भ्रष्टाचार के भवन में

अरविन्द चतुर्वेद :
क्या पूरा देश ही भ्रष्टाचार के भवन में बदलता जा रहा है? छोटे-मोटे भ्रष्टाचार की तो बात ही छोड़ दीजिए, समय-समय पर इतने बड़े-बड़े भ्रटाचारों का भेद खुलता है, जिनकी जांच और चर्चा कई महीनों तक छाई रहती है। दिलचस्प यह भी है कि एक घोटाले की चर्चा तब मद्धिम पड़ती है, जब उसको पीछे ठेलकर कोई नया घोटाला सीना ताने सामने आ खड़ा होता है। अब जैसे सत्यम वाले रामलिंगा राजू की चर्चा कोई नहीं करता, क्योंकि उनके घोटाले को पीछे धकेल कर झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा का हजारों करोड़ का घोटाला सामने आ गया। इस घोटाले की जांच अभी भी चल रही है, लेकिन इसी बीच मधु कोड़ा की चर्चा को पीछे धकेलकर कामनवेल्थ खेलों के आयोजन और उससे सम्बंधित निर्माण कायों में हुआ महा घोटाला सामने आ गया। खेल खतम हुए तो अब खेलों के पीछे हुए खेल की जांच हो रही है। सरकार की पांच-पांच एजेंसियां अंधों के हाथी की तरह प्रसिद्ध दार्शनिक सत्य की तरह इस महा भ्रष्टाचार की जांच में लगी हैं। अब देखना यह है कि कौन पूंछ को सत्य बताता है, कौन कान को और कौन सूंड़ को। बहरहाल, भ्रष्टाचार का भवन बन चुके देश में राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान हुई वित्तीय अनियमितताओं और घोटालों की जांच के सिलसिले में तीन सौ आयकर अधिकारियों ने देशभर में एक साथ 50 स्थानों पर छापे मारे हैं। ये छापे खेलों से सम्बंधित चार ठीकेदार कंपनियोें के दफ्तरों-परिसरों में मारे गए हैं। केंद्रीय सतर्कता आयोग यानी सीवीसी राष्ट्रमंडल खेलों के एक शीर्ष अधिकारी द्वारा दो सौ करोड़ की धांधली से संबंधित शिकायत की जांच कर रहा है। यह वही अधिकारी हैं, जिन्हें आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी का करीबी सहयोगी माना जाता है। गौरतलब है कि राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ी अलग-अलग निर्माण परियोजनाओं में आर्थिक अनियमितताओं से संबंधित कुल 22 शिकायतों की जांच सीवीसी कर रहा है। भ्रष्टाचार की यह एक अकेली चादर ही कितनी देशव्यापी है, इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि छापेमारी राजधानी दिल्ली समेत बंगलुरू, मुंबई, जमशेदपुर, कोलकाता में तो की ही गई है, अकेले राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में करीब 50 स्थानों पर मारकर बड़ी संख्या में खेलों से सम्बंधित दस्तावेज जब्त किए गए हैं। क्या दिलचस्प बात है कि आयकर विभाग की जांच के घेरे में आई कंपनियों को इन अंतरराष्ट्रीय खेलों के बाबत राजधानी दिल्ली के सौंदर्यीकरण और स्ट्रीट लैम्पों को बदलने आदि का ठेका दिया गया था, लेकिन इन लोगों ने सौंदर्यीकरण के बहाने कालिख पोत दिया और स्ट्रीट लैम्पों के उजाले की आड़ में अंधेरगर्दी मचाकर रख दी। देश वासियों की गाढ़ी कमाई के पैसे से देश की इज्जत और शान की खातिर कराए गए राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी के बहाने लूट-खसोट मचाने वालों को क्या देशभक्त कहा जा सकता है? असल में भ्रष्टाचारी पैसे के पिशाच होते हैं, जो सिर्फ देश और देशवासियों का खून चूसना जानते हैं। चूंकि इस महा भ्रष्टाचार की जांच प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई, केंद्रीय सतर्कता आयोग के साथ ही प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त विशेेष समिति भी कर रही है, इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बहुस्तरीय जांच में उन सभी कसूरवारों की गरदन फंसेगी, जो भ्रष्टाचार के समंदर में मगरमच्छ की तरह डुबकी लगाते आए हैं। जांच एजेंसियों के साथ ही सरकार से भी आम नागरिक की यही अपेक्षा है कि इस महाघोटाले में दूध का दूध और पानी का पानी होने तक पूरी मुस्तैदी बनाए रखे। ऐसा न हो कि चार-छह महीने में कोई नया घोटालेबाज भ्रष्टाचारी सामने आ जाए और कामनवेल्थ खेलों में हुए घोटाले को धकेलकर पीछे कर दे। वैसे भी अगर कामनवेल्थ खेल देश की प्रतिष्ठा से जुड़े हुए थे, जैसा कि सरकार ने कहा था तो यह भी सरकार की ही जवाबदेही है कि इसके आयोजन में गड़बड़ियां और वित्तीय घपलेबाजी करने वालों की प्रामाणिक तौर पर पहचान करके उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दिलाए , चाहे वे कितने भी ऊंचे रसूख वाले लोग हों। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर कराई जा रही बहुस्तरीय जांच की साख का मामला है। यह भ्रष्टाचार एक देश विरोधी कार्य है, जिसमें लिप्त लोगों को सजा मिलनी ही चाहिए।
read more...

ऊँट के मुंह में जीरा

अरविन्द चतुर्वेद : 
हालांकि किसान ऊंट नहीं हैं, वे देश के अन्नदाता हैं और उन्हीं की बदौलत यह देश आज भी बहुतायत में कृषि प्रधान बना हुआ है। मगर यह किसानों के साथ-साथ देश का भी दुर्भाग्य कहेंगे कि बात-बात पर किसानों को ऊंट की तरह सरकार का मुंह देखना पड़ता है। सरकार खेती के हर सीजन के पहले जरूरी उपज के प्रोत्साहन के लिए हर साल न्यूनतम समर्थन मूल्य का एलान किया करती है और मानना चाहिए कि किसान रवी की खेती की तैयारी करें, उसके पहले गेहूं व सरसों समेत दालों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की सरकार ने घोषणा की है। लेकिन सरकार ने गेहूं और सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य महज 20 रूपए बढ़ाकर ऊंट के मुंह में जीरा वाली कहावत को चरितार्थ कर दिया है। खेती के साल-दर-साल बढ़ते खर्च के आगे न्यूनतम समर्थन मूल्य की यह बढ़त किसानों के जले पर नमक छिड़कने वाली है और उपज के लिए प्रोत्साहित करने के बजाय यह किसानों को हतोत्साहित ही करेगी। क्या सरकार ने गेहूं का समर्थन मूल्य इसलिए मामूली तौर पर बढ़ाया है कि उसके गोदामों में गेहूं रखने की जगह नहीं है और पहले से जो स्टाक पड़ा हुआ है, वह सड़कर सरकार की भदूद पिटवा चुका है? कितना शर्मनाक है कि एक तरफ देश में भुखमरी व कुपोषण का रोना है और दूसरी ओर सरकार किसानों को प्रोत्साहित करने के बजाय हतोत्साहित करने पर आमादा है। गौरतलब है कि प्रति क्विंटल 1. 8 प्रतिशत की मामूली बढ़ोतरी के साथ गेहूं का समर्थन मूल्य जहां सरकार ने 1120 रूपए प्रति क्विंटल किए हंै, वहीं उसने केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन में औसतन दस प्रतिशत की बढ़ोतरी की थी। यानी खरीदने वालों की जेब भारी हो, भले ही किसानों का हाल ठन ठन गोपाल हो। देश में चूंकि दालों का उत्पादन जरूरत भर नहीं हो पाता, इसलिए दालों के उत्पादन को प्रोत्साहन देने के मकसद से सरकार ने मसूर और चने की दालों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 380 रूपए प्रति क्विंटल तक की बढ़ोतरी की है। न्यूनतम समर्थन मूल्य वह कीमत होती है, जो सरकार किसानों से उनकी उपज खरीदने के लिए भुगतान करती है। लेकिन सरकारी खरीद के लिए भी क्रय केंद्रों पर किसानों को कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, यह बेचारा किसान ही जानता है। उसे अपनी उपज बेचने के एवज में जो चेक मिलते हैं, वे भी कई बार महीनों बाद कमीशन ले-देकर भुनाए जा पाते हैं। ऐसी लचर और धांधली पूर्ण व्यवस्था में गेहूं और सरसों के समर्थन मूल्य में महज पौने दो फीसदी प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी वाकई जले पर नमक छिड़कने वाली ही कही जाएगी। जहां तक दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन का मामला है तो अपेक्षाकृत कुछ बेहतर समर्थन मूल्य जरूर घोषित किए गए हैं, लेकिन एक तो दालों वाली फसलें समान रूप से हर जगह पैदा नहीं हो पातीं, दूसरे कई बार इनका उत्पादन प्रतिकूल मौसम की मार का शिकार होकर किसानों की कमर तोड़ देता है। मसूर दाल का समर्थन मूल्य 380 रूपए और चने की दाल का 340 रूपए बढ़ाया गया है। सरकार ने इस साल दालों के उत्पादन को प्रोत्साहन देने और आयात पर निर्भरता घटाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में यह इजाफा किया है। असल में भारत दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक देश तो है, फिर भी घरेलू मांग को पूरा करने के लिए सालाना 35 से 40 लाख टन दालों का आयात करना पड़ता है। तिलहन उत्पादों का भी समर्थन मूल्य कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की सिफारिशों के मदूदेनजर कुछ बढ़ा दिया गया है। लेकिन असल सवाल तो यह है कि जब सरकार और प्रधानमंत्री खुद कह चुके हैं कि देश को एक और हरित क्रांति की जरूरत है तो क्या उसकी जरूरतें इसी तरह के समर्थन मूल्यों के ऐलान से पूरी हो जाएंगी। सच्चाई तो यह है कि किसान हितैषी होने की बातें तो खूब दोहराई जाती हैं, लेकिन कृषि और किसान के समग्र विकास के लिए प्रभावी तौर पर सरकारें कुछ खास कर नहीं रही हैं- केंद्र हो या राज्य सरकारें।
read more...

विकास की चुभन

अरविन्द चतुर्वेद :
विकास के नाम पर अपने देश में विकसित पूंजीवादी देशों, खासकर अमेरिकी उतरन को जिस तरह आदर्श मानकर अंधाधुंध अपनाते जाने की आदत है और इसके जो नतीजे सामने आ रहे हैं, लगता है कि अब वे खुद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को भी चुभने लगे हैं। तभी तो हैदराबाद में एकेडमी ऑफ साइंसेज फार द डेवलपिंग वल्र्ड की वाष्रिक बैठक का उदूघाटन करते हुए उन्होंने कहा है कि औद्योगिक राष्ट्रों द्वारा अपनाए गए विकास मॉडल विकासशील देशों के अस्तित्व के लिए खतरनाक हो सकते हैं और जरूरत इस बात की है कि इनसे सतर्क रहते हुए विकास के लिए प्रगति के अधिक स्थाई उपाय खोजे जाएं। यही नहीं, प्रधानमंत्री ने भारत जैसे विकासशील देश की पारिस्थितिकी का खास तौर पर जिक्र किया और कहा कि हम दरअसल उष्णकटिबंधीय इलाकों में पैदा होनेवाली बीमारियों से लड़ने के साथ-साथ परम्परागत खेती-बारी में बदलाव और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने जैसी साझा चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। असल में हमारी सरकारें भी और तमाम बड़े-छोटे गैर-सरकारी औद्योगिक कम्पनियां भी तेजी से तरक्की करने और कम खर्च में अधिक से अधिक उत्पादन व मुनाफा कमाने के चक्कर में ऐसी हड़बड़ी का विकासवादी रास्ता अपनाती हैं, जो स्थाई भी नहीं होता और प्रकृति-पर्यावरण के तमाम अंगों समेत सामान्य जन के जीवन में भी मुश्किलें पैदा करता है। सबको पता है कि स्थानीय पारिस्थितिकीय जरूरतों और सीमाओं को नजरअंदाज करते हुए हम जिन विकास परियोजनाओं को अबतक अमलीजामा पहनाते आए हैं, उन्होंने इस हद तक पर्यावरणीय असंतुलन पैदा किया है कि आए दिन हमें प्राकृतिक विभीषिकाओं व आपदाओं का शिकार होना पड़ता है। इनसे होनेवाले व्यापक नुकसान की भरपाई क्या दस औद्योगिक परियोजनाएं भी मिलकर पूरी कर सकती हैं? उदाहरण के लिए अगर हम गंगा और यमुना सरीखी दो नदियों की ओर ही देखें तो औद्योगिक और तटवर्ती शहरी विकास का कचरा ढोते-ढोते ये इस कदर प्रदूषित हो चुकी हैं कि अबतक अरबों रूपए खर्च करने के बावजूद इन्हें स्वच्छ नहीं बनाया जा सका है। बिना सोचे-बिचारे अंधाधुंध विकास के कारण जंगलों और पहाड़ों का भी हुआ है। दरअसल, नदियां-पहाड़ और जंगल प्रकृति-पर्यावरण व जीवन की सुरक्षा के ऐसे गार्ड हैं, जिनकी बर्बादी की कीमत पर किया जानेवाला विकास हमेशा घाटे का सौदा ही साबित होता है। कौन नहीं जानता कि न तो हम नदियां बना सकते हैं और न पहाड़, मगर इसके बावजूद विकास का वही मॉडल अपनाए हुए हैं, जो सबसे ज्यादा चोट इन्हीं चीजों को पहुंचाता आ रहा है। नतीजा यह है कि मौजूदा विकास मॉडल एक बड़ी आबादी के जीवन को तहस-नहस करता आ रहा है, उन्हें विस्थापित करता आ रहा है और इसीलिए ऐसे विकास को बहुतेरे लोग स्वाभाविक ही सत्यानाशी कहते हैं। अब अगर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने वैश्विक अनुभव और अभिज्ञता के हवाले से कहा है कि हमने देखा है कि किस तरह औद्योेगिक राष्ट्रों द्वारा अपनाए गए विकास के रास्ते हमारे अस्तित्व और जिंदगी के लिए खतरनाक हैं, तो शायद हम सतर्क होकर अपने लिए विकास का उपयुक्त और उपादेय मॉडल अपनाएं। क्योंकि अभी भी कोई बहुत देर नहीं हुई है। अगर हम ऐसा कोई रास्ता खोज निकालते हैं जो बेवजह हमारी क्षमताओं पर दबाव नहीं डालता और विकास की मूलभूत चुनौतियों से निपटने में सक्षम होता है तो उसका हम अपने खुद के हित में उपयोग कर सकेंगे। अच्छी बात यही है कि भारत समेत दूसरे विकासशील देश भी इस दिशा में सचेत हुए हैं और बेहतर फ्रेमवर्क के तहत समुद्री अनुसंधान, कृषि, जलवायु परिवर्तन और नैनो तकनीक सहित विज्ञान व तकनीक में सामूहिक गतिविधियों की oृंखला चल निकली है। अंधानुकरण के बजाय अपना रास्ता हमेशा बेहतर होता है।
read more...

गंगा प्रदूषकों पर चाबुक

अरविन्द चतुर्वेद :
उत्तर भारत की जीवन रेखा और तकरीबन 45 करोड़ भारतीयों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अन्न-जल दे-दिलाकर उनका भरण-पोषण करने वाली गंगा नदी की लगातार बिगड़ती सेहत दुरूस्त करना केंद्र से लेकर सम्बंधित राज्य सरकारों के लिए कई दशकों से लगातार एक चुनौती है। पौराणिक काल से लेकर आज की उत्तर आधुनिक इक्कीसवीं सदी में भी गंगा का धार्मिक व सांस्कृतिक प्रवाह भारतीय जनमानस में अविरल भले ही हो, लेकिन भौतिक सच्चाई तो यही है कि बुरी तरह प्रदूषित इस पवित्र नदी का पानी आचमन लायक नहीं रह गया है। ैकहीं-कहीं नदी का पानी इस कदर प्रदूषित हो चुका है कि आदमी नहाए तो उसे चर्मरोग हो जाए। प्रदूषित गंगा नदी अपने जल-जीवों को भी जीवन दे पाने में कई स्थानों पर फेल साबित हुई है। यह ऐसी कड़वी सच्चाई है, जो गंगा को देवी और मां मानने वाले सरल हृदय धार्मिक लोगों को भी कष्ट पहुंचाती है और प्रकृति व पर्यावरण से प्रेम करने वाले आधुनिक, पढ़े-लिखे लोगों को भी। लेकिन जिस तरह कहीं न कहीं हमारे जंगलात के महकमे में एक बेईमानी है कि वनों की सुरक्षा और संवर्द्धन पर हर साल करोड़ों रूपए उड़ाने के बावजूद जंगल खत्म होते गए, कुछ उसी तरह गंगा समेत कई दूसरी नदियां भी प्रदूषण नियंत्रण की तमाम हवाई कसरत के बावजूद अपना प्राकृतिक स्वास्थ्य हासिल नहीं कर पाइं। केवल गंगा और यमुना की ही बात की जाए तो अबतक एक्शन प्लान के नाम पर हजारों करोड़ रूपए पानी में बहाए जा चुके हैं, मगर यहां भी एक बेईमानी है कि इन नदियों का प्रदूषण कम होने के बजाय बढ़ता गया है। हमारी संस्कृति और जीवन से जुड़ी ये नदियां दिन पर दिन प्रदूषित क्यों होती गइं और हजारों करोड़ रूपए बहा देने के बाद भी इन्हें स्वच्छ क्यों नहीं बनाया जा सका, दरअसल इसमें कोई गूढ़ रहस्य नहीं है। ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ है कि इन दोनों नदियों को प्रदूषित करने वाले सफाई करने वालों पर लगातार भारी पड़ते रहे हैं। राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हों या फिर केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड, गंगा-यमुना में रात-दिन कचरा उगलने वाली औद्योगिक इकाइयों की अनदेखी करके या उनको चेतावनी देकर और बहुत हुआ तो आर्थिक दंड देकर अबतक बख्शती आई हैं। इसका नतीजा ढाक के पात रहा है। अब जाकर मनमानी करने वाली औद्योगिक इकाइयों पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने चाबुक चलाया है। कड़ा रूख अख्तियार करते हुए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने ऐसी चार प्रदूषक औद्योगिक इकाइयों को बंद करा दिया है। इसके अलावा एक औद्योगिक इकाई को बंद कर देने का नोटिस दिया है। उदूगम से लेकर मंजिल तक गंगा के समूचे क्षेत्र को तो छोड़िए, केंद्रीय प्रदूषण निगरानी संस्था ने उत्तर प्रदेश में कन्नौज से वाराणसी के बीच पांच सौ किलोमीटर की लंबाई में गंगा के प्रदूषण पर सघन निगरानी के बाद तीन हफ्तों में यह कार्रवाई की है। इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि अपने समूचे सफर के दौरान औद्योगिक से लेकर अन्य प्रकार के कितने प्रदूषणों की मार हमारी यह पूज्य पवित्र नदी झेल रही होगी। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पहली बार पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986 की धारा पांच को लागू करते हुए गंगा के अपराधियों पर यह चाबुक चलाया है। यही नहीं, पर्यावरण मंत्री के निर्देश पर गंगा की स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए कानपुर की 402 चमड़ा इकाइयों की भी जांच होनी है। असल में अब इन नदियों को दुर्गति से उबारने के लिए चाबुक चलाने के अलावा कोई रास्ता भी नहीं है।
read more...

इकहरे चेहरे से लोगों का काम ही नहीं चलता

अरविन्द चतुर्वेद
आजकल इकहरे चेहरे से लोगों का काम ही नहीं चलता, और फिर राजनीति में तो पूछना ही क्या! पारदर्शिता की बातें तो खूब की जाती हैं, लेकिन चेहरे पर चेहरा चढ़ा रहता है। कमाल यह कि राजनीति करने वाले अपने हर चेहरे को असली चेहरे की तरह पेश करते हैं। अभी कल तक कांग्रेस के प्रवक्ता रहे अभिषेक मनु सिंघवी को ही लीजिए। उनका एक चेहरा पार्टी के प्रवक्ता के अलावा नामी वकील का भी है और जाहिर है कि वकील होने के नाते वे अपने किसी भी मुवक्किल के साथ कोर्ट में खड़े हो सकते हैं- उसके बचाव में दलीलें भी दे सकते हैं। लेकिन ठीक इसी जगह यदि वही वकील किसी राजनीतिक दल का प्रवक्ता या प्रतिनिधि चेहरा भी होता है तो उससे अगर पारदर्शिता और नैतिकता की अपेक्षा न भी की जाए तो कम से कम पार्टी के सिद्धांतों और नीतियों के लिए प्रतिबद्धता की अपेक्षा तो रहती ही है। अभिषेक मनु सिंघवी का यही वकील वाला चेहरा केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस के लिए अचानक इतना असुविधा जनक और धर्म संकट में डालने वाला साबित हुआ है कि उन्हें पार्टी प्रवक्ता क ी भूमिका से बेदखल कर दिया गया। वैसे दो चेहरे रखने वाले सिंघवी एक तरह से न घर के हुए, न घाट के। क्योंकि केरल में भूटान लॉटरी के एक घोटालेबाज एजेंट की तरफ से केरल सरकार के खिलाफ मुकदमा लड़ने का मामला जब उजागर हुआ और सिंघवी पर दबाव पड़ा तो एक ओर तो उन्होंने मुकदमे से अपने को पीछे खींच लिया, दूसरी ओर जब कांग्रेस की केरल इकाई की ओर से पार्टी आला कमान पर दबाव बढ़ा तो धर्म संकट की हालत में सिंघवी की कांग्र्रेस के प्रवक्ता पद से भी छुटूटी हो गई। इसी को कहते हैं- दुविधा में दोऊ गए, माया मिली न राम। जरा याद कीजिए कि कांग्रेस के प्रवक्ता के बतौर अभिषेक मनु सिंघवी पत्रकारों को शेर ओ शायरी, कानून की धाराओं का हवाला देकर तर्कसंगत ढंग से विभिन्न मुदूदों पर कितनी कुशलता व प्रखरता से जवाब देते थे और पार्टी का पक्ष रखते थे। मगर उन्होंने वकील के बतौर जो कुछ किया, उसे कांग्रेस पचा नहीं सकती थी। एक आदमी भारत के सबसे घनिष्ठ मित्र व छोटे-से देश भूटान की लॉटरी का भारत में ठेका लेता है और देखते ही देखते एक छोटे-से दुकानदार से भूटान को ठग कर खरबपति बन जाता है और जब भूटान सरकार केरल उच्च न्यायालय में उसके खिलाफ मामला दायर करती है तो बचाने के लिए भारत सरकार का नेतृत्व कर रही पार्टी का प्रवक्ता अपने वकील चेहरे में सामने आ जाता है। जैसी कि खबर है वकील सिंघवी की फीस 20 करो.ड रूपए तय हुई थी, लेकिन पैसे का पता नहीं उन्हें मिले या नहीं, हां चेहरे पर चेहरा रखने की दुविधा में उनकी राजनीति जरूर ध्वस्त हो गई। दिवंगत लक्ष्मीमल सिंघवी सरीखे संविधान के बड़े जानकार वकील और सादगी पूर्ण ढंग से रहने वाले शख्स के बेटे अभिषेक मनु सिंघवी को असल में उनका शानो-शौकत में डूबा अहंकार पूर्ण दोहरा व्यक्तित्व ही ले डूबा। आखिर केरल सरकार की शिकायत को प्रधानमंत्री कार्यालय ने गंभीरता से लिया और केरल में अगले वर्ष होनेवाले चुनाव में फजीहत को टालने की लाचारी में कांग्रेस आला कमान को अभिषेक मनु सिंघवी की प्रवक्ता पद से छुटूटी करनी पड़ी। इस संदर्भ में अगर कोई याद करना चाहे तो देश के दूसरे बड़े वकील राम जेठमलानी को भी याद कर सकता है, जिनका वकील और राजनेता वाले दोनों चेहरे भाजपा को पर्याप्त धर्म संकट में डालते आए हैं।
read more...

जलसों के बीच जख्म नहीं दिखते

« अरविंद चतुर्वेद « 
दिल्ली में कामनवेल्थ खेलों का जलसा, बिहार में विधान सभा चुनावों के जरिए लोकतंत्र के महापर्व का जलसा और पश्चिम बंगाल में अगले साल होनेवाले विधान सभा चुनावों की तैयारियों का जलसा। इन जलसों के बीच किसी को जख्म कहां दिखाई दे रहे हैं? खेलों के जलसे में बाढ़ की बर्बादी का जख्म सरकार को नहीं दिखाई देता। स्वास्थ्य मंत्रालय को दिल्ली से पटना तक फैले डेंगू का जख्म नहीं दिखता। जख्म और भी हैं। अभी कुछ ही दिनों पहले बिहार में जमुई जिले के कजरा जंगल में पुलिस से मुठभेड़ के बाद माओवादियों ने जिन पुलिस कर्मियों को बंधक बनाने के बाद एक लुकस टेटे को मारकर नीतीश कुमार के चेहरे पर हवाइयां उड़ा दी थीं, उसी जमुई के संथाली गांवों में एक तरह से मुनादी करते हुए नक्सलियों ने हर घर से लड़ने लायक एक-दो नौजवानों को अपने हवाले करने की मांग की है। जैसी कि खबर है, यह माओवादियों का अपने संगठन में लोगों की भर्ती का तरीका है। हो सकता है कि कुछ डर से और कुछ लाचारी-बेरोजगारी से ग्रामीण नौजवान माओवादियों को मिल भी जाएं, क्योंकि वे उन्हें विस्फोट और खून-खराबे की नौकरी दे देंगे। ऐसे ही तो उनका संगठन और कारोबार चल रहा है। यह एक जख्म के गहराते जाने की निशानी है, मगर बंधक पुलिसकर्मियों की मुक्ति के बाद चुनावी जलसे के रोमांच में डूबे मुख्यमंत्री नीतीश और उनके मुकाबिल लालू एक-दूसरे पर जबानी जंग लड़ते हुए कविता की पैरोडी फेंक रहे हैं। विधान सभा के चुनावी अभियान में माओवादियों के दिए जख्म और मरहम की चर्चा कोई दल और कोई नेता नहीं करना चाहता।
बंगाल का तो और बुरा हाल है। चुनाव में अभी सालभर बाकी है और उसकी तैयारियों में लगे मुख्यमंत्री बुद्धदेव भटूटाचार्य और उनके मुकाबिल ममता-प्रणब की सभाओं व उदूघाटन-शिलान्यास के जलसों में एक-दूसरे को राज्य के दुखों का उत्पादक बताया जा रहा है, मगर जनता के जख्म कोई नहीं देखता। अभी चार दिन पहले झाड़ग्राम जिला मुख्यालय से महज तीन किलोमीटर दूर राधानगर के सेवायतन में एक माध्यमिक स्कूल के चौबीस वर्षीय युवा शिक्षक श्रीकांत मंडल को छात्रों का भेस बनाए तीन किशोर माओवादियों ने घेरकर गोलियों से भून डाला। यह माओवादियों की बच्चा-ब्रिगेड थी, जिसने दिन-दोपहर श्रीकांत मास्टर को उनके मां-बाप की आंखों के सामने स्कूल से लौटते समय छात्र-छात्राओं के बीच गोलियां तड़तड़ाकर मार डाला। आसपास जो स्कूली छात्र-छात्राएं थीं, चीखते-चिल्लाते अपने बस्ते फेंककर भागे। असल में स्कूल में ही श्रीकांत मास्टर को नजर रख रहे बच्चा माओवादियों पर शक हुआ तो स्कूल से निकलने से पहले उसने अपने मां-बाप को फोन करके बुला लिया था। बच्चा माओवादियों के सामने श्रीकांत मास्टर के मां-बाप जान बख्शने के लिए हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते रहे, लेकिन उनपर कोई असर नहीं पड़ा। श्रीकांत मंडल को महज दो साल पहले स्कूल मास्टरी मिली थी, तब जाकर घर की माली हालत थोड़ी ठीक हुई थी, वरना इस नौकरी के पहले तक उसका बाप रिक्शा चलाता था। अब भी घर-परिवार की गाड़ी ठीकठाक से चलाने के लिए उसे लोगों के घरों में रंगाई-पुताई का काम करना पड़ता था। श्रीकांत मास्टर का कसूर यह था कि वह सरकारी पार्टी माकपा में था और गांव में रात में रोजाना दिए जा रहे पहरे में अपनी बारी आने पर पहरा दिया करता था।
यह कहने की तो खैर जरूरत ही नहीं है कि माओवादी जो क्रांति कर रहे हैं, उसमें रिक्शा चालक के बेटे श्रीकांत मंडल जैसे ज्यादातर गरीब ग्रामीण और आदिवासी मारे जा रहे हैं। सच्चाई यही है कि बिहार, झारखंड, बंगाल और छत्तीसगढ़ में रोजाना कहीं न कहीं माओवादी हिंसा के फोड़े फूटकर जख्म या नासूर बन रहे हैं, मगर उनके लिए मरहम खोजने के बजाय सरकारें और सियासी पार्टियां तरह-तरह के जलसों में डूबी हुई हैं। सियासत के इस मिजाज पर रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तियां याद कर सकते हैं-

तेरी क्रीड़ा और करूणा का जवाब नहीं,
मरहम वहां लगाते हो, जहां घाव नहीं।
read more...

हिन्दी का हाल और कुछ सवाल

अरविंद चतुर्वेद :
हर साल एक तारीख आती है : 14 सितम्बर, जिसे हिन्दी दिवस कहते हैं। सालभर तक पता नहीं क्या करते रहने वाले सरकारी दफ्तरों के राजभाषा विभाग और उनके कर्ता-धर्ता हिन्दी दिवस व सप्ताह वगैरह मनाने में जुट जाते हैं। एक राजभाषा अधिकारी मित्र की कही हुई बात याद आ रही है। उन्होंने कहा था- सच पूछिए तो चाहता ही कौन है कि हिन्दी वास्तव में लागू हो जाए। अगर ऐसा हो गया तो फिर राजभाषा विभागों और हिन्दी अधिकारियों की जरूरत क्या रहेगी? उन्होंने यह बात मजाक में भले ही कही हो, लेकिन यह एक गंभीर संकेत भी है।
इस बात को दूसरी तरफ से देखें। क्या यह सच नहीं है कि अगर हिन्दुस्तान से अंग्रेजी और अंग्रेजियत का खात्मा हो जाए तो बहुतेरे लोग मुश्किल में पड़ जाएंगे? असल में हमारी समूची नौकरशाही निचले दर्जे के कर्मचारियों समेत जनता पर अंग्रेजी में ही तो रोब झाड़ती है। भारतीय भाषाओं में रोब झाड़ना आसान नहीं है। वहां रोब झाड़ने का तर्क देना पड़ेगा और तुरंत जवाब भी सुनना पड़ जाएगा। इस तरह अपने देश के संदर्भ में अंग्रेजीदां लोगों को अंग्रेजी तर्क या बहस से बचने की सहूलियत तो देती ही है, वह उन्हें जवाबदेही से भी बचाती है। यानी कि मनमानी के मौके मुहैया कराती है। चाहे देश के इतिहास, भूगोल, प्रकृति, संपदा, कला, संस्कृति, विज्ञान आदि के बारे में रत्ती भर जानकारी न हो, लेकिन यदि एक भाषा अंग्रेजी आती हो तो अपने को न सिर्फ विद्वान गिनाया जा सकता है, बल्कि बड़े-बड़े विद्वानों की पंूछ मरोड़ी जा सकती है। उन्हें नकेल पहनाई जा सकती है। तमाम संस्थानों-प्रतिष्ठानों और प्रकल्पों-उपक्रमों को देख लीजिए, क्या ऐसा नहीं हो रहा है। आखिर एक लोकतांत्रिक देश में लोक भाषाओं को धकिया कर अंग्रेजियत की अल्पसंख्यक जिद बनाए रखने की तुक ही क्या है?
अब अंग्रेजी के भारतीय हमददों के तर्क पर गौर करें। उनका पहला तर्क यही होता है कि भारत जैसे बहुभाषी देश में अंग्र्रेजी एकसूत्रता का काम करती है- सबको जोड़ती है। दूसरे, वह विश्वभाषा है और इसके जरिए हम दुनिया के संपर्क में रहते हैं। और तीसरे, यह कि विज्ञान और टेक्नोलॉजी में अंग्रेजी के बगैर हम तरक्की नहीं कर सकते-पिछड़ जाएंगे। पर इन तकों की असलियत क्या है? क्या अंग्रेजी इसलिए अलग-अलग भाषा-भाषियों को जोड़ती है कि वह किसी की भाषा नहीं है और इसे सीखकर अलग-अलग भाषा-भाषियों को आपस में संवाद करना पड़ता है। फिर संवाद कायम करने की जरूरत के तहत भारतीय भाषाएं या हिन्दी क्यों नहीं सीखी जा सकती? क्या यह जरूरी है कि दो बिल्लियों में बराबर-बराबर बांटने के बहाने सारी रोटियां बंदर के ही हाथ लगें।
असल में ऐसा है भी नहीं। कोलकाता व बंगाल और मुंबई व महाराष्ट्र के कल-कारखानों में काम करने वाले, व्यापार-कारोबार करने वाले ज्यादातर लोग अंग्रेजी सीखकर तो नहीं ही गए हैं और न रास्ता-बाजार में हर जगह टकराने वाला आम बंगाली या मराठी अंग्रेजी जानता है। फिर भी सबकुछ चल रहा है। ऐसा ही चेन्नई, अहमदाबाद, सूरत, हैदराबाद, नागपुर, गुवाहाटी और चंडीगढ़ में भी है। संवाद की जरूरत तो जीवनयापन और सामाजिकता के तकाजे से है। और, यह काम आपस में भारतीय भाषाभाषी ही मिलजुल कर कर सकते हैं, करते आ रहे हैं। अलबत्ता अंग्रेजी की वकालत करने वालों से यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि क्या अंग्रेजों के भारत आने से पहले भारतीयों का आपसी संपर्क नहीं था? या अंग्रेज ही जब आए तो उन्होंने भारतीयों से कैसे संवाद कायम किया? कम से कम अंग्रेजों के भारत आने से पहले तो यहां अंग्रेजी नहीं ही आई थी। इसी के साथ अंग्रेजी के विश्वभाषा होने और अंग्रेजी के बगैर विज्ञान-टेक्नोलॉजी में पिछड़ जाने के तर्क का भी मुआयना किया जा सकता है। विकास का अर्थ अगर मनुष्य व संपदा के विकास और प्रकृति की समृद्धि से है तो तुलनात्मक दृष्टि से भारतीय अंग्रेजों के आने से पहले उनसे पिछड़े हुए नहीं, बल्कि ज्यादा विकसित थे। और, इससे भी काफी पहले श्रीलंका, बर्मा, थाइलैंड, चीन, जापान आदि देशों तक बौद्ध धर्म-दर्शन का प्रचार-प्रसार भी अंग्रेजी के जरिए नहीं हुआ था। आज भी दुनिया में ऐसे तमाम देश हैं, जहां की भाषा यानी संपर्क भाषा अंग्रेजी नहीं है फिर भी वे दुनिया की मुख्य धारा में शामिल हैं और उन्होंने ब्रिटेन से कुछ कम तरक्की नहीं की है। कई तो उससे आगे भी हैं- चीन और जापान को अपनी तरक्की के लिए अंग्रेजी की बैसाखी नहीं टेकनी पड़ी है। यह जग-जाहिर है।
वास्तविकता यह है कि अंग्रेजी भारत के अलग-अलग भाषा-समाजों के बीच पर्दा गिराने और दीवार खड़ी करने का काम कर रही है। यहां तक कि लोक और तंत्र के बीच खाई खोदने का काम भी इसने किया है, जिसके कारण देश में लोकतंत्र अपने सही अर्थ में फलीभूत नहीं हो पा रहा है और तमाम जनवादी मूल्य पानी भर रहे हैं। स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर राजधानी दिल्ली में एक कवि सम्मेलन या मुशायरा आयोजित कर-करा देने से राजभाषा या राष्ट्रभाषा का दायित्व पूरा नहीं हो जाता। असल में हमारे पास न कोई सुस्पष्ट भाषानीति है, न साफ सांस्कृतिक दृष्टि और न ही मजबूत इच्छा-शक्ति। हिन्दी ही नहीं, कोई भी भाषा महज शब्दावली, व्याकरण या तकनीक भर नहीं होती। वह अपने बोलने वाले समाज की जीवन शैली, उसके सपने और उन सपनों को पूरा करने की इच्छाओं व कोशिशों का वाहक होती है। यही होकर अंग्रेजी सारी खुराफातों की जड़ है और यही न होने देकर हिन्दी की राह में रोड़े अटकाए जाते हैं।
लेकिन इतना तो मानना पड़ेगा कि तमाम रूकावटों और उपेक्षाओं के बावजूद हिन्दी का दायरा अपनी तरह से बढ़ता गया है। दूसरी भारतीय भाषाओं और उनके बोलने वालों के संपर्क में आने के कारण एक सहज रासायनिक प्रक्रिया में हिन्दी का शब्द भंडार काफी बढ़ा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक खास अंचल की खड़ी बोली जिसे आज कीहिन्दी के रूप में हम जानते हैं, उसने तमाम बोलियों व प्रादेशिक भाषाओं के साहचर्य से बहुत कुछ अर्जित किया है। आज की हिन्दी में 10 से लेकर 75 फीसदी तक ऐसे शब्द मिल जाएंगे, जो देशभर की बोलियों और भाषाओं में मौजूद हैं। और ऐसा हुआ है तो इसलिए नहीं कि राजभाषा विभाग ने कोई तीर मारा है। हिन्दी का विकास तो इसलिए हुआ और हो रहा है कि संचार के साधनों, भाषा-व्यवहार के माध्यमों और यातायात के साधनों का देशभर में तेज विस्तार हुआ है। अलग-अलग भाषाभाषी रोजगार और कारोबार के लिए देश में इधर से उधर स्थाई तौर पर जा बसे हैं, या फिर उनका आना-जाना यहां से वहां तक लगा रहता है। हिन्दी की अग्रगामिता और गुणधर्मिता यहीं देखी जा सकती है।
इसके समांतर खेद के साथ कहना पड़ता है कि जहां राजभाषा विभाग हिन्दी के मामले में अपनी अटपटी नियमावलियों में उलझे और जकड़े हुए हैं, वहीं दूसरी ओर हिन्दी भाषा-साहित्य की शिक्षा देनेवाले विश्वविद्यालय और कालेजों के हिन्दी विभागों का पाठूयक्रम बहुत हद तक लकीर का फकीर, पुराना-धुराना और अजीबोगरीब किस्म की शास्त्रीयता में जकड़ा हुआ है। यह पाठूय क्रम सुधारों और परिवर्तनों के बावजूद सृजन के बहुआयामी समकालीन परिदृश्य से 25 से लेकर 40 साल पीछे है। ऐसा कहने का अर्थ यह नहीं है कि हिन्दी के छात्रों को इसकी परंपरा और अतीत की जानकारी न दी जाए। लेकिन यह भी जरूरी है कि वे अपने भाषा-साहित्य की मौजूदा स्थिति और स्वभाव के बारे में भी तो जानें। वरना भाषा-साहित्य के भविष्य-संकेत व चुनौतियां को वे कैसे जान-समझ पाएंगे। जहां तक राजभाषा विभाग और इसके हिन्दी अधिकारियों का सवाल है, स्थिति कुछ ज्यादा ही विकट है। हिन्दी को देश की संपर्क भाषा बनाने के मकसद से आजादी के बाद सरकार ने इसे राजभाषा का संवैधानिक दर्जा देकर इसकी तरक्की के लिए अपने तमाम संस्थानों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों में राजभाषा विभाग खोले। सभी मंत्रालयों की राजभाषा समितियां भी हैं, केंद्रीय हिन्दी निदेशालय है, भाषा प्रशिक्षण केंद्र हैं, और भी बहुत कुछ है। इन विभागों के तमाम कागज-पत्र, बही-खाता, सम्मेलन-रिपोर्ट, फाइल-दफ्तर वगैरह तामझाम को देखकर लगता है कि राजभाषा विभाग हिन्दी के लिए जैसे कोई पहाड़ तोड़ रहे हों। लेकिन हकीकत में ऐसा है नहीं। अगर ये विभाग, इनके अफसर और अमले सचमुच पहाड़ तोड़ रहे होते और हिन्दी का माहौल बनाने का काम कर रहे होते तो क्या आजादी के इतने बरसों बाद भी राजभाषा के मामले में संविधान की ऐसी-तैसी होती? कौन नहीं जानता कि अंग्रेजी की अठखेलियां सबसे ज्यादा सरकारी दफ्तरों में ही हैं और अफसरशाही की अंग्रेजी हेकड़ी भी।
इस विभाग की अपनी कोई भाषा नीति होगी तो जरूर ही। लेकिन इनके लोगों ने अंग्रेजी से अनुवाद की जैसी सरकारी हिन्दी पैदा की, उससे मुठभेड़ हो जाए तो अच्छी-खासी हिन्दी जानने वालों के भी छक्के छूट जाएं। पता नहीं क्यों और किस भाषा वैज्ञानिक आधार पर सरकारी हिन्दी की शब्दावली में तत्सम यानी संस्कृत के अप्रचलित शब्दों को रखने की रूझान अधिक दिखाई पड़ती है। हिन्दी के मानक रूप का मतलब संस्कृत की तत्सम शब्दावली ही होती है, ऐसा किस भाषा विज्ञान और वैज्ञानिक की मान्यता है? नतीजा यह है कि इस शुद्धतावाद और अंग्रेजी के सरकसी अनुवाद में राजभाषा विभाग हिन्दी की फजीहत कर रहा है। इससे तो यही लगता है गोया हिन्दी को कठिन व दुरूह बनाए रखने और अप्रचलित कर देने की कोई सुनियोजिज योजना हो। हिन्दी के सरकारी सेवकों को शायद हिन्दी की ग्रहणशीलता पर भरोसा नहीं है। वरना अंग्रेजी, पुर्तगाली, अरबी, फारसी से लेकर देश की तमाम बोलियों और प्रादेशिक भाषाओं के शब्दों को हिन्दी ने पचाया है-उन्हें अपना बनाया है। यह प्रक्रिया लगातार जारी है।
लेकिन नहीं, हिन्दी के सरकारी सेवक टाइपराइटर को टंकक, टाइप को टंकण, नोट या नोटिंग करने को टिप्पण, ड्राफ्ट को प्रारूप और ड्राफ्टिंग को प्रारूपण ही लिखेंगे। इसी तरह डॉक्टर, मास्टर, स्कूल, कॉलेज, टीचर, इंस्पेक्टर, सुपरवाइजर, एसपी या पुलिस कप्तान कहने में क्या हर्ज है। अंग्रेजी के ये शब्द हिन्दी में घुलमिल गए हैं और अपने स्वभाव के मुताबिक हिन्दी ने इनका बहुवचन-डाक्टरों, मास्टरों, टीचरों, स्कूलों, कालेजों, इंस्पेक्टरों, सुपरवाइजरों वगैरह बनाया है। क्या कोई कह सकता है कि अंग्रेजी शब्दों के ये बहुवचन भी अंग्रेजी हैं? असल में यह हिन्दी की अपनी गतिशीलता और ग्रहणशीलता की पहचान है।
भाषा की शुद्धता और शास्त्रीयता का राग अलापने वाले हिन्दी की गतिशीलता के इस प्रवाह और ग्रहणशीलता के इस गहरे प्रभाव पर चाहे जितना बिदकें और नाक-भौं सिकोड़ें, लेकिन महज तत्सम शब्दों और संस्कृत के उपसर्ग-प्रत्यय लगाकर बनाई गई शब्दावली से इसे नहीं रोक पाएंगे। आप अधिशासी, अधीक्षक, निरीक्षक, अभियंता, अधिकर्ता, धारक, यंत्री वगैरह लिख-छापकर कागज काला करते रहिए,, मोटी-मोटी पोथियां छापिए, अनुदान लीजिए, तरक्की पाइए- लेकिन इससे कुछ होने-जाने का नहीं है। जनता तो इनके प्रचलित अंग्रेजी शब्द एक्जिक्यूटिव, सुपरिटेंडेंट, इंस्पेक्टर इंजीनियर, एजेंट, ओवरशियर आदि ही बोलेगी। क्योंकि इन शब्दों को हिन्दी पचा चुकी है। क्योंकि हिंदी को आज नहीं तो कल सचमुच समूचे भारत की जीवंत संपर्क भाषा होना है। क्योंकि इसी ग्रहणशीलता के बल पर वह ऐसा कर भी सकती है।
सरकारी हिन्दी का तो यह हाल है कि एक विभाग की शब्दावली जानने वाला अधिकारी दूसरे विभाग की शब्दावली का बहुत आसानी से मायने तक नहीं बता सकता है। भरोसा न हो तो किसी सरकारी हिन्दी सेवक से पूछकर देखिए कि भारत के भाषाजात अल्प भाषा-भाषियों के आयुक्त का कार्यालय कहां है? बशर्ते वह हिन्दी अधिकारी इसी विभाग में काम न करता हो और यह हिन्दी उसने खुद ईजाद न की हो। ऊटपटांग सरकारी हिन्दी के ऐसे बेशुमार उदाहरण दिए जा सकते हैं।
फिर अंग्रेजी ही क्यों? बांग्ला, मराठी, गुजराती, पंजाबी, असमिया, ओड़िया आदि के संपर्क-साहचर्य में आकर भी हिन्दी ने बहुत सारे शब्द और अभिव्यंजना-कौशल इन भाषाओं से ग्रहण किया है। यह हिन्दी की कमजोरी या भाषा-प्रदूषण नहीं है। यह हिन्दी की शक्ति और अपना स्वभाव है। इस शक्ति और स्वभाव को राजस्थान की मीरा, पंजाब के नानक, ब्रज के सूर, अवधी के तुलसी-जायसी, पूरबी के कबीर, मैथिली के विद्यापति, बुंदेलखंड के जगनिक ही नहीं, चंद बरदाई से लेकर अमीर खुसरो और नामदेव-रैदास सरीखे कितनों ने बनाया है-पुख्ता किया है। और, इसीलिए भारतीय संदर्भ में इस भाषा के साथ गैर-हिन्दीभाषी शब्द बेमानी हो जाता है। असल में इस देश में जो भी जिस अंदाज और लहजे में हिन्दी बोलता है, बोलने की प्रक्रिया में है, सीख रहा है या समझ लेता है, वह हिन्दीभाषी ही है। सुविधा के लिए अगर कहना ही चाहें तो बांग्ला-हिन्दीभाषी, मराठी-हिन्दीभाषी, असमिया-हिन्दी भाषी, तमिल-तेलगू-मलयालम-हिन्दीभाषी कह सकते हैं। आखिर कोलकाता में हिन्दी का स्थानीय कलकतिया रूप और मुंबई में हिन्दी का मुंबइया मिजाज है या नहीं। मुंबई में मराठी के संपर्क-साहचर्य में जो बिंदास हिन्दी बोली-बतियाई जाती है, उसे आप खाली-पीली नहीं कह सकते और न कलकतिया हिन्दी में जो बांग्ला ढुक गई है, उसे निकाल सकते हैं- बूझे कि नहीं। भाषा के मामले में बोका बनने से नहीं चलेगा। इसी तरह गुवाहाटी में असमिया के संपर्क-साहचर्य से जो हिन्दी लाहे-लाहे पसर रही है, उसे कबूल करना होगा। नहीं तो बनारसी लहजे में कहें तो आप घोंचू रह जाएंगे।
कहना नहीं होगा कि अहिंदी भाषी कहे जानेवाले राज्यों की राजधानियों -कोलकाता, गुवाहाटी, मुंबई, चंडीगढ़ और नागपुर आदि शहरों से छपकर अपने-अपने इलाके में पढ़ जा रहे हिन्दी के दैनिक-साप्ताहिक अखबार ही भविष्य की हिन्दी का स्वरूप व चरित्र बनाएंगे। क्योंकि वे सीधे पाठकों के हाथ पहुंचते हैं और उनसे सीधा संवाद बनाते हैं। हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिहाज से फिल्म, टीवी व रेडियो जैसे दृश्य-श्रव्य माध्यमों की भूमिका भी झुठलाई नहीं जा सकती। यह जरूर है कि सांस्कृतिक स्तर पर येे माध्यम कई बुराइयां भी फैला रहे हैं।
लेकिन, हिन्दी के सामने असली खतरा दूसरा ही है। डर इस बात से लगता है कि इतिहास में जो दुर्घटना संस्कृत जैसी अत्यंत समृद्ध भाषा या पालि के साथ घटी, वैसी ही दुर्घटना का शिकार हिन्दी न हो जाए। अगर राम जैसे चरित्र को साम्प्रदायिक बनाने की कोशिश की जा सकती है, तुलसी जैसे लोकनायक महाकवि को साम्प्रदायिकता के घेरे में लाने की कोशिश की जा सकती है तो क्या ताज्जुब कि साम्प्रदायिकता की राजनीति हिन्दी को भी अपनी जद में लेने-लाने की कोशिश न करे? अगर ऐसा कभी हुआ तो यह हिन्दी का दुर्भाग्य होगा। क्योंकि कालिदास, बाण, भवभूति, चरक, सुश्रुत जैसी प्रतिभाओं के बावजूद संस्कृत पर पंडितों और कर्मकांडियों की धार्मिक-साम्प्रदायिक भाषा होने का ठप्पा लगते ही बौद्धौं की पालि भाषा ने इसे उखाड़ फेंका। इसी तरह बौद्ध मठों के अनाचार और हीनयानियों  के दुराचरण के चलते पालि भाषा को मिटूटी पलीद होते देर नहीं लगी। तब फिर हिन्दी के साथ ऐसा अघट क्यों नहीं घट सकता?
हिन्दी का भला चाहने वालों को इसके प्रति ही ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। ताकि हिन्दी के जरिए जोड़ने के बजाय तोड़ने की कोशिश न की जा सके।
read more...