिए कि आदमी अपने विषाद को भी कैसे विनोद में बदल देता है!
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क्या हमाम में सभी नंगे हैं-इसी मुहावरे से काम चलाते रहेंगे?

अरविन्द चतुर्वेद :
संसद से सड़क तक भ्रष्टाचार-त्रिकोण की ही गूंज है। इस गूंज में बिहार विधान सभा चुनाव के आखिरी चरण की चर्चा समेत तमाम बड़ी घटनाएं तक धुंध और धुंधलके में ढक गइं। मसलन, असम में नए सिरे से बोडो उग्रवादियों की हिंसा भी लोगों और मीडिया की आंखों से ओझल होकर रह गई, जिसके शिकार हिन्दीभाषी खासकर बिहारी लोग हुए हैं और अब वहां से दहशत के मारे पलायन के बारे में सोच रहे हैं। भ्रष्टाचार-त्रिकोण यानी आदर्श सोसायटी-कामनवेल्थ खेल-2जी स्पेक्ट्रम ने पांच दिनों से संसद को लगभग ठप्प करके रखा है। मंत्री पद से हटने या हटाए जाने के बावजूद पूर्व केंद्रीय संचार मंत्री ए. राजा की जान सस्ते में छूटती नजर नहीं आ रही, बल्कि सच कहिए तो राजा की कारगुजारी को लेकर केंद्र की संप्रग सरकार और खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जान सांसत में पड़ी हुई है। विपक्ष इन भ्रष्टाचारों की संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी से जांच कराए जाने पर अड़ा हुआ है। लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता और केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की संसद की कार्यवाही चलने देने के लिए विपक्षी दलों से मिलकर कोई राह निकालने की कोशिश भी फिलहाल नाकाम हुई है। पहले तो मुखर्जी ने कड़ा रूख अपनाते हुए यह कहा कि कैग की रिपोर्ट संसद की लोकलेखा समिति को सौंप दी जाएगी और जेपीसी की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन विपक्षी दलों के प्रतिनिधि नेताओं से मुलाकात के बाद उनके रूख को देखते हुए उन्होंने कहा है कि कोई रास्ता निकालने के लिए वे प्रधानमंत्री से बात करके गुरूवार से पहले सरकार का पक्ष सामने रखेंगे। फिलहाल, इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने भी 2जी स्पेक्ट्रम मामले पर सुब्रह्मण्यम स्वामी की याचिका की सुनवाई करते हुए इस बात पर हैरानी जताई है कि इस मामले में स्वामी के लिखे शिकायती पत्र का प्रधानमंत्री कार्यालय ने कोई संज्ञान क्यों नहीं लिया और राजा के खिलाफ कार्रवाई करने में इतनी देर क्यों की गई। इस मामले में प्रधानमंत्री की तरफ से कोई जवाब न देकर खामोशी बरते जाने पर भी सुप्रीम कोर्ट को हैरानी हुई है। दूसरी तरफ देखें तो गठबंधन की मजबूरी और दबाव के चलते राजा के खिलाफ कदम उठाने में हीला-हवाली और देरी की वजह से संप्रग सरकार की हालत गुनाहे-बेलज्जत सरीखी साबित हुई है और विपक्ष इसे देर आयद-दुरूस्त आयद मानने को तैयार नहीं है। दरअसल, सत्ता से इंधन पाकर होनेवाला भ्रष्टाचार, चाहे किन्हीं सरकारों के कार्यकाल में हो, देश के जनमानस को इतना उद्वेलित और हताश कर देता है कि लोग नाउम्मीद होकर इसे नियति मान लेते हैं। यह भी एक कारण है कि जब एक तरफ से भ्रष्टाचार की बात उठती है तो जवाबी तौर पर दूसरी तरफ के भ्रष्टाचार की चर्चा छेड़ दी जाती है। लेकिन सवाल तो यह है कि क्या यह कहने से कि मेरी ही नहीं, तेरी कमीज भी गंदी है, सफाई हो सकती है? क्या हमाम में सभी नंगे हैं- हम इसी मुहावरे से काम चलाते रहेंगे?
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क्रिकेट के अपराधी

अरविन्द चतुर्वेद : 
क्रिकेट के खेल में अब चूंकि पैसा बहुत है इसीलिए इस खेल के इर्दगिर्द लालच, तिकड़म और अपराध का अदृश्य ताना-बाना बुने जाने की आशंका भी बराबर बनी रहती है। एक जमाने में जेंटलमैन गेम कहे जाने वाले क्रिकेट की कहानियां और खिलाड़ियों की शानदार उपलब्धियों के किस्से आज भी खेल-प्रेमियों को रोमांचित करते ही हैं, लेकिन पिछले कुछ बरसों से इस खेल से ऐसी कलंक कथाएं जुड़ती जा रही हैं, जो क्रिकेट की किरकिरी कराने के साथ ही बहुत कड़वा एहसास कराती हैं। कहीं भी क्रिकेट मैच हो, जीत-हार को लेकर सटूटेबाजी के किस्से आम हो चले हैं और अब तो चार कदम आगे बढ़कर मैच फिक्सिंग तक की तिकड़में भी सामने आने लगी हैं। याद होगा कि कुछ साल पहले मैच फिक्सिंग के कलंक में ही भारतीय क्रिकेट के कप्तान रहे मुहम्मद अजहरूदूदीन के साथ-साथ होनहार खिलाड़ी अजय जडेजा का करियर चौपट हो गया और दक्षिण अफ्रीका के कप्तान रहे हैंसी क्रोनिए को फिक्सिंग की ग्लानि ने जीते-जी मार दिया था। इसी तरह बड़े धूमधाम से शुरू हुए शारजाह क्रिकेट टूर्नामेंट की इहलीला भी कुछेक बरसों में सटूटेबाजी और फिक्सिंग की बेईमानियों में खत्म हो गई। गनीमत है कि मैच फिक्सिंग के जाल में फंसकर अभी तक किसी क्रिकेटर को अपनी जान से हाथ नहीं धोना पड़ा है, लेकिन इधर पाकिस्तानी क्रिकेट को लेकर जैसे दुष्चक्र और भयावह षडूयंत्र सामने आ रहे हैं, उन्हें देखते हुए यह आशंका होती है कि कहीं किसी खिलाड़ी के साथ कोई हादसा न हो जाए। ताजा मामला पाकिस्तानी टीम के बिल्कुल युवा विकेटकीपर जुल्करनैन हैदर का सामने आया है, जिसे टीम में आए जुमा-जुमा तीन महीने हुए थे कि जान गंवाने के डर से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह देना पड़ा है। यह अपने आप में हैरत भरी बात है कि दुबई में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेली जा रही oृंखला के मैच में फिल्ड में उतरने के ऐन एक दिन पहले डरा हुआ जुल्करनैन हैदर अपने साथी खिलाड़ियों को बिना कुछ बताए ही होटल से निकल लिया। जिस हालत में हैदर चुपके से निकला, वह स्वयं ही इस बात की ओर इशारा है कि अपने साथी खिलाड़ियों पर भी उसे भरोसा नहीं रह गया था। हैदर को मैच फिक्स करने से इंकार करने पर जान मारने की मिल रही धमकी के कारण टीम छोड़कर भागना पड़ा। पाकिस्तान के लिए एक टेस्ट, चार एकदिवसीय और तीन टूवेंटी-20 अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने वाले इस 24 वर्षीय विकेटकीपर ने अब इंग्लैंड में राजनीतिक शरण की गुहार लगाई है। हैदर ने लंदन से एक पाकिस्तानी न्यूज चैनल को यह भी बताया है कि उसके परिवार को अब भी धमकियां मिल रही हैं और इसलिए संन्यास लेने का उसने फैसला किया है, क्योंकि उस पर बहुत दबाव है, जिसे वह झेल नहीं पा रहा है। हैदर के इस तरह टीम को छोड़कर जाने से आईसीसी भी परेशान है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का संचालन करने वाली इस संस्था का मानना है कि पाकिस्तान के इस विकेटकीपर को सटूटेबाजी के जाल से जुड़े अपराधियों ने निशाना बनाया है। होनहार युवा क्रिकेटर हैदर के साथ हुए इस वाकए से आईसीसी समेत समूचे क्रिकेट जगत का चिंतित होना स्वाभाविक है। आईसीसी ने कहा भी है कि यह काफी घिनौना है कि सटूटेबाजी से जुड़े अपराधी पहले भी खिलाड़ियों के परिवार को निशाना बना चुके हैं। हैरानी तो इस बात की है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी खुद पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का अध्यक्ष होने के बावजूद अपने एक प्रतिभाशाली युवा क्रिकेटर और उसके परिवार को आश्वस्त करने के बजाय पीसीबी के पक्ष में लीपापोती करने में लगे हुए हैं। जबकि पिछले कई मामलों की तरह हैदर के मामले में भी मैच फिक्सिंग से जुड़े पाकिस्तानी अंडरवल्र्ड और बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई के नापाक गठजोड़ का नाम लिया जा रहा है। समझा जा सकता है कि पैसे के बेरोकटोक प्रवाह वाले क्रिकेट को बंधक बनाने के लिए अपराधी किस हद तक जा सकते हैं।
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ओबामा के आगे-पीछे

अरविंद चतुर्वेद :
जैसे-जैसे अमेरिका के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत-यात्रा का दिन यानी छह नवम्बर करीब आता जा रहा है, उत्सुकता और अधीरता दोनों बढ़ती जा रही है। जिस तरह इस यात्रा के पहले ही इसकी अहमियत और हासिल को लेकर अपेक्षाओं की अनुमानपरक मीमांसा हो रही है, उसके अनुरूप अगर ओबामा के सफर का फलितार्थ निकलता है तो इसमें कोई दो राय नहीं कि एशियाई मुल्कों, खासकर दक्षिण एशिया में भारत को एक नई चमक के साथ ठोस अग्रगामिता मिलेगी। जैसाकि खुद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इस यात्रा के संदर्भ में संकेत दिया है कि भारत और अमेरिका दोनों ही आपसी सम्बंधों में गुणात्मक बदलाव लाना चाहते हैं। जापान, मलेशिया और वियतनाम के हफ्तेभर के सफर से वापसी के दौरान मनमोहन सिंह ने कहा है कि भारत और अमेरिका के पारस्परिक सम्बंध एक नए चरण में प्रवेश कर गए हैं और दोनों देशों के बीच सौहार्द व समझ कायम है। प्रधानमंत्री ने इस बात की भी ताईद की है दोनों देशों के बीच विभिन्न मामलों पर रणनीतिक साझेदारी है और दोनों देशों की नजर ऐसे उन सभी क्षेत्रों व पहलुओं पर मिलकर यानी कि तालमेल के साथ काम करने की है, जो दोनों देशों के हितों से सम्बंध रखते हैं। बहरहाल, यह तो अमेरिकी राष्ट्रपति की भारत-यात्रा का एक पहलू है, लेकिन दूसरा पहलू चुनौतियां पेश करने वाला भी है, जिसे कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस यात्रा की चमक को धुंधलाने की कोशिश करने के मकसद से कुछ चुनौतियां देर-सबेर जरूर दरपेश की जाएंगी, जिन पर दोनों ही देशों को सतर्क निगाह रखनी होगी। उदाहरण के लिए, यह अचानक या आकस्मिक नहीं है कि कश्मीर के अलगाववादी तथाकथित आजादी की मांग के लिए घाटी में अशांति और उपद्रव के ताप को लगातार ऊंचा और सरगर्म बनाए रखना चाहते हैं और उनकी मदद में इंधन के तौर पर पाकिस्तानी फौज सीजफायर का उल्लंघन करते हुए चेतावनी दिए जाने के बावजूद बीच-बीच में गोलाबारी कर चुका है। यही नहीं, अपनी धरती का आतंकवादियों के लिए इस्तेमाल न होने देने का वायदा करने के बावजूद पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मुजफ्फराबाद में लश्करे-तैयबा समेत विभिन्न नामधारी आतंकी संगठनों के लोग दो दिन पहले ही हजारों की भीड़वाली रैली में खुलेआम शिरकत कर चुके हैं। उधर दूसरी ओर ओबामा के भारत आने की तारीख से चंद रोज पहले यमन से शिकागो के दो यहूदी प्रार्थनागृहों के पते पर भेजे जा रहे दो पार्सल बमों का पता चलने के बाद अमेरिका समेत यूरोपीय देशों के खिलाफ अलकायदा की नई हमलावर मुहिम की आशंका सामने आई है। इस मामले के रहस्योदूघाटन के संदर्भ में खुद अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने कुबूल किया है कि इस समय अमेरिका ठोस आतंकी धमकी का सामना कर रहा है। कुल मिलाकर ये चंद घटनाएं ही बताती हैं कि ओबामा की भारत-यात्रा के आगे-पीछे ऐसी नकारात्मक गतिविधियों का सिलसिला चलाकर चुनौतियां पेश करने का इरादा रखने वालों की तत्परता बढ़ सकती है। लेकिन, इस सबके बावजूद मोटे तौर पर जो बातें बहुत साफ हैं, वह यह कि क्लिंटन और बुश के जमाने की तुलना में ओबामा के अमेरिका का रूख भारत के प्रति बहुत सकारात्मक हुआ है और उसकी तमाम गलतफहमियां भी दूर हुई हैं। फिर इस दौरान भारत ने भी अपने बलबूते विकास की कई मंजिलें तय की हैं। वास्तविकता तो यह है कि समकालीन विश्व में भारत को ही नहीं अमेरिका को भी भारत से बेहतर तालमेल बनाकर चलने की जरूरत है।
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