अरविंद चतुर्वेद
अपनी भोली श्रद्धा और अटूट आस्था लेकर जो धर्मभीरू-धर्मप्राण लोग हजारों-लाखों की तादाद में किसी धार्मिक स्थल पर अपनी प्रार्थना निवेदित करने जाते हैं और उनमें से कुछ लोग धरम-धक्के में जान गंवा बैठते हैं, उनके लिए अफसोस ही तो जताया जा सकता है। यह समझ में नहीं आता कि हमारे तीथों, मंदिरों अथवा दूसरे धार्मिक स्थलों के जो कर्ता-धर्ता होते हैं, वे ऐसी सुचारू व्यवस्था क्यों नहीं बना पाते कि वहां पहुंचने वाले भक्तों और श्रद्धालुओं में भेड़ियाधसान की नौबत ही न आए। अलबत्ता कोई दुर्घटना या हादसा हो जाने के बाद जितनी तरह की बातें की जाती हैं या बनाई जाती हैं, उनमें केवल बच निकलने के बहाने होते हैं या अपना दोष किसी और पर टालने की कोशिश नजर आती है। अब चाहे मथुरा के बरसाना स्थित राधारानी मंदिर में मची भगदड़ में दो महिलाओं के जान गंवाने का मामला हो या फिर उसके अगले ही दिन झारखंड के देवघर में प्रतिष्ठित धर्मगुरू ठाकुर अनुकूल चंद्र के आश्रम में उनकी 125वीं जयंती पर जुटे अनुयायियों की भीड़ में पिसकर नौ वृद्ध जनों के प्राण निकलने और दर्जनों के घायल होने का हादसा हो, इनके पीछे दोनों जगहों पर कमोबेश एक जैसी वजहें सामने आ रही हैं। देवघर वाले मामले में यह कहना कि पहले से अंदाजा नहीं था कि इतनी बड़ी तादाद में अनुयायी उमड़ पड़ेंगे, यह जिम्मेवारी को नजरअंदाज करने का बहुत ही हास्यास्पद और अविश्वसनीय बहाना लगता है। आखिर यह ठाकुर अनुकूल चंद्र की 125वीं जयंती का आयोजन था और उनकी जयंती पर पहले से ही हर साल आयोजन होते आ रहे हैं तो आयोजकों को भीड़ संभालने के मामले में अनाड़ी के बजाय अनुभवी होना ही चाहिए। आश्रम के कर्ता-धर्ता अच्छी तरह जानते हैं कि अनुकूल ठाकुर के अनुयायी पश्चिम बंगाल और ओड़िशा से लेकर असम, झारखंड व बिहार में और इसके बाहर भी फैले हुए हैं। असली बात तो यह है कि धामर्कि स्थलों, मंदिरों, तीथों के कर्ता-धर्ता लोगों का ध्यान दान-दक्षिणा, भेंट-चढ़ावा आदि पर ज्यादा रहता है, वहां जुटने वाले भक्तों की भीड़ को संभालने, व्यवस्थित करने और उन्हें अनुकूल सुविधाएं-सहूलियतें देने पर कम रहता है। कहना नहीं होगा कि धर्मस्थलों या आश्रमों के व्यवस्थापक मानकर चलते हैं कि विशेष अवसरों पर जुटने वाले भक्तों की भीड़ को संभालना स्थानीय प्रशासन का काम है। यही वजह है कि इन हादसों में अपनों को खो चुकी आंखों में आंसुओं के साथ-साथ पुलिस और प्रशासन के लिए गुस्सा है। जैसी कि खबर है देवघर के ठाकुर अनुकूल चंद्र आश्रम में प्रार्थना के दौरान भगदड़ की घटना तड़के ही हो गई थी। हर साल ठाकुर की समाधि पर लगने वाले मेले के दौरान इस बार सत्संग में दो लाख से ’यादा लोग जुट गए थे। बताया जा रहा है कि जिस जगह सत्संग हो रहा था, वहां का दरवाजा काफी छोटा होने की वजह से धक्कामुक्की और भगदड़ की नौबत आई। इसी तरह बरसाने के राधारानी मंदिर में भी राधाष्टमी पर हजारों भक्तों का हुजूम उमड़ पड़ा था, जिसे दर्शन-पूजन के दौरान संभाला नहीं जा सका और धक्के खाकर ऊंचाई पर स्थित मंदिर की सीढि.यों से लुढ़क कर दो महिलाओं ने प्राण गंवाए तो कुछ लोग घायल भी हो गए। लेकिन दोनों ही हादसों की जवाबदेही से बचने के लिए दोनों जगह के प्रशासन की बातें कुछ वैसी ही हैं, जैसे भुखमरी से हुई मौतों के मामले में प्रशासन कहता है कि मौत भूख से नहीं बीमारी से हुई है। यानी प्रशासन का कोई दोष नहीं, वह तो भक्तों की अनियंत्रित अधीरता और उत्साह ही था, जो धरम-धक्के के बाद भगदड़ में बदल गया। सवाल तो धर्मस्थलों के कर्ता-धर्ता लोगों से भी है कि हजारों-लाखों अनुयायियों के बावजूद वे कुछ सौ वालेंटियर क्यों नहीं तैयार कर लेते, जो खास आयोजनों पर सुचारू व्यवस्था बनाएं और भीड़ को नियंत्रण में रखें!
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केहि विधि रहना!
ऐसा नहीं है कि खाइं सिर्फ गांवों और शहरों के बीच ही है। खुद शहरों में भी आबादियों के बीच गहरी खाइयां हैं और अनेक परतें हैं। मध्यकाल के किसी संत कवि ने एक सवाल उठाया था- ऐसी नगरिया केहि विधि रहना, लेकिन रहने की मुश्किलें आज भी कम नहीं हैं। यह सवाल आम शहरी से लेकर सरकार के लिए भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। गांवों के विकास का चाहे जितना कीर्तन करें और ग्रामीण रोजगार बढ़ने का ढोल पीटें, लेकिन हकीकत यह है कि आज भी गांवों से शहरों की ओर आबादी का जबरदस्त खिंचाव बना हुआ है और भीड़ व आबादी के समंदर में शहर छटपटा रहे हैं। शहरों में लोगों के पास रहने को घर नहीं हैं। आवास की समस्या कितनी गहरी है, यह शहरों के फुटपाथों, शहर सीमांत की झुग्गी-झोपड़ियों और शहर के भीतर भी किसी कोने-अंतरे में चकत्ते की तरह आबाद अव्यवस्थित रहवास के रूप में देख सकते हैं। एक ताजा सरकारी रिपोटर् के मुताबिक देश के शहरों में पौने दो करोड़ मकानों की कमी है और विडंबना यह भी कि एक करोड़ से ’यादा मकान खाली पड़े हैं, जिनमें कोई रहने वाला नहीं है। यानी इसी को कहते हैं जल बिच मीन पियासी। सरकारी रिपोर्ट बताती है कि शहरों में रहने वाले कुल 8.11 करोड़ परिवारों में से 1.87 करोड़ परिवारों के पास रहने की उचित जगह नहीं है। ऐसे में घरों की कमी से निपटने के लिए दूसरे उपायों के अलावा केंद्रीय आवास मंत्रालय ने सभी रा’य सरकारों को सलाह दी है कि अगर किसी के पास एक से अधिक मकान हैं और वे लगातार खाली रहते हैं तो उन मकानों के मालिक से टैक्स अथवा लेवी वसूल की जाए। आवास मंत्रालय द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति की रिपोटर् में बताया गया है कि देश में करीब एक करोड़ 10 लाख मकान बंद पड़े हैं, जिनमें लंबे समय से कोई नहीं रहता है। केंद्रीय आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्री कुमारी शैलजा का कहना है कि सरकार किसी को दूसरा, तीसरा या चौथा मकान खरीदने से तो नहीं रोक सकती और न ऐसा चाहती ही है, लेकिन अगर किसी के पास एक से अधिक मकान हैं तो उन्हें खाली न रखा जाए। यानी कि मकान मालिक या उसका परिवार उसमें नहीं रहता तो उसे किराए पर दे दे, ताकि मकानों की कमी से एक हद तक निपटा जा सके। यदि कोई फालतू यानी अतिरिक्त मकान खाली ही रख रहा है तो उस पर राज्य सरकारें टैक्स या लेवी लगाकर हासिल पैसे का इस्तेमाल गरीबों के लिए मकान बनाने में कर सकती हैं। प्रोफेसर अमिताभ कुंडू की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति का अनुमान है कि अगली पंचवर्षीय योजना 2012-17 में देश में करीब एक करोड़ 87 लाख 80 हजार मकानों की कमी रहेगी। इसमें से 56.2 फीसदी कमी ईडब्लूएस यानी आर्थिक रूप से पिछड़ी श्रेणी में रहेगी, जबकि एलआईजी में 39.5 प्रतिशत और एमआईजी में 4.3 प्रतिशत मकानों की कमी का अंदाजा लगाया गया है। विशेषज्ञ समिति के अनुसार अभी के हालात में देशभर में एक करोड़ से भी ज्यादा जो मकान यों ही बंद अथवा खाली पड़े हुए हैं, उनमें से उत्तर प्रदेश में 8.79 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 19.04 प्रतिशत तो पश्चिम बंगाल में 4.80 प्रतिशत हैं। इसी तरह आंध्र प्रदेश में 5.53 प्रतिशत, तमिलनाडु में 6.44 प्रतिशत, बिहार में 1.55 प्रतिशत और राजस्थान में 5.79 प्रतिशत मकानों में कोई रहने वाला नहीं है और वे खाली पड़े हुए हैं। विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट का ध्यान देने लायक पहलू यह भी है कि जिन राज्यों के शहरों में मकान खाली पड़े रहने के आंकड़े दिए गए हैं, उन्हीं राज्यों में कुल मकानों की कमी का 60 प्रतिशत हिस्सा आता है। मालूम हो कि शहरों में मकानों की कमी से निपटने के लिए केंद्र रा’य सरकारों को राजीव आवास योजना के तहत किराए के मकान बनाने के लिए आर्थिक मदद दे रहा है। यही नहीं, रा’यों से कहा गया है कि वे अपने यहां मॉडल रेंट कंट्रोल एक्ट बनाएं, जिसे किराए के मकानों पर लागू किया जाए। कुल मिलाकर तस्वीर यही है कि आजादी के इतने वषों बाद भी रोटी, कपड़ा और मकान की बुनियादी चुनौती बरकरार है।
गगन घटा घहरानी
अरविन्द चतुर्वेद
क्या मुश्किल है कि आसमान में बादल धरती वालों को ठेंगा दिखाकर चले जाएं, तब भी रोना और अगर घटाएं झूम के बरस जाएं, तब भी मुसीबत। हमने विकास का जो रास्ता चुन लिया है, उसने हमें इस कदर कुदरत विरोधी बना दिया है कि बरसात को ही लीजिए तो या तो हम उसके लायक नहीं हैं या फिर बरसात ही हमारे लायक नहीं रही है। गरमी की झुलसाती तपिश के बाद मानसून के बादल दो दिन झूमकर क्या बरसे कि चारों तरफ से मुसीबत और मुश्किलों की खबरें आ गइं। हमारी नदियां कूड़े-कचरे और गाद से इस कदर अटी-पटी हैं कि बारिश हुई नहीं कि बाढ़ आ जाती है, कटान के चलते गांव-खेत-डबरे जलमग्न हो जाते हैं, बस्तियों-घरों में पानी भर जाता है, कज्जे मकान गिर पड़ते हैं और कई बार कई जगह जान-माल से भी हाथ धोना पड़ता है। बरसात के पहले नदी तटों की भ्रष्टाचार मुक्त मरम्मत कर ली जाए, तटबंधों को दुरूस्त व पुख्ता कर लिया जाए और दिन-ब-दिन छिछली होती नदियों के पेटे में बरसों से जमी गाद निकाल ली जाए तो जल प्रवाही नदियां हमारी कोई दुश्मन नहीं हैं, जो बाढ़ बनकर हम पर यों टूट पड़ें। असल में नदियों के साथ जैसा बुरा सुलूक हम सालों-साल करते हैं, बरसात में मौका मिलने पर हमारी कारस्तानी का सूद समेत खामियाजा चार महीने में बाढ़ के रूप में नदियां हमें लौटा देती हैं। हम चीखते-चिल्लाते हैं, हाथ-पांव मारते हैं, फिर भी कोई सबक नहीं सीखते। दूसरे, नदियों से कम प्रदूषित हमारा प्रशासनिक तंत्र और सियासी पेचोखम नहीं है- राज्य सरकारें केंद्र पर तो केंद्र सरकार राज्यों पर नदियों के मामले में दांव खेलती रहती हैं और प्रशासनिक तंत्र तो खैर कागजों में ही सबकुछ चुस्त-दुरूस्त कर लिया करता है। आखिर नदियां और नहरें भी तो कमाई के अच्छे स्रोत हैं! मसलन, उत्तर प्रदेश के ही सुलतानपुर में सिंचाई विभाग के एक इंजीनियर साहब ने कागज में ही कई किलोमीटर लंबी नहर का काम तमाम करके लाखों रूपए का वारा-न्यारा कर लिया है। अब इस मामले की जांच भी हो रही है और साथ ही कहते हैं कि इसे दबाने की कोशिश भी चल रही है। बहरहाल, हर साल की तरह शुरूआती बरसात ने ही उत्तर प्रदेश में सरकारी कामकाज की पोल-पटूटी खोलकर रख दी है। प्रदेश के जनपदों और दूर-दराज के इलाकों की तो छोड़ ही दीजिए, राजधानी लखनऊ में एक-डेढ़ महीने पहले बनी नई सड़कें तक दो दिन की बरसात में कई जगह धंस गइं- कई जगह उनकी ठठरी निकल आई। समझा जा सकता है कि कितना गुणवत्तायुक्त काम हुआ है और कैसी पैसे की बंदरबांट हुई है। शहर के नाले इसलिए उफना पड़े कि उनकी सफाई ही नहीं हुई। सड़कों पर पानी भर गया, क्योंकि जल निकासी का बेहतर इंतजाम ही नहीं है। शहर में जगह-जगह गडूढे खुदे हुए हैं, मोरम और मलबा पड़ा हुआ है। सारा काम जून में पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन अभी तक लस्टम-पस्टम चल रहा है। खुदे हुए गडूढों में बरसात का पानी भर जाए और किसी की जान भी चली जाए तो बेशर्म प्रशासन को क्या फर्क पड़ता है? फिल्मों में और कविता में बरखा-बहार भले ही बहुत रूमानियत भरी हो, मगर हमारी व्यवस्था का एक बरसाती बीमार चेहरा यह भी है कि बीते बरस की तरह इस बार के मौसम में भी उत्तर प्रदेश में गोदामों की किल्लत के चलते कई जगहों पर करोड़ों रूपए के हजारों कुंतल गेहूं खुले आसमान तले भीगकर सड़ रहे हैं, जो सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए गरीबों का पेट भरते। सार्वजनिक खाद्यान्न की इस बर्बादी का दोषी कौन है- हमारी सड़ी व्यवस्था या बेचारी यह बरसात?
आत्मीय एक छवि तुम्हें नित्य भटकाएगी
कवि मुक्तिबोध की पांच चरणों में लिखी कविता का पहला और अंतिम हिस्सा प्रस्तुत है। जिंदगी क्या आत्मीयता की तलाश में एक पुलक भरा भटकाव है? क्या यह भटकाव ही हमें अनुभव सम्पन्न नहीं बनाता? इस भटकाव में ही जिंदगी को अर्थवत्ता मिलती है...
पता नहीं.../मुक्तिबोध
पता नहीं, कब कौन कहां किस ओर मिले
किस सांझ मिले, किस सुबह मिले!!
यह राह जिंदगी की
जिससे जिस जगह मिले
हैं ठीक वहीं, बस वहीं अहाते मेंहदी के
जिनके भीतर
है कोई घर
बाहर प्रसन्न पीली कनेर
बरगद ऊंचा, जमीन गीली
मन जिन्हें देख कल्पना करेगा जाने क्या!!
तब बैठ एक
गंभीर वृक्ष के तले
टटोलो मन, जिससे जिस छोर मिले,
कर अपने-अपने तप्त अनुभवों की तुलना
घुलना मिलना!!
.............
अपनी धकधक
में दर्दीले फैले-फैलेपन की मिठास,
या नि:स्वात्मक विकास का युग
जिसकी मानव-गति को सुनकर
तुम दौड़ोगे प्रत्येक व्यक्ति के
चरण-तले जनपथ बनकर!!
वे आस्थाएं तुमको दरिद्र करवाएंगी
कि दैन्य ही भोगोगे
पर, तुम अनन्य होगे,
प्रसन्न होगे!!
आत्मीय एक छवि तुम्हें नित्य भटकाएगी
जिस जगह, जहां जो छोर मिले
ले जाएगी...
...पता नहीं, कब कौन कहां किस ओर मिले।
पता नहीं.../मुक्तिबोध
पता नहीं, कब कौन कहां किस ओर मिले
किस सांझ मिले, किस सुबह मिले!!
यह राह जिंदगी की
जिससे जिस जगह मिले
हैं ठीक वहीं, बस वहीं अहाते मेंहदी के
जिनके भीतर
है कोई घर
बाहर प्रसन्न पीली कनेर
बरगद ऊंचा, जमीन गीली
मन जिन्हें देख कल्पना करेगा जाने क्या!!
तब बैठ एक
गंभीर वृक्ष के तले
टटोलो मन, जिससे जिस छोर मिले,
कर अपने-अपने तप्त अनुभवों की तुलना
घुलना मिलना!!
.............
अपनी धकधक
में दर्दीले फैले-फैलेपन की मिठास,
या नि:स्वात्मक विकास का युग
जिसकी मानव-गति को सुनकर
तुम दौड़ोगे प्रत्येक व्यक्ति के
चरण-तले जनपथ बनकर!!
वे आस्थाएं तुमको दरिद्र करवाएंगी
कि दैन्य ही भोगोगे
पर, तुम अनन्य होगे,
प्रसन्न होगे!!
आत्मीय एक छवि तुम्हें नित्य भटकाएगी
जिस जगह, जहां जो छोर मिले
ले जाएगी...
...पता नहीं, कब कौन कहां किस ओर मिले।
नाम में क्या रखा है!
सोनागाछी में सोने का गाछ यानी पेड़ न कभी था, न आज है। फिर भी नाम सोनागाछी है। कुछ बुजुर्गों का कहना है कि पुराने जमाने में यह जगह सोने के गहने-जेवर बनाने-बेचने की पूर्वी भारत में एक बड़ी मंडी थी और तब के हिसाब से यहां बहुत निपुण स्वर्णकार बसते थे. बृहत्तर सोनागाछी इलाके में आज भी सोना-चांदी की कुछ दूकानें हैं, पर सोने की मंडी के रूप में सोनागाछी कोलकाता महानगर में भी मशहूर नहीं है।
पुराने जमाने की सोने की मंडी बताने वाले बुजुर्गों का खयाल है कि दूर-देहात से आनेवाली भोली और सोने की लोभी सुंदर औरतों को ऐय्याश किस्म के स्वर्णकार और दूसरे लोग बहका लिया करते थे। धीरे-धीरे यह आम बात हुई और सोनागाछी ऐय्याशी की छोटी-मोटी मंडी बन गई। लेकिन कंचन और कामिनी के संयोग से पैदा हुई सोनागाछी के लिए इतिहास की कोई गली नहीं खुलती। इसे लोक-लोक की बात ही कह सकते हैं।
फिर सोनागाछी नाम क्यों पड़ा इस बदनाम बस्ती का? एक थीं देवी सोना गाजी। उनकी सोनागाछी में मजार भी है। वे इतनी मशहूर हुईं कि इस इलाके का नाम ही उनके नाम पर हो गया। यानी सोना गाजी से सोनागाछी। बहरहाल, इतिहास में झांकते हैं तो पाते हैं कि मनोरंजन के आधुनिक साधनों से दूर 18वीं-19वीं सदी के अंग्रेजी भारत में कलकत्ता का मुख्य मनोरंजन केंद्र थी सोनागाछी। पानी के जहाज से आनेवाले सात समुंदर पार के लोगों का भी मन बहलाती थी सोनागाछी। हुगली की लहरों पर चांदनी रात में हिचकोले खाती नौकाओं पर अंग्रेज साहबों का साथ देती थी यह सोनागाछी। बड़े-बड़े जमींदारों, सेठ-साहूकारों, उनके बिगडै़ल लाडलों, रईसों के पहलू में भी थी सोनागाछी। पर तब सोनागाछी आम ग्राहक की नहीं थी, जैसी कि आज नजर आती है।
असल में सोनागाछी के विकास में बंगाल के अकाल, ऐतिहासिक बंगभंग और फिर पूर्वी पाकिस्तान के रूप में एक हिस्से के चले जाने का बड़ा हाथ है. बड़ा हाथ है पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान के आज़ाद मुल्क बंगलादेश बनने का भी.
नजीर के तौर पर १९८०-८१ में सोनागाछी आई संध्या दे की दास्ताँ ही देखें. बंगलादेश के जैसोर जिले में केशवपुर थाने के तहत एक गाँव है- मध्यकुल ग्राम. संध्या इसी गाँव की बेटी है. जब वह १३-१४ साल की हुई तो उसके पिता सुधीर दे को डर लगा कि बेटी की इज्जत खतरे में है. कभी भी कोई उसे छीनकर ले जा सकता है. संध्या के पिता ने उसे उत्तर चौबीस परगना के हाबरा में नाना-नानी के पास पहुंचा दिया.
एक दिन शेफाली दी नाम की महिला ने गाँव की सीधी-सादी संध्या को कलकत्ता घुमाने का बहाना बनाया और पहुंचा दिया उसे सोनागाछी. संक्षेप में संध्या के सोनागाछी पहुँचने की यही दास्ताँ है. ऐसी सैकड़ों-हज़ारों संध्याओं से अटी पड़ी है सोनागाछी. और, अभी तो सोनागाछी की हालत नो वैकेंसी या हाउस फुल जैसी है.
इतिहास की पगडण्डी पर और पीछे चलते हैं तो १९११ की मर्दुमशुमारी की रिपोर्ट बताती है कि तब कलकत्ता में १४ हज़ार २७१ महिलायें जिस्म के पेशे में थीं. इस रिपोर्ट के मुताबिक़ तब कलकत्ता की कुल स्त्रियों में से जिनकी उम्र २०-४० साल की है, हर १२ वीं स्त्री जिस्म बेचती है. १२ से २० साल तक की उम्र की लड़कियों में हर सौ में छः लड़कियाँ इस जलालत भरे पेशे में हैं. यह रिपोर्ट कहती है कि १०९६ वेश्या लड़कियों की उम्र दस साल से भी कम है और यों ९० फीसदी वेश्याएं हिन्दू हैं.
सोनागाछी का मतलब है- इस आग के दरिया में डूब ही जाना है...!
पुराने जमाने की सोने की मंडी बताने वाले बुजुर्गों का खयाल है कि दूर-देहात से आनेवाली भोली और सोने की लोभी सुंदर औरतों को ऐय्याश किस्म के स्वर्णकार और दूसरे लोग बहका लिया करते थे। धीरे-धीरे यह आम बात हुई और सोनागाछी ऐय्याशी की छोटी-मोटी मंडी बन गई। लेकिन कंचन और कामिनी के संयोग से पैदा हुई सोनागाछी के लिए इतिहास की कोई गली नहीं खुलती। इसे लोक-लोक की बात ही कह सकते हैं।
फिर सोनागाछी नाम क्यों पड़ा इस बदनाम बस्ती का? एक थीं देवी सोना गाजी। उनकी सोनागाछी में मजार भी है। वे इतनी मशहूर हुईं कि इस इलाके का नाम ही उनके नाम पर हो गया। यानी सोना गाजी से सोनागाछी। बहरहाल, इतिहास में झांकते हैं तो पाते हैं कि मनोरंजन के आधुनिक साधनों से दूर 18वीं-19वीं सदी के अंग्रेजी भारत में कलकत्ता का मुख्य मनोरंजन केंद्र थी सोनागाछी। पानी के जहाज से आनेवाले सात समुंदर पार के लोगों का भी मन बहलाती थी सोनागाछी। हुगली की लहरों पर चांदनी रात में हिचकोले खाती नौकाओं पर अंग्रेज साहबों का साथ देती थी यह सोनागाछी। बड़े-बड़े जमींदारों, सेठ-साहूकारों, उनके बिगडै़ल लाडलों, रईसों के पहलू में भी थी सोनागाछी। पर तब सोनागाछी आम ग्राहक की नहीं थी, जैसी कि आज नजर आती है।
असल में सोनागाछी के विकास में बंगाल के अकाल, ऐतिहासिक बंगभंग और फिर पूर्वी पाकिस्तान के रूप में एक हिस्से के चले जाने का बड़ा हाथ है. बड़ा हाथ है पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान के आज़ाद मुल्क बंगलादेश बनने का भी.
नजीर के तौर पर १९८०-८१ में सोनागाछी आई संध्या दे की दास्ताँ ही देखें. बंगलादेश के जैसोर जिले में केशवपुर थाने के तहत एक गाँव है- मध्यकुल ग्राम. संध्या इसी गाँव की बेटी है. जब वह १३-१४ साल की हुई तो उसके पिता सुधीर दे को डर लगा कि बेटी की इज्जत खतरे में है. कभी भी कोई उसे छीनकर ले जा सकता है. संध्या के पिता ने उसे उत्तर चौबीस परगना के हाबरा में नाना-नानी के पास पहुंचा दिया.
एक दिन शेफाली दी नाम की महिला ने गाँव की सीधी-सादी संध्या को कलकत्ता घुमाने का बहाना बनाया और पहुंचा दिया उसे सोनागाछी. संक्षेप में संध्या के सोनागाछी पहुँचने की यही दास्ताँ है. ऐसी सैकड़ों-हज़ारों संध्याओं से अटी पड़ी है सोनागाछी. और, अभी तो सोनागाछी की हालत नो वैकेंसी या हाउस फुल जैसी है.
इतिहास की पगडण्डी पर और पीछे चलते हैं तो १९११ की मर्दुमशुमारी की रिपोर्ट बताती है कि तब कलकत्ता में १४ हज़ार २७१ महिलायें जिस्म के पेशे में थीं. इस रिपोर्ट के मुताबिक़ तब कलकत्ता की कुल स्त्रियों में से जिनकी उम्र २०-४० साल की है, हर १२ वीं स्त्री जिस्म बेचती है. १२ से २० साल तक की उम्र की लड़कियों में हर सौ में छः लड़कियाँ इस जलालत भरे पेशे में हैं. यह रिपोर्ट कहती है कि १०९६ वेश्या लड़कियों की उम्र दस साल से भी कम है और यों ९० फीसदी वेश्याएं हिन्दू हैं.
सोनागाछी का मतलब है- इस आग के दरिया में डूब ही जाना है...!
गुनाह और पनाह
अरविन्द चतुर्वेद
जिस्म, जाम और जान की बाजी- तीन खेल से सोनागाछी...। जी हां, सोनागाछी के ये तीन खास खेल हैं। मसलन 1992 में सोनागाछी जिस्म बाजार के एक अड्ïडे से कोलकाता पुलिस के ही एक जवान की लाश मिली थी। कभी-कभार जान लेने-देने के ऐसे हादसे हो जाते हैं तो चंद दिनों के लिए सोनागाछी में तूफान-सा आ जाता है- पुलिस की छापेमारियां, लड़कियों-दलालों की धर-पकड़, काली गाड़ी में सबको लादकर थाने ले जाना। लेकिन वहां भी कबतक रखेंगे? एक-आध दिन में ले-देकर जमानत हो जाती है। फिर सबकुछ पहले जैसा।बड़ी पुरानी कहावत है कि कंचन-कामिनी और मदिरा की तिकड़ी भी अपने आप बन जाती है। जिस्म की दूकान पर मौज-मस्ती के लिए बेफिक्र बनाने में जाम शायद मददगार साबित होता होगा। यह भी हो सकता है कि दो घूंट गले से उतरने के बाद गलत काम का अपराध बोध काफूर हो जाता हो। या फिर बेपर्दगी का सामना करने के लिए शराब पीकर पर्देदार लोग अपनी झिझक व शर्म भगाते हों और हिम्मत जुटाते हों।
मसलन, दलाल के साथ गली से गुजरते हुए एक बेफिक्र अधेड़ और उसके साथ लडख़ड़ाते हुए चल रहे 25-26 साल के युवक के बीच की बातचीत गौर करने लायक है-
- अमां यार, घबड़ाने की क्या बात थी? साला, मूड खराब हो गया। बेकार तुमको दारू पिलाया।
- नेई, ये बात नेई। हमको वो जंची ही नेई। मेरा सर चक्कर खा रहा था, साला।
- तेरे चक्कर में हमारा भी मजा खराब हो गिया। हम अब्बी और दारू पिएगा।
- ठीक है, हम आपको दारू पिलाएगा। बाकी आपको कसम, अब्बा को बिल्कुल खबर न चले।
- हम तुम्हारा दारू नेई पिएगा। तुमको हमारा यकीन नेई? क्या समझता, हमारे पास पैसा नेई?
वह अधेड़ आदमी नशे के सुरूर में नौजवान पर उखड़ गया। नौजवान नशे में लडख़ड़ाती आवाज में अधेड़ साथी को मनाने की कोशिश में मिमियाने लगा। गरमी कुछ खास नहीं थी, फिर नौजवान का चेहरा पसीने से तर-ब-तर क्यों था- घबराहट और डर की वजह से, या तेज नशे में खाए पान के किमाम व जर्दे की वजह से?
सोनागाछी की गलियों में कई जगह तो जाहिरा तौर पर शराब मिलती है और कई जगह किस्म-किस्म की ऐसी रंग-बिरंगी शीशियों-बोतलों में कि सरसरी तौर पर लगे कहीं यह शरबत या टॉनिक तो नहीं है। प्याजी पकौड़ी की दूकानों पर बाजार की नजाकत से वाकिफ लोगों को गिलास में पानी की जगह पानी के ही रंग वाली देसी दारू भी आसानी से मिल जाती है। कई दूकानों पर चाय-पकौड़ी और दूसरी चीजें बेचना तो महज एक आड़ है। दरअसल इन दूकानों पर बिकती है देसी शराब, जिसे बांग्ला या बांग्लू कहते हैं।
शौकीन ग्राहकों के मांगने पर बाड़ीवाली बऊ दी खुद भी देसी-विदेशी शराब मंगा देती है। लेकिन आम तौर पर धंधे के वक्त लड़कियों के दारू पीने पर मनाही है। शायद इसलिए कि लड़की कहीं धंधे के दौरान ही नशे के सुरूर में बहक कर धंधा चौपट न कर दे। हां, सारी रात के लिए आए और बुक कराए ग्राहक की फरमाइश पर लड़की का दारू-सिगरेट पीना जरूर धंधे का हिस्सा है।
जिस्म बाजार के कई अड्डे किसिम-किसिम के अपराधियों, गुंडे, बदमाशों के पनाहगार भी हैं। क्योंकि वे ग्राहक हैं और ग्राहक के लिए दरवाजा हर वक्त खुले रखना इस बाजार का धर्म है। एक दलाल ने एक दिलचस्प बात बताई कि यहां एक अड्डे पर तो केवल शहर के गुंडे-बदमाश ही आते हैं। यह अड्डा आम ग्राहक के लिए नहीं है। शायद अड्डे की मालकिन ने सब तरह से हिसाब बैठाकर इसे स्पेशल बना रखा है।
..... जारी
बाड़ी वाली बऊ दी उर्फ मौसी
अरविन्द चतुर्वेद
सोनागाछी जिस्म बाजार के संचालन का सारा दारोमदार बाड़ी वाली बऊ दी पर होता है। कुछ तो बऊ दी किस्म की महिलाओं की अपनी बाड़ी है और बहुतेरी बऊ दी मकानों की पुरानी किराएदार हैं। जिस्म बाजार में समय-समय पर पुलिस की होनेवाली छापेमारियों से निपटना, पकड़ी गई लड़कियों को छुड़ाकर वापस लाना, ग्राहकों और गुंडे-बदमाशों की ज्यादतियों से अपनी लड़कियों को बचाना- यह सारा सिरदर्द बऊ दी का है। बऊ दी इस सिरदर्द के बदले में लड़कियों की कमाई में हिस्सा लेती हैं।
यह बताते समय दलाल मंगला प्रसाद के होठों पर बऊ दी के लिए एक व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट चिपकी रहती है। वह कहता है- क्या है कि साहब, ये जो बऊ दी लोग हैं न, इनको भी तो सबकुछ का परेटिकल एक्सपीरियन(प्रैक्टिकल एक्सपीरियंश) होता है, न। किसी बराबर आनेवाले ग्राहक को तजबीज कर उसके साथ एक तरह से घर बसा लेती हैं।
- क्या बऊ दी लोग शादीशुदा होती हैं?
इस सवाल पर ठहाके लगाकर हंस पड़ता है मंगला। हंसते-हंसते कहता है- धत्त तेरे की। अरे, उसे क्या कहेंगे-बऊ दी रखैला रखती हैं, रखैला। कोई टैक्सी वाला होता है, कोई चाय-पान की गुमटी वाला और कोई छोटा-मोटा दुकानदार। सब साला मउगा होता है, साहब। बाकी क्या है कि हफ्ता में एक-दो बार बऊ दी का आदमी जरूर आता है।
सोनागाछी की बऊ दी महिलाओं के बच्चे भी हैं- लड़के-लड़कियां। वे बच्चों को स्कूल भेजती हैं। बाड़ी में मास्टर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने आते हैं। जाहिर है कि बऊ दी के मन में यह इच्छा जरूर है कि उनके बच्चे किसी तरह पढ़-लिखकर सोनागाछी जिस्म बाजार की चौहद्दी पार करके दूसरी बेहतर दुनिया में शामिल हो जाएं।
इस जिस्म बाजार की लड़कियों की हैसियत भी तीन तरह की है। पांच सौ से हजार तक ऐसी लड़कियां हैं, जिन्हें दलाल मंगला प्रसाद हाई क्लास कहता है। इनकी फीस ढाई सौ से तो कतई कम नहीं है और ऊपर हजार-डेढ़ हजार तक जा सकता है. गिफ्ट वगैरह अलग से. हाई क्लास लड़कियां शहर के होटलों में भी जाती हैं, खाली फ़्लैट वाले तनहा गुणग्राहक के घर भी. कुछ ऐसी भी हैं जो किसी की निजी हैं. लेकिन अगर सचमुच वे वफादारी के साथ निजी बनी रहें, तब फिर क्या जिस्म बाज़ार का रिवाज नहीं टूटेगा? बेवफाई और फरेब पर ही तो टिका है यह जिस्म बाज़ार. मंगला बताता है - जब लड़की का परमानेंट आदमी किसी दिन नहीं आता तो महँगी फीस वाला टेम्परेरी ग्राहक भी चल जाता है.
सोनागाछी की हाई क्लास लड़कियों के पास एक-एक साफ़-सुथरे अच्छे कमरे हैं और टीवी-वीडियो जैसी मनोरंजन की सुविधाएं भी. खाना बनाने, खिलाने के लिए नौकरानी भी है. बाज़ार से रोजमर्रा की खरीदारी के लिए नौकर भी. ये लड़कियां उत्तर प्रदेश के आगरा और आसपास के इलाके की हैं. कह सकते हैं कि ये जानबूझ कर पेशेवर बनी हैं. मंगला बताता है- ये लड़कियां मां-बाप, भाई-बहनों के लिए अपने देस मनिआर्दर और बैंक ड्राफ्ट के जरिये पैसे भेजती हैं. बीच-बीच में इनसे मिलने घरवाले भी आया करते हैं. सोनागाछी की हाई क्लास लड़कियां कम-से-कम हाई स्कूल तक जरूर पढ़ी-लिखी हैं. इन्होने अपनी कमाई के पैसे कुछ दूसरे कारोबार में भी लगा रखा है. मसलन, कुछ हाई क्लास लड़कियों की महानगर में टैक्सियाँ भी चलती हैं.
..... जारी
सोनागाछी जिस्म बाजार के संचालन का सारा दारोमदार बाड़ी वाली बऊ दी पर होता है। कुछ तो बऊ दी किस्म की महिलाओं की अपनी बाड़ी है और बहुतेरी बऊ दी मकानों की पुरानी किराएदार हैं। जिस्म बाजार में समय-समय पर पुलिस की होनेवाली छापेमारियों से निपटना, पकड़ी गई लड़कियों को छुड़ाकर वापस लाना, ग्राहकों और गुंडे-बदमाशों की ज्यादतियों से अपनी लड़कियों को बचाना- यह सारा सिरदर्द बऊ दी का है। बऊ दी इस सिरदर्द के बदले में लड़कियों की कमाई में हिस्सा लेती हैं।
यह बताते समय दलाल मंगला प्रसाद के होठों पर बऊ दी के लिए एक व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट चिपकी रहती है। वह कहता है- क्या है कि साहब, ये जो बऊ दी लोग हैं न, इनको भी तो सबकुछ का परेटिकल एक्सपीरियन(प्रैक्टिकल एक्सपीरियंश) होता है, न। किसी बराबर आनेवाले ग्राहक को तजबीज कर उसके साथ एक तरह से घर बसा लेती हैं।
- क्या बऊ दी लोग शादीशुदा होती हैं?
इस सवाल पर ठहाके लगाकर हंस पड़ता है मंगला। हंसते-हंसते कहता है- धत्त तेरे की। अरे, उसे क्या कहेंगे-बऊ दी रखैला रखती हैं, रखैला। कोई टैक्सी वाला होता है, कोई चाय-पान की गुमटी वाला और कोई छोटा-मोटा दुकानदार। सब साला मउगा होता है, साहब। बाकी क्या है कि हफ्ता में एक-दो बार बऊ दी का आदमी जरूर आता है।
सोनागाछी की बऊ दी महिलाओं के बच्चे भी हैं- लड़के-लड़कियां। वे बच्चों को स्कूल भेजती हैं। बाड़ी में मास्टर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने आते हैं। जाहिर है कि बऊ दी के मन में यह इच्छा जरूर है कि उनके बच्चे किसी तरह पढ़-लिखकर सोनागाछी जिस्म बाजार की चौहद्दी पार करके दूसरी बेहतर दुनिया में शामिल हो जाएं।
इस जिस्म बाजार की लड़कियों की हैसियत भी तीन तरह की है। पांच सौ से हजार तक ऐसी लड़कियां हैं, जिन्हें दलाल मंगला प्रसाद हाई क्लास कहता है। इनकी फीस ढाई सौ से तो कतई कम नहीं है और ऊपर हजार-डेढ़ हजार तक जा सकता है. गिफ्ट वगैरह अलग से. हाई क्लास लड़कियां शहर के होटलों में भी जाती हैं, खाली फ़्लैट वाले तनहा गुणग्राहक के घर भी. कुछ ऐसी भी हैं जो किसी की निजी हैं. लेकिन अगर सचमुच वे वफादारी के साथ निजी बनी रहें, तब फिर क्या जिस्म बाज़ार का रिवाज नहीं टूटेगा? बेवफाई और फरेब पर ही तो टिका है यह जिस्म बाज़ार. मंगला बताता है - जब लड़की का परमानेंट आदमी किसी दिन नहीं आता तो महँगी फीस वाला टेम्परेरी ग्राहक भी चल जाता है.
सोनागाछी की हाई क्लास लड़कियों के पास एक-एक साफ़-सुथरे अच्छे कमरे हैं और टीवी-वीडियो जैसी मनोरंजन की सुविधाएं भी. खाना बनाने, खिलाने के लिए नौकरानी भी है. बाज़ार से रोजमर्रा की खरीदारी के लिए नौकर भी. ये लड़कियां उत्तर प्रदेश के आगरा और आसपास के इलाके की हैं. कह सकते हैं कि ये जानबूझ कर पेशेवर बनी हैं. मंगला बताता है- ये लड़कियां मां-बाप, भाई-बहनों के लिए अपने देस मनिआर्दर और बैंक ड्राफ्ट के जरिये पैसे भेजती हैं. बीच-बीच में इनसे मिलने घरवाले भी आया करते हैं. सोनागाछी की हाई क्लास लड़कियां कम-से-कम हाई स्कूल तक जरूर पढ़ी-लिखी हैं. इन्होने अपनी कमाई के पैसे कुछ दूसरे कारोबार में भी लगा रखा है. मसलन, कुछ हाई क्लास लड़कियों की महानगर में टैक्सियाँ भी चलती हैं.
..... जारी
साला, इस लाइन में भी बड़ा कंपटीशन हो गया है
अरविन्द चतुर्वेद
वाकई एक तिलस्म है सोनागाछी. यहाँ की बदनाम बस्तियों में जिस्म के खरीदार ग्राहक के लिए भी बहुत आसान नहीं है इस तिलस्म का खुल जा सिमसिम. इस तिलस्म को खोलकर ठिकाने तक ले जाने का काम करते हैं समस्तीपुर के मंगला ( पूरा नाम मंगला प्रसाद ), बीरभूम के बोनू और राधा ( पूरा नाम राधाचरण ) जैसे दलाल .
सोनागाछी के मायावी जिस्म बाज़ार के विस्तार का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह इमामबख्श लेन, गौरी शंकर लेन, दुर्गाचरण मित्र लेन, मस्जिदबादी स्ट्रीट और दालपट्टी तक कमोबेश अपना दायरा बना चुका है। यह बाजार सिमटने के बजाय दिन-ब-दिन फैलता ही जा रहा है। फिलहाल, सोनागाछी जिस्म बाजार की चौहद्दी पश्चिम में चितपुर ट्राम लाइन, पूरब में सेंट्रल एवेन्यू, दक्षिण में चक्रवर्ती लेन और उत्तर में मस्जिदबाड़ी स्ट्रीट तक फैली हुई है।
ऐसा नहीं है कि इस समूचे दायरे में सिर्फ जिस्म की दूकानें ही सजी हैं। शरीफ नागरिकों का घर-संसार भी है, पुश्तैनी बाशिंदों के मकान भी हैं, दूसरे आम कारोबारी लोग भी हैं और नौकरी-पेशा लोग भी। लेकिन इनकी हालत बत्तीस दांतों के बीच जीभ जैसी है। जिस्म बाजार के बीच बसे परिवारी लोगों के घरों के दरवाजे अमूमन शाम साढ़े सात-आठ बजे तक बंद हो जाते हैं। अगर घर का कोई आदमी बाहर रह गया है तो वह भी कोशिश यही करता है कि किसी तरह रात नौ बजे तक जरूर घर पहुंच जाए।
सोनागाछी के विशाल देह बाजार के बारे में दलाल मंगला प्रसाद बड़े फख्र के साथ कहता है- दुनियाभर में मशहूर है साहब, कलकत्ते की यह सोनागाछी। करीब पच्चीस-तीस हजार औरतें तो होंगी ही।
- आप लोग कितने होंगे?
मंगला ने जवाब दिया- साला, इस लाइन में भी बड़ा कंपटीशन हो गया है, साहब। दस हजार दलाल तो होंगे ही।
- कितनी कमाई हो जाती है?
- ऊपर वाले की मेहरबानी से ठीके हो जाती है। सत्तर-पचहत्तर तो कहीं नहीं गया है। किसी किसी दिन दो-चार दिलदार ग्राहक मिल गए तो दो-ढाई सौ भी हो जाता है।
सोनागाछी का दलाल मंगला अपना परिवार यहां कोलकाता में नहीं रखता। परिवार समस्तीपुर में गांव में रहता है। यहां से पैसे भेजता है। तीन-चार महीने पर दो-चार दिन के लिए गांव हो आता है। गांव-घर वाले यही जानते हैं कि मंगला कोलकाता में कोई नौकरी करता है। पैंतालिस साल की उम्र वाला मंगला बीस सालों से दलाली कर रहा है।
बताता है- शुरू-शुरू में यह काम बहुत खराब लगता था। एक-दो साल तक रोज यही मन में आता था कि कल से यह काम छोड़ देंगे। लेकिन एक बार जो यह धंधा पकड़ाया तो कहां छूटा, साहब।
जिस चाय की दूकान पर मंगला से बात हो रही थी, वह दूकान भी मंगला की जान-पहचान की थी। फिर भी मंगला हड़बड़ी में था। वह मुझसे जल्दी से जल्दी पिंड छुड़ा लेना चाहता था। जब उससे मैंने सोनागाछी का जिस्म बाजार पूरा दिखा देने और किसी अड्डे पर चलकर किसी लड़की से बातचीत करा देने की बात की तो मेरी बात पूरी होने के पहले ही चालाक व अनुभवी दलाल मंगला ने कहा- पूरा सोनागाछी देखने-दिखाने में दो-तीन घंटे से कम टाइम नहीं लगेगा, साहब। मेरा तो आज का धंधा ही चौपट हो जाएगा।
आखिर में मुफ्त के चाय-नाश्ते-सिगरेट के बाद बेहयायी से मुस्कराते हुए मंगला धंधा चौपट करने के एवज में कुछ लेकर एक अड्डे पर मुझे ले गया। बीस-पच्चीस साल की दो लड़कियां अनमनी-सी कमरे के बाहर संकरे बरांडेनुमा गलियारे में खड़ी थीं। उन्होंने एक उचटती-सी नजर हम पर डाली और फिर नीचे से आने वाली सीढिय़ों की तरफ देखने लगीं।
मंगला मुझे लेकर कमरे में घुस गया। उसके साथ होने के कारण मैं निश्चिंत था। कमरे में सजधज कर बैठी, करीब तीस साल की औसत शक्ल-सूरत मगर अच्छे कद-काठी वाली युवती के चेहरे पर हमें देखकर पहले तो चमक उभरी। पर मैथिली में जैसे ही मंगला ने उससे कहा- देस से आए हैं, अपने भरोसे के आदमी हैं। थोड़ा यह सब देखना-जानना चाहते हैं- महिला के चेहरे पर झल्लाहट का भाव उभर आया। वह शिष्ट महिला थी और शायद मंगला के लिहाज के चलते वह उखड़ी तो नहीं, फिर भी नाराजगी की झलक देते सपाट लहजे में कहा- इसमें देखने-जानने का क्या है? हमलोग क्या कोई तमाशा हैं? अपने बारे में कुछ भी बोलने-बताने से उसने साफ मना कर दिया और अपने हावभाव से जता दिया कि मैं वहां से चलता बनूं।
इतनी देर में ही उस अच्छे-खासे आयताकार कमरे की एक झलक मिल चुकी थी। कमरे के एक सिरे पर लकड़ी की बंद आलमारी थी जिसमें शायद उसके कपड़े-लत्ते रहे होंगे। बेंत की इकलौती कुर्सी पर कुशन- ग्राहक के बैठने के लिए, तिपाईनुमा टेबुल, लकड़ी के तख्त पर हल्का गद्ïदेदार बिस्तर और साफ धुली चादर-उसी पर वह बैठी थी। कमरे के दूसरे छोर पर एक स्टैंड था, जिस पर प्लास्टिक का पानी भरा एक जग कांच की दो गिलासें और एक-दो प्लेटें पड़ी थीं। लंबाई वाली भीतरी दीवार में एक दरवाजा भी था, जिसपर परदा टंगा था। शायद वह बाथरूम और छोटी-मोटी रसोई जैसी जगह में खुलता हो। दीवार पर दो कैलेंडर अलग-अलग टंगे थे- एक, लेटे हुए शिव की छाती पर खड़ी, गले में मुंड-माला पहने, जीभ निकाले हुई काली का और दूसरा, सिर्फ चड्ढी पहने, खड़े, मांस-पेशियां दिखाते, चौड़ी छाती वाले बॉडीबिल्डर पहलवान का, जो निश्चय ही आनेवाले ग्राहक को चुनौती देता हुआ लगता होगा।
बहरहाल, कमरे से निकल कर जब मैं सीढिय़ां उतर रहा था, पीछे से बरामदे में खड़ी दोनों लड़कियों की जोरदार खिलखिलाहट सुनाई पड़ी।
.... जारी
वाकई एक तिलस्म है सोनागाछी. यहाँ की बदनाम बस्तियों में जिस्म के खरीदार ग्राहक के लिए भी बहुत आसान नहीं है इस तिलस्म का खुल जा सिमसिम. इस तिलस्म को खोलकर ठिकाने तक ले जाने का काम करते हैं समस्तीपुर के मंगला ( पूरा नाम मंगला प्रसाद ), बीरभूम के बोनू और राधा ( पूरा नाम राधाचरण ) जैसे दलाल .
सोनागाछी के मायावी जिस्म बाज़ार के विस्तार का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह इमामबख्श लेन, गौरी शंकर लेन, दुर्गाचरण मित्र लेन, मस्जिदबादी स्ट्रीट और दालपट्टी तक कमोबेश अपना दायरा बना चुका है। यह बाजार सिमटने के बजाय दिन-ब-दिन फैलता ही जा रहा है। फिलहाल, सोनागाछी जिस्म बाजार की चौहद्दी पश्चिम में चितपुर ट्राम लाइन, पूरब में सेंट्रल एवेन्यू, दक्षिण में चक्रवर्ती लेन और उत्तर में मस्जिदबाड़ी स्ट्रीट तक फैली हुई है।
ऐसा नहीं है कि इस समूचे दायरे में सिर्फ जिस्म की दूकानें ही सजी हैं। शरीफ नागरिकों का घर-संसार भी है, पुश्तैनी बाशिंदों के मकान भी हैं, दूसरे आम कारोबारी लोग भी हैं और नौकरी-पेशा लोग भी। लेकिन इनकी हालत बत्तीस दांतों के बीच जीभ जैसी है। जिस्म बाजार के बीच बसे परिवारी लोगों के घरों के दरवाजे अमूमन शाम साढ़े सात-आठ बजे तक बंद हो जाते हैं। अगर घर का कोई आदमी बाहर रह गया है तो वह भी कोशिश यही करता है कि किसी तरह रात नौ बजे तक जरूर घर पहुंच जाए।
सोनागाछी के विशाल देह बाजार के बारे में दलाल मंगला प्रसाद बड़े फख्र के साथ कहता है- दुनियाभर में मशहूर है साहब, कलकत्ते की यह सोनागाछी। करीब पच्चीस-तीस हजार औरतें तो होंगी ही।
- आप लोग कितने होंगे?
मंगला ने जवाब दिया- साला, इस लाइन में भी बड़ा कंपटीशन हो गया है, साहब। दस हजार दलाल तो होंगे ही।
- कितनी कमाई हो जाती है?
- ऊपर वाले की मेहरबानी से ठीके हो जाती है। सत्तर-पचहत्तर तो कहीं नहीं गया है। किसी किसी दिन दो-चार दिलदार ग्राहक मिल गए तो दो-ढाई सौ भी हो जाता है।
सोनागाछी का दलाल मंगला अपना परिवार यहां कोलकाता में नहीं रखता। परिवार समस्तीपुर में गांव में रहता है। यहां से पैसे भेजता है। तीन-चार महीने पर दो-चार दिन के लिए गांव हो आता है। गांव-घर वाले यही जानते हैं कि मंगला कोलकाता में कोई नौकरी करता है। पैंतालिस साल की उम्र वाला मंगला बीस सालों से दलाली कर रहा है।
बताता है- शुरू-शुरू में यह काम बहुत खराब लगता था। एक-दो साल तक रोज यही मन में आता था कि कल से यह काम छोड़ देंगे। लेकिन एक बार जो यह धंधा पकड़ाया तो कहां छूटा, साहब।
जिस चाय की दूकान पर मंगला से बात हो रही थी, वह दूकान भी मंगला की जान-पहचान की थी। फिर भी मंगला हड़बड़ी में था। वह मुझसे जल्दी से जल्दी पिंड छुड़ा लेना चाहता था। जब उससे मैंने सोनागाछी का जिस्म बाजार पूरा दिखा देने और किसी अड्डे पर चलकर किसी लड़की से बातचीत करा देने की बात की तो मेरी बात पूरी होने के पहले ही चालाक व अनुभवी दलाल मंगला ने कहा- पूरा सोनागाछी देखने-दिखाने में दो-तीन घंटे से कम टाइम नहीं लगेगा, साहब। मेरा तो आज का धंधा ही चौपट हो जाएगा।
आखिर में मुफ्त के चाय-नाश्ते-सिगरेट के बाद बेहयायी से मुस्कराते हुए मंगला धंधा चौपट करने के एवज में कुछ लेकर एक अड्डे पर मुझे ले गया। बीस-पच्चीस साल की दो लड़कियां अनमनी-सी कमरे के बाहर संकरे बरांडेनुमा गलियारे में खड़ी थीं। उन्होंने एक उचटती-सी नजर हम पर डाली और फिर नीचे से आने वाली सीढिय़ों की तरफ देखने लगीं।
मंगला मुझे लेकर कमरे में घुस गया। उसके साथ होने के कारण मैं निश्चिंत था। कमरे में सजधज कर बैठी, करीब तीस साल की औसत शक्ल-सूरत मगर अच्छे कद-काठी वाली युवती के चेहरे पर हमें देखकर पहले तो चमक उभरी। पर मैथिली में जैसे ही मंगला ने उससे कहा- देस से आए हैं, अपने भरोसे के आदमी हैं। थोड़ा यह सब देखना-जानना चाहते हैं- महिला के चेहरे पर झल्लाहट का भाव उभर आया। वह शिष्ट महिला थी और शायद मंगला के लिहाज के चलते वह उखड़ी तो नहीं, फिर भी नाराजगी की झलक देते सपाट लहजे में कहा- इसमें देखने-जानने का क्या है? हमलोग क्या कोई तमाशा हैं? अपने बारे में कुछ भी बोलने-बताने से उसने साफ मना कर दिया और अपने हावभाव से जता दिया कि मैं वहां से चलता बनूं।
इतनी देर में ही उस अच्छे-खासे आयताकार कमरे की एक झलक मिल चुकी थी। कमरे के एक सिरे पर लकड़ी की बंद आलमारी थी जिसमें शायद उसके कपड़े-लत्ते रहे होंगे। बेंत की इकलौती कुर्सी पर कुशन- ग्राहक के बैठने के लिए, तिपाईनुमा टेबुल, लकड़ी के तख्त पर हल्का गद्ïदेदार बिस्तर और साफ धुली चादर-उसी पर वह बैठी थी। कमरे के दूसरे छोर पर एक स्टैंड था, जिस पर प्लास्टिक का पानी भरा एक जग कांच की दो गिलासें और एक-दो प्लेटें पड़ी थीं। लंबाई वाली भीतरी दीवार में एक दरवाजा भी था, जिसपर परदा टंगा था। शायद वह बाथरूम और छोटी-मोटी रसोई जैसी जगह में खुलता हो। दीवार पर दो कैलेंडर अलग-अलग टंगे थे- एक, लेटे हुए शिव की छाती पर खड़ी, गले में मुंड-माला पहने, जीभ निकाले हुई काली का और दूसरा, सिर्फ चड्ढी पहने, खड़े, मांस-पेशियां दिखाते, चौड़ी छाती वाले बॉडीबिल्डर पहलवान का, जो निश्चय ही आनेवाले ग्राहक को चुनौती देता हुआ लगता होगा।
बहरहाल, कमरे से निकल कर जब मैं सीढिय़ां उतर रहा था, पीछे से बरामदे में खड़ी दोनों लड़कियों की जोरदार खिलखिलाहट सुनाई पड़ी।
.... जारी
सोनागाछी की सैर
अरविन्द चतुर्वेद
एक शाम हम तीन दोस्त बड़ी हिम्मत जुटाकर बदनाम बस्ती सोनागाछी की निषिद्ध गली के मुहाने पर खड़े हुए। इरादा था कि गली के इस पार से सेंट्रल एवेन्यू तक निकल कर पूरी गली का जायजा लिया जाए। इससे पहले हममें से कोई भी इस गली से होकर गुजरा नहीं था।
जबरन चेहरे पर सहजता लाने की कोशिश करते हुए हम गली में ऐसे घुसे, जैसे किसी भी गली या सड़क से आम तौर पर राहगीर गुजरते हैं। सोनागाछी की गली में मेला-सा लगा था। सड़क के दोनों किनारे पर बदन दिखाऊ पोशाकों में, चेहरे पर जरूरत से ज्यादा क्रीम-पावडर पोते अलग-अलग उम्र की किशोरियां, युवतियां और तमाम कोशिश के बावजूद बढ़ती उम्र की निशानियां न छिपा पाती अधेड़ औरतें।
यह जिस्म का बाजार है। ये औरतें-लड़कियां आपस में बातचीत भी कर रही हैं और आने-जाने वालों को तरह-तरह के इशारे भी। सारा माहौल रोशनी में जगमग है। छनती प्याज की पकौडिय़ों और आलूचाप की वजह से समूची गली में जलते तेल और बेसन की गंध समाई हुई है। पकौडिय़ों और पान-सिगरेट की इन छोटी-मोटी दुकानों पर दो-तीन दिनों की बढ़ी हुई दाढ़ी वाले तमाम लोग अड्डे जमाए हुए हैं।
इनमें कुछ लोग इधर-उधर चहलकदमी भी कर रहे हैं। सबकी निगाहें गली में आने-जाने वालों पर टिकी हैं। अजीब चमक है इन निगाहों में। आपसे अगर इनकी नजर मिली तो लगेगा जैसे निगाहों के जरिए आपके भीतर कुछ टटोला जा रहा है।
निगाहें हमारी भी मिलीं और उधर से इशारे भी हुए। पर हम बराबर सहज बने रहने की कोशिश के साथ यूं चलते रहे, जैसे इस दुनिया से हमारा कोई वास्ता नहीं है।
एक गुमटी के सामने सिगरेट सुलगाने के लिए हम खड़े ही हुए थे कि आजू-बाजू में तीन लोग आकर खड़े हो गए। हमारे कुछ बोले बिना ही किसी होटल के बेयरे की तरह उनका मुंहजबानी मेनू पेश हो गया-
- चलेगा, साब?
- बिल्कुल नया, ताजा माल है।
- एक बार देख तो लीजिए, तबियत खुश हो जाएगी।
फिर इसके बाद देश के जितने प्रदेशों के नाम उन्हें मालूम थे, उन सबका उन्होंने जाप कर डाला- बंगाली है, बिहारी है, यूपी है, पंजाबी है, मद्रासी है। नेपाली भी है। जो आपको पसंद हो, साहब।
इतना सुनते ही मेरे दोनों साथियों के चेहरे पर घबराहट उभर आई। अब वे जल्दी से जल्दी इस गली से निकल जाना चाहते थे। मैंने बात जारी रखने के खयाल से पूछा- कितने पैसे लगेंगे?
जवाब मिला- पचास रुपए से लेकर ढाई सौ तक। जैसी चीज, वैसा दाम। इससे ऊपर की भी हैं।
अब उनसे पीछा छुड़ाने के लिए काफी भरोसा दिलाते हुए मुझे कहना पड़ा- ठीक है, मैं अपने साथियों को सेंट्रल एवेन्यू तक छोड़कर अभी आता हूं। इन लोगों को नहीं जाना है।
(जारी)
एक शाम हम तीन दोस्त बड़ी हिम्मत जुटाकर बदनाम बस्ती सोनागाछी की निषिद्ध गली के मुहाने पर खड़े हुए। इरादा था कि गली के इस पार से सेंट्रल एवेन्यू तक निकल कर पूरी गली का जायजा लिया जाए। इससे पहले हममें से कोई भी इस गली से होकर गुजरा नहीं था।
जबरन चेहरे पर सहजता लाने की कोशिश करते हुए हम गली में ऐसे घुसे, जैसे किसी भी गली या सड़क से आम तौर पर राहगीर गुजरते हैं। सोनागाछी की गली में मेला-सा लगा था। सड़क के दोनों किनारे पर बदन दिखाऊ पोशाकों में, चेहरे पर जरूरत से ज्यादा क्रीम-पावडर पोते अलग-अलग उम्र की किशोरियां, युवतियां और तमाम कोशिश के बावजूद बढ़ती उम्र की निशानियां न छिपा पाती अधेड़ औरतें।
यह जिस्म का बाजार है। ये औरतें-लड़कियां आपस में बातचीत भी कर रही हैं और आने-जाने वालों को तरह-तरह के इशारे भी। सारा माहौल रोशनी में जगमग है। छनती प्याज की पकौडिय़ों और आलूचाप की वजह से समूची गली में जलते तेल और बेसन की गंध समाई हुई है। पकौडिय़ों और पान-सिगरेट की इन छोटी-मोटी दुकानों पर दो-तीन दिनों की बढ़ी हुई दाढ़ी वाले तमाम लोग अड्डे जमाए हुए हैं।
इनमें कुछ लोग इधर-उधर चहलकदमी भी कर रहे हैं। सबकी निगाहें गली में आने-जाने वालों पर टिकी हैं। अजीब चमक है इन निगाहों में। आपसे अगर इनकी नजर मिली तो लगेगा जैसे निगाहों के जरिए आपके भीतर कुछ टटोला जा रहा है।
निगाहें हमारी भी मिलीं और उधर से इशारे भी हुए। पर हम बराबर सहज बने रहने की कोशिश के साथ यूं चलते रहे, जैसे इस दुनिया से हमारा कोई वास्ता नहीं है।
एक गुमटी के सामने सिगरेट सुलगाने के लिए हम खड़े ही हुए थे कि आजू-बाजू में तीन लोग आकर खड़े हो गए। हमारे कुछ बोले बिना ही किसी होटल के बेयरे की तरह उनका मुंहजबानी मेनू पेश हो गया-
- चलेगा, साब?
- बिल्कुल नया, ताजा माल है।
- एक बार देख तो लीजिए, तबियत खुश हो जाएगी।
फिर इसके बाद देश के जितने प्रदेशों के नाम उन्हें मालूम थे, उन सबका उन्होंने जाप कर डाला- बंगाली है, बिहारी है, यूपी है, पंजाबी है, मद्रासी है। नेपाली भी है। जो आपको पसंद हो, साहब।
इतना सुनते ही मेरे दोनों साथियों के चेहरे पर घबराहट उभर आई। अब वे जल्दी से जल्दी इस गली से निकल जाना चाहते थे। मैंने बात जारी रखने के खयाल से पूछा- कितने पैसे लगेंगे?
जवाब मिला- पचास रुपए से लेकर ढाई सौ तक। जैसी चीज, वैसा दाम। इससे ऊपर की भी हैं।
अब उनसे पीछा छुड़ाने के लिए काफी भरोसा दिलाते हुए मुझे कहना पड़ा- ठीक है, मैं अपने साथियों को सेंट्रल एवेन्यू तक छोड़कर अभी आता हूं। इन लोगों को नहीं जाना है।
(जारी)
मुख्यमंत्री के चरण रज
अरविन्द चतुर्वेद
भक्ति की अपनी एक परंपरा है, जिसमें अपने गुरू या आराध्य के चरण रज माथे से लगाकर कोई भक्त अपने को धन्य समझता है और अपने आराध्य को स्वामी और खुद को उसका दास मानता है। इसी तरह सामंती जमाने से चली आ रही स्वामिभक्ति की परंपरा भी काफी लंबी है और सेवक बेचारे मालिक के पांव-पनही पर अपनी पगड़ी रखकर सेवकाई करते आए हैं। लेकिन यह जो हमारा लोकतंत्र है और जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की सरकार चल रही है, उसकी मुखिया के पांव-पनही की धूल अगर कोई अधिकारी अपनी जेब से रूमाल निकाल कर समेट ले और उस अमूल्य चरण रज को अपनी जेब में संचित करके कृतार्थ हो जाए तो इस कृत्य को किस कोटि में रखा जा सकता है? मुख्यमंत्री मायावती के औरैया दौरे के वक्त पुलिस के बड़े अफसर जो उनके प्रमुख सुरक्षा अधिकारी हैं, उस पद्म सिंह ने यह अदूभुत पराक्रम कर दिखाया है। अगर इसे प्रतीक मानें तो क्या इसमें कोई शक है कि प्रदेश की नौकरशाही बसपा सरकार की चेरी बन गई है। सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी का जो चुनाव चिन्ह हाथी अब गणेश बन गया है, कुछ अधिकारी और पुलिस विभाग के लोग अपना वास्तविक कामकाज छोड़कर इसके मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की वास्तव में गणेश परिक्रमा ही कर रहे हैं और इसका पुरस्कार लाभ ले रहे हैं। ऐसे अधिकारियों का मनोबल क्या उनकी दासवृत्ति के चलते सियासत के पांव के नीचे नहीं कुचला जा रहा है? तभी तो बलात्कार व यौन शोषण और महिला उत्पीड़न के आरोपी विधायकों और मंत्रियों का पुलिस व नागरिक प्रशासन हर संभव ढाल बन जाता है और पीड़िताओं को ही जेल में ठंूस दिया जाता है। गौरतलब है कि गत रविवार को औरैया में विकास कायों का जायजा लेने के लिए मुख्यमंत्री मायावती के अछलदा ब्लाक के नौनीपुर गांव पहुंचने पर उनके सुरक्षा प्रमुख पदूम सिंह ने अपने रूमाल से उनके जूते साफ किए थे। कुछ टेलीविजन चैनलों पर इसकी फुटेज भी दिखाई गई। कोई ताज्जुब नहीं कि स्वामिभक्ति की इस होड़ में इस घटना से शमिंदा होने के बजाय गणेश परिक्रमा को आतुर प्रदेश के दूसरे अफसर प्रेरणा लेने लगें। उत्तर प्रदेश में नौकरशाही क्यों विकास को जमीनी अमली जामा पहनाने के बजाय कागजी घोड़े दौड़ा रही है और कानून-व्यवस्था अराजकता का शिकार है, यह आसानी से समझा जा सकता है। मुख्यमंत्री का चरण रज लेने की यह परंपरा दरअसल पांवपुजाऊ उसी ब्राrाणवाद का नव संस्करण है, जिसकी आलोचना व निंदा हमारे संविधान निर्माता और खुद बसपा के प्रेरणा पुरूष बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर ने की थी। क्या गजब है कि सत्ता के सिंहासन ने समूचे विचार दर्शन को सिर के बल खड़ा करते हुए नव ब्राrाणवाद की नींव ही नहीं डाली है बल्कि भव्य भवन खड़ा कर लिया है। यह लोकतंत्र की मर्यादा और सरकार के आचरण दोनों के लिए वास्तव में शर्मनाक है।
भक्ति की अपनी एक परंपरा है, जिसमें अपने गुरू या आराध्य के चरण रज माथे से लगाकर कोई भक्त अपने को धन्य समझता है और अपने आराध्य को स्वामी और खुद को उसका दास मानता है। इसी तरह सामंती जमाने से चली आ रही स्वामिभक्ति की परंपरा भी काफी लंबी है और सेवक बेचारे मालिक के पांव-पनही पर अपनी पगड़ी रखकर सेवकाई करते आए हैं। लेकिन यह जो हमारा लोकतंत्र है और जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की सरकार चल रही है, उसकी मुखिया के पांव-पनही की धूल अगर कोई अधिकारी अपनी जेब से रूमाल निकाल कर समेट ले और उस अमूल्य चरण रज को अपनी जेब में संचित करके कृतार्थ हो जाए तो इस कृत्य को किस कोटि में रखा जा सकता है? मुख्यमंत्री मायावती के औरैया दौरे के वक्त पुलिस के बड़े अफसर जो उनके प्रमुख सुरक्षा अधिकारी हैं, उस पद्म सिंह ने यह अदूभुत पराक्रम कर दिखाया है। अगर इसे प्रतीक मानें तो क्या इसमें कोई शक है कि प्रदेश की नौकरशाही बसपा सरकार की चेरी बन गई है। सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी का जो चुनाव चिन्ह हाथी अब गणेश बन गया है, कुछ अधिकारी और पुलिस विभाग के लोग अपना वास्तविक कामकाज छोड़कर इसके मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की वास्तव में गणेश परिक्रमा ही कर रहे हैं और इसका पुरस्कार लाभ ले रहे हैं। ऐसे अधिकारियों का मनोबल क्या उनकी दासवृत्ति के चलते सियासत के पांव के नीचे नहीं कुचला जा रहा है? तभी तो बलात्कार व यौन शोषण और महिला उत्पीड़न के आरोपी विधायकों और मंत्रियों का पुलिस व नागरिक प्रशासन हर संभव ढाल बन जाता है और पीड़िताओं को ही जेल में ठंूस दिया जाता है। गौरतलब है कि गत रविवार को औरैया में विकास कायों का जायजा लेने के लिए मुख्यमंत्री मायावती के अछलदा ब्लाक के नौनीपुर गांव पहुंचने पर उनके सुरक्षा प्रमुख पदूम सिंह ने अपने रूमाल से उनके जूते साफ किए थे। कुछ टेलीविजन चैनलों पर इसकी फुटेज भी दिखाई गई। कोई ताज्जुब नहीं कि स्वामिभक्ति की इस होड़ में इस घटना से शमिंदा होने के बजाय गणेश परिक्रमा को आतुर प्रदेश के दूसरे अफसर प्रेरणा लेने लगें। उत्तर प्रदेश में नौकरशाही क्यों विकास को जमीनी अमली जामा पहनाने के बजाय कागजी घोड़े दौड़ा रही है और कानून-व्यवस्था अराजकता का शिकार है, यह आसानी से समझा जा सकता है। मुख्यमंत्री का चरण रज लेने की यह परंपरा दरअसल पांवपुजाऊ उसी ब्राrाणवाद का नव संस्करण है, जिसकी आलोचना व निंदा हमारे संविधान निर्माता और खुद बसपा के प्रेरणा पुरूष बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर ने की थी। क्या गजब है कि सत्ता के सिंहासन ने समूचे विचार दर्शन को सिर के बल खड़ा करते हुए नव ब्राrाणवाद की नींव ही नहीं डाली है बल्कि भव्य भवन खड़ा कर लिया है। यह लोकतंत्र की मर्यादा और सरकार के आचरण दोनों के लिए वास्तव में शर्मनाक है।
रात की बात
अरविन्द चतुर्वेद
सुबह होते ही जन समुद्र में शोर की उठती-गिरती लहरों पर किसी बड़े जहाज की तरह हिचकोले खाने लगता है अपना यह कोलकाता महानगर। रात की परछाइयां सुबह के उजाले में कहां छिप जाती हैं, पता ही नहीं चलता। पर शाम होते ही दूधिया रोशनी की झिलमिलाहट के बीच अंधेरे के साए जगह-जगह से उभरने लगते हैं। जैसे-जैसे रात गहराती जाती है, सड़कों पर आवाजाही थमती है, दुकानों के पट गिर जाते हैं और ऊंचे-नीचे मकानों की बंद खिड़कियों के शीशे से किसिम-किसिम की मद्धिम-सी रंगीन रोशनियां भर नजर आती हैं- तब शुरू होता है रात का सफर। दिन के उजाले में छिपी खामोश अंधेरी दुनिया रोज जब रात को बारह का गजर होता है, भरपूर अंगड़ाई लेकर जाग चुकी होती है। अपने कारोबार में, कमाल और करतूत में खामोशी से काम लेती रात की परछाइयों का कद बहुमंजिली इमारतों जितना बड़ा भी हो सकता है- होता है। सन्नाटे का ऐसा आलम कि कोई गहरी चीख भी उठे तो डूबकर रह जाए। दूसरे-तीसरे दिन लोग यह खबर पाते हैं कि पिछली रात फलां इलाके में लावारिश लाश मिली। फलां जगह लूट लिया। फलां जगह ये हुआ, फलां जगह वो हुआ... पिछली रात... वगैरह।
इस सबसे बेखबर रात की स्याह चादर ओढ़े फुटपाथ पर पसरे बेपनाह सपनों की दुनिया है- औरत-मर्द, बूढ़े-जवान-बच्चे, भिखमंगे, बीमार, विक्षिप्त-अर्धविक्षिप्त। जानवर और आदमी के बीच का फर्क बनाए रखने के लिए ही शायद आवारा कुत्ते उनसे हाथ-दो हाथ की दूरी बनाकर सोते हैं। यह सर्वहारा है कोलकाता का, जिसके सामने वाम मोर्चा सरकार का साम्यवाद फुस्स हो जाता है। किसी कड़वी सच्चाई की तरह नंगी, गैरपोशीदा इस फुटपाथी दुनिया में भी लुक-छिपकर कई पोशीदा काम होते रहते हैं। यह और बात है कि कम्यूनिज्म के पिता माक्र्स की सूक्ति दोहरा कर आप संतोष कर लें- नंगे-भूखे आदमी की कोई नैतिकता नहीं होती। पर हकीकत यही है कि धरती पर अगर कहीं नरक है तो हावड़ा पुल के कोलकाता-छोर के नीचे दो तरफ से आनेवाली सड़कों के बीच बने मूत्र सिंचित कूड़े के गोदामनुमा फुटपाथी रैन बसेरों में ही है। ऐसे नरक सियालदह स्टेशन के पुल के इर्द-गिर्द भी है।
महानगर के दोनों रेलवे स्टेशन हावड़ा और सियालदह तेज रोशनी में रतजगा मना रहे हैं। देर से आने या जाने वाली ट्रेनों के मुसाफिरों की आंखों में नींद करवट बदल रही है, कुछ झपकी ले रहे हैं, कुछ लम्बी जम्हाई। कुछ चाय-सिगरेट पीते हुए नींद से मुठभेड़ कर रहे हैं। इन सबसे कुछ गज की दूरी पर या झिलमिल अंधेरे कोने में स्टेशन में- प्लेटफार्म पर बिल्ली आंखें चमक रही हैं- घात लगाए शिकारी आंखें। कब आंख झपके और कब ब्रीफकेस गायब। कोई दिलफेंक मुसाफिर किसी लफड़े में फंस जाए। कुली के भेस में ही कोई गच्चा दे जाए।
सुबह होते ही जन समुद्र में शोर की उठती-गिरती लहरों पर किसी बड़े जहाज की तरह हिचकोले खाने लगता है अपना यह कोलकाता महानगर। रात की परछाइयां सुबह के उजाले में कहां छिप जाती हैं, पता ही नहीं चलता। पर शाम होते ही दूधिया रोशनी की झिलमिलाहट के बीच अंधेरे के साए जगह-जगह से उभरने लगते हैं। जैसे-जैसे रात गहराती जाती है, सड़कों पर आवाजाही थमती है, दुकानों के पट गिर जाते हैं और ऊंचे-नीचे मकानों की बंद खिड़कियों के शीशे से किसिम-किसिम की मद्धिम-सी रंगीन रोशनियां भर नजर आती हैं- तब शुरू होता है रात का सफर। दिन के उजाले में छिपी खामोश अंधेरी दुनिया रोज जब रात को बारह का गजर होता है, भरपूर अंगड़ाई लेकर जाग चुकी होती है। अपने कारोबार में, कमाल और करतूत में खामोशी से काम लेती रात की परछाइयों का कद बहुमंजिली इमारतों जितना बड़ा भी हो सकता है- होता है। सन्नाटे का ऐसा आलम कि कोई गहरी चीख भी उठे तो डूबकर रह जाए। दूसरे-तीसरे दिन लोग यह खबर पाते हैं कि पिछली रात फलां इलाके में लावारिश लाश मिली। फलां जगह लूट लिया। फलां जगह ये हुआ, फलां जगह वो हुआ... पिछली रात... वगैरह।
इस सबसे बेखबर रात की स्याह चादर ओढ़े फुटपाथ पर पसरे बेपनाह सपनों की दुनिया है- औरत-मर्द, बूढ़े-जवान-बच्चे, भिखमंगे, बीमार, विक्षिप्त-अर्धविक्षिप्त। जानवर और आदमी के बीच का फर्क बनाए रखने के लिए ही शायद आवारा कुत्ते उनसे हाथ-दो हाथ की दूरी बनाकर सोते हैं। यह सर्वहारा है कोलकाता का, जिसके सामने वाम मोर्चा सरकार का साम्यवाद फुस्स हो जाता है। किसी कड़वी सच्चाई की तरह नंगी, गैरपोशीदा इस फुटपाथी दुनिया में भी लुक-छिपकर कई पोशीदा काम होते रहते हैं। यह और बात है कि कम्यूनिज्म के पिता माक्र्स की सूक्ति दोहरा कर आप संतोष कर लें- नंगे-भूखे आदमी की कोई नैतिकता नहीं होती। पर हकीकत यही है कि धरती पर अगर कहीं नरक है तो हावड़ा पुल के कोलकाता-छोर के नीचे दो तरफ से आनेवाली सड़कों के बीच बने मूत्र सिंचित कूड़े के गोदामनुमा फुटपाथी रैन बसेरों में ही है। ऐसे नरक सियालदह स्टेशन के पुल के इर्द-गिर्द भी है।
महानगर के दोनों रेलवे स्टेशन हावड़ा और सियालदह तेज रोशनी में रतजगा मना रहे हैं। देर से आने या जाने वाली ट्रेनों के मुसाफिरों की आंखों में नींद करवट बदल रही है, कुछ झपकी ले रहे हैं, कुछ लम्बी जम्हाई। कुछ चाय-सिगरेट पीते हुए नींद से मुठभेड़ कर रहे हैं। इन सबसे कुछ गज की दूरी पर या झिलमिल अंधेरे कोने में स्टेशन में- प्लेटफार्म पर बिल्ली आंखें चमक रही हैं- घात लगाए शिकारी आंखें। कब आंख झपके और कब ब्रीफकेस गायब। कोई दिलफेंक मुसाफिर किसी लफड़े में फंस जाए। कुली के भेस में ही कोई गच्चा दे जाए।
छह-छह पैसा चल कलकत्ता
अरविन्द चतुर्वेद
तीन गांवों को खरीद कर कलकत्ता उर्फ कोलकाता की नींव डालने वाले जॉब चार्नाक ने भी कभी यह कल्पना नहीं की होगी कि तीन सौ साल बाद यह महानगर इतना बड़ा मायावी, इतना बहुरूपिया बन जाएगा। बंगाली बाबुओं का कलकत्ता आजादी के बाद से ही लगातार सिमटता गया है। महानगर की कुछ खास पुरानी बस्तियों-गलियों में मिट्टी के कुल्हड़ में चाय की चुस्कियों के बीच बीड़ी के कश के साथ खांसी की ठक्-ठक् में सांसें नाप रहा है। यह वही कलकत्ता है, जिसकी ताक-झांक राजकमल चौधरी के उपन्यासों-कहानियों में बखूबी दिखाई देती है। दूसरी ओर, हाय महंगाई-हाय बेकारी में ऊभ-चूभ करता एक दूसरा कलकत्ता भी है जो बेकारों या सरकारी-गैर सरकारी कामगारों के रंग-बिरंगे जुलूस के रूप में सड़कों का यातायात जाम करता दिते हबे-दिते हबे (देना होगा-देना होगा) की रट लगाता शहीद मीनार धर्मतल्ला में धर्मघट (जनसभा) किए हुए है। पता नहीं, राजीव गांधी ने कलकत्ता के किस रूप को देखकर यह विवादास्पद टिप्पणी की थी कि कलकत्ता मरता हुआ शहर है। लेकिन इतना निश्चित ही कहा जा सकता है कि वे जो रूप देख सके होंगे, वह बहुरूपिया महानगर की कोई एक खास शक्ल होगी- मौत का इंतजार करते रोगी की। मगर कलकत्ता मर नहीं सकता। काली का यह शहर रक्तबीज है।
कलकत्ता जैसे महानगर तो अमरबेल की तरह होते हैं, जो और भी ज्यादा-ज्यादा फैलते जाते हैं, भले ही वह जिंदगी छीजती चली जाती है जिससे यह अमरबेल रस चूस कर अमर होती है।
कलकत्ता के जन-समुद्र में आबादी का ज्वार ही ज्वार है। वरना महानगर का तट तोड़कर बाड़ी-गाड़ी-बंगला वालों की साल्टलेक सिटी पैदा न होती।
आज दमदम हवाई अड्डा और उससे भी आगे तक फैली नई आबादी की बस्तियां जन-समुद्र में आबादी के ज्वार का ही नतीजा हैं। आबादी का यह ज्वार महानगर के चौतरफा देखा जा सकता है। मेट्रो रेल के चालू होने के बावजूद बसों में भीड़ कम होने के बजाय कुछ ज्यादा ही हुई है। महानगर में आबादी के उफान का अहसास चौबीस परगना और हावड़ा-हुगली जिलों के उपनगरों में रिहायशी जमीन की कीमत से भी किया जा सकता है। जो जमीन दस-पंद्रह साल पहले चार-पांच हजार रुपए कट्ठा की दर से आसानी से मिल जाती थी, वही जमीन आज साठ-सत्तर हजार रुपए कट्ठा की कीमत पर भी मुश्किल से मिल पाती है।
मगर कलकत्ता इतना भर ही हो तो फिर कलकत्ता क्या! अमरबेल की तरह फैलते कलकत्ता में अगर जिंदगी की छीजन देखनी हो तो फुटपाथों पर, पुलों के नीचे, सरकारी और पुरानी इमारतों के अनुपयोगी बरामदों और कोनों में छितराई-सिमटी स्थाई-अस्थाई फुटपाथी आबादी को देखिए। फुटपाथ पर और खुले आसमान के नीचे जिंदगी बसर करने वालों की तादाद हजारों में नहीं, लाखों में है। खुले पार्कों और वृक्षों के नीचे रहने वाले पॉलिथिन, बोरे और टाट के टुकड़ों से अपना रैन बसेरा बनाए हुए हैं। कूड़े के ढेर से रद्ïदी बीनने वाले, होटलों के जूठन पर पेट पालने वाले, पैंतीस-चालीस की उम्र होने तक बुढ़ा जानेवाले लोगों की यह जिंदगी भले ही क्षण-भंगुर हो, मगर उनका संसार क्षण-भंगुर नहीं है। तमाम सरकारी फाइलें और योजनाएं मुंह चुराती फिरती हैं इस दुनिया से। यह न तो मुख्यमंत्री कामरेड ज्योति बसु का कलकत्ता था और न मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्ïटाचार्य का कलकत्ता है।
सियालदह में ऐसे ही एक फुटपाथ पर रहने वाले लगभग 35 वर्षीय मुकुंद दास ने बताया- भइया, इसी फुटपाथ पर चोर, गुंडे, पाकेटमार, वैगन-ब्रेकर आदि भी पैदा होते हैं, वे लोग तो किसी के लिए किराए पर या गिरोह में काम करते हैं, इसलिए धर-पकड़ होने पर आसानी से छूट जाते हैं, पर मेरे जैसा यदि कोई पेट के लिए मजबूर होकर कुछ करता है तो पिटाई अलग, जेल में ले जाकर ठूंस देते हैं।
इसी तरह सियालदह इलाके में ही फुटपाथ पर, मगर दिन के उजाले में नहीं, रात के अंधेरे में रहने वाली अस्थाई फुटपाथी लड़कियां शांति, विमला और वंदना ने काफी झिझक और ना-नुकुर के बाद यह कबूल किया कि वे देह का धंधा करती हैं। बहूबाजार में सड़क के नुक्कड़ पर वे शाम को खड़ी हो जाती हैं तो रातभर में सौ-डेढ़ सौ रुपए या कभी-कभी इससे ज्यादा भी कमा लेती हैं। कारण वही गरीबी, छोटे-छोटे भाई-बहन और बूढ़े-बीमार मां-बाप। चौबीस परगना जिले के देहात की हैं ये लड़कियां। पुलिस की वसूली और वजह-बेवजह तंग किए जाने की शिकायत इन्हें भी है। महानगर के जीवन की छीजन की यह आखिरी परत है। मगर एक परत और भी है, जिसे सोनागाछी, मुंशीगंज, बहूबाजार आदि देह व्यापार की बड़ी मंडियों के रूप में देखा जा सकता है।
बहरहाल, यह तो अकेले कोलकाता की ही नहीं, मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों की भी साझा त्रासदी है। मगर कोलकाता की सर्वाधिक मार्मिक और कारुणिक तसवीर तो वह है, जो उत्तर प्रदेश और बिहार की तरफ से होकर आनेवाली रेलगाडिय़ों की कोख से पैदा होती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, इलाहाबाद, जौनपुर, आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर, गोरखपुर और बिहार के आरा, छपरा, गया, सिवान, पटना, भागलपुर आदि जिलों के गांवों-कस्बों से कोलकाता कमाने आए लाखों परदेसियों की व्यथा-कथा इन जिलों के देहात में लोकगीत बनकर जैसे औरतों के कंठहार बन गई है। कोलकाता महानगर अपने परदेसी की प्रतीक्षा में दिन गुजारने वाली औरतों के लिए एक टीस है- किसी सौत से कम नहीं है। अकेले महानगर में रहने वाले भोजपुरी भाषा-भाषियों की तादाद पंद्रह लाख से ऊपर पहुंचती है। उत्तर प्रदेश और बिहार के जातियों की बेड़ी में जकड़े इन सामंती जिलों के नौजवान-अधेड़ और बूढ़े हर साल सूखा और बाढ़ की मार खाकर ट्रेनों में टिड्डियों के दल की भांति चढ़ते हैं और हावड़ा का पुल पार करके महानगर की मायावी गुफा में समा जाते हैं।
अच्छा कमाएंगे, चार पैसा जुटाएंगे और फिर घर वापस लौट जाएंगे- का सपना लेकर आनेवालों के सपने रास्ते में ही ट्रेन की भीड़भाड़ और धक्कामुक्की में जो दबना-कुचलना शुरू होते हैं तो महानगर में पहुंचते-पहुंचते लहूलुहान हो जाते हैं। कठिन मेहनत-मशक्कत से सालभर में कमाकर, कलेजे पर पत्थर रखे, पेट काटे किसी भोजपुरी मजदूर की जेब वापसी में अगर मोकामा पैसेंजर में कट जाए और वह बुक्का फाड़कर माई गे-बाबू गे की दुहाई देता हुआ रो पड़े तो उस महाकरुणा की गिरफ्त में आने से बच पाना किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए मुश्किल हो जाता है।
कोलकाता के मोटिया मजदूर, होटल-रेस्तराओं में पानी भरते, बर्तन धोते, झालमुड़ी बेचते, पार्कों में चलती-फिरती अंगीठियों में गरम चाय बेचते, खोमचा लगाते, ठेला खींचते, पीठ पर माल ढोते-माल उतारते और हावड़ा-सियालदह के प्लेटफार्म पर आधे बांह की लाल कमीज पहने कुलियों के रूप में यूपी-बिहार के ये भोजपुरी लोग मिल जाएंगे। उजड्ïड-गंवार की हिकारत झेलकर, कनपटी का पसीना पोंछ मुस्करा देनेवाले इस भोजपुरी बिहारी को पता नहीं कब लागा झुलनिया का धक्का, बलम कलकत्ता निकल गए। इन लाखों भोजपुरी भाषियों के लिए रवींद्र सदन, अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स, सिनेमा का सरकारी पे्रक्षागृह नंदन आदि कोई अर्थ नहीं रखते। रामऔतार उपाध्याय नामक तोता-भविष्य वाचक एक ज्योतिषी, जो चौरंगी के फुटपाथ पर बरसों से बैठते आ रहे हैं, बताते हैं कि वे पहली बार जब कलकत्ता आए थे तब उनकी उम्र पंद्रह साल थी, आज वे छप्पन साल के हैं। बीस साल पहले उनकी कमाई अच्छी थी, मगर अब दिनभर में पचास रुपए भी मिल जाएं तो गनीमत है। फिर भी कहते हैं- जब सारी उमर इसी कलकत्ते में कट गई तो अब अंत में कहां जाएंगे, बचवा?
पता नहीं, ऐसे कितने रामऔतार इस कोलकाता में होंगे, जो भिखारी ठाकुर के बिदेसिया का सच ढो रहे हैं-
छह रे महीना कहि के गइले कलकतवा,
बीति गइले बारह बरिस रे बिदेसिया...
अब कोयला इंजन वाली ट्रेन का जमाना तो रहा नहीं और न छह पैसे का एक आनेवाला, लेकिन उसी जमाने से यूपी-बिहार के लोग परदेसी बनकर कोलकाता खाने-कमाने आते रहे हैं। यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। उनको ढोनेवाले इंजन की छुक-छुक्, छक्-छक् भोजपुरी इलाकों के देहात में बच्चों के रेल के खेल का छह-छह पैसा चल कलकत्ता बन गया है। देखिए कि आदमी अपने विषाद को भी कैसे विनोद में बदल देता है!
तीन गांवों को खरीद कर कलकत्ता उर्फ कोलकाता की नींव डालने वाले जॉब चार्नाक ने भी कभी यह कल्पना नहीं की होगी कि तीन सौ साल बाद यह महानगर इतना बड़ा मायावी, इतना बहुरूपिया बन जाएगा। बंगाली बाबुओं का कलकत्ता आजादी के बाद से ही लगातार सिमटता गया है। महानगर की कुछ खास पुरानी बस्तियों-गलियों में मिट्टी के कुल्हड़ में चाय की चुस्कियों के बीच बीड़ी के कश के साथ खांसी की ठक्-ठक् में सांसें नाप रहा है। यह वही कलकत्ता है, जिसकी ताक-झांक राजकमल चौधरी के उपन्यासों-कहानियों में बखूबी दिखाई देती है। दूसरी ओर, हाय महंगाई-हाय बेकारी में ऊभ-चूभ करता एक दूसरा कलकत्ता भी है जो बेकारों या सरकारी-गैर सरकारी कामगारों के रंग-बिरंगे जुलूस के रूप में सड़कों का यातायात जाम करता दिते हबे-दिते हबे (देना होगा-देना होगा) की रट लगाता शहीद मीनार धर्मतल्ला में धर्मघट (जनसभा) किए हुए है। पता नहीं, राजीव गांधी ने कलकत्ता के किस रूप को देखकर यह विवादास्पद टिप्पणी की थी कि कलकत्ता मरता हुआ शहर है। लेकिन इतना निश्चित ही कहा जा सकता है कि वे जो रूप देख सके होंगे, वह बहुरूपिया महानगर की कोई एक खास शक्ल होगी- मौत का इंतजार करते रोगी की। मगर कलकत्ता मर नहीं सकता। काली का यह शहर रक्तबीज है।
कलकत्ता जैसे महानगर तो अमरबेल की तरह होते हैं, जो और भी ज्यादा-ज्यादा फैलते जाते हैं, भले ही वह जिंदगी छीजती चली जाती है जिससे यह अमरबेल रस चूस कर अमर होती है।
कलकत्ता के जन-समुद्र में आबादी का ज्वार ही ज्वार है। वरना महानगर का तट तोड़कर बाड़ी-गाड़ी-बंगला वालों की साल्टलेक सिटी पैदा न होती।
आज दमदम हवाई अड्डा और उससे भी आगे तक फैली नई आबादी की बस्तियां जन-समुद्र में आबादी के ज्वार का ही नतीजा हैं। आबादी का यह ज्वार महानगर के चौतरफा देखा जा सकता है। मेट्रो रेल के चालू होने के बावजूद बसों में भीड़ कम होने के बजाय कुछ ज्यादा ही हुई है। महानगर में आबादी के उफान का अहसास चौबीस परगना और हावड़ा-हुगली जिलों के उपनगरों में रिहायशी जमीन की कीमत से भी किया जा सकता है। जो जमीन दस-पंद्रह साल पहले चार-पांच हजार रुपए कट्ठा की दर से आसानी से मिल जाती थी, वही जमीन आज साठ-सत्तर हजार रुपए कट्ठा की कीमत पर भी मुश्किल से मिल पाती है।
मगर कलकत्ता इतना भर ही हो तो फिर कलकत्ता क्या! अमरबेल की तरह फैलते कलकत्ता में अगर जिंदगी की छीजन देखनी हो तो फुटपाथों पर, पुलों के नीचे, सरकारी और पुरानी इमारतों के अनुपयोगी बरामदों और कोनों में छितराई-सिमटी स्थाई-अस्थाई फुटपाथी आबादी को देखिए। फुटपाथ पर और खुले आसमान के नीचे जिंदगी बसर करने वालों की तादाद हजारों में नहीं, लाखों में है। खुले पार्कों और वृक्षों के नीचे रहने वाले पॉलिथिन, बोरे और टाट के टुकड़ों से अपना रैन बसेरा बनाए हुए हैं। कूड़े के ढेर से रद्ïदी बीनने वाले, होटलों के जूठन पर पेट पालने वाले, पैंतीस-चालीस की उम्र होने तक बुढ़ा जानेवाले लोगों की यह जिंदगी भले ही क्षण-भंगुर हो, मगर उनका संसार क्षण-भंगुर नहीं है। तमाम सरकारी फाइलें और योजनाएं मुंह चुराती फिरती हैं इस दुनिया से। यह न तो मुख्यमंत्री कामरेड ज्योति बसु का कलकत्ता था और न मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्ïटाचार्य का कलकत्ता है।
सियालदह में ऐसे ही एक फुटपाथ पर रहने वाले लगभग 35 वर्षीय मुकुंद दास ने बताया- भइया, इसी फुटपाथ पर चोर, गुंडे, पाकेटमार, वैगन-ब्रेकर आदि भी पैदा होते हैं, वे लोग तो किसी के लिए किराए पर या गिरोह में काम करते हैं, इसलिए धर-पकड़ होने पर आसानी से छूट जाते हैं, पर मेरे जैसा यदि कोई पेट के लिए मजबूर होकर कुछ करता है तो पिटाई अलग, जेल में ले जाकर ठूंस देते हैं।
इसी तरह सियालदह इलाके में ही फुटपाथ पर, मगर दिन के उजाले में नहीं, रात के अंधेरे में रहने वाली अस्थाई फुटपाथी लड़कियां शांति, विमला और वंदना ने काफी झिझक और ना-नुकुर के बाद यह कबूल किया कि वे देह का धंधा करती हैं। बहूबाजार में सड़क के नुक्कड़ पर वे शाम को खड़ी हो जाती हैं तो रातभर में सौ-डेढ़ सौ रुपए या कभी-कभी इससे ज्यादा भी कमा लेती हैं। कारण वही गरीबी, छोटे-छोटे भाई-बहन और बूढ़े-बीमार मां-बाप। चौबीस परगना जिले के देहात की हैं ये लड़कियां। पुलिस की वसूली और वजह-बेवजह तंग किए जाने की शिकायत इन्हें भी है। महानगर के जीवन की छीजन की यह आखिरी परत है। मगर एक परत और भी है, जिसे सोनागाछी, मुंशीगंज, बहूबाजार आदि देह व्यापार की बड़ी मंडियों के रूप में देखा जा सकता है।
बहरहाल, यह तो अकेले कोलकाता की ही नहीं, मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों की भी साझा त्रासदी है। मगर कोलकाता की सर्वाधिक मार्मिक और कारुणिक तसवीर तो वह है, जो उत्तर प्रदेश और बिहार की तरफ से होकर आनेवाली रेलगाडिय़ों की कोख से पैदा होती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, इलाहाबाद, जौनपुर, आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर, गोरखपुर और बिहार के आरा, छपरा, गया, सिवान, पटना, भागलपुर आदि जिलों के गांवों-कस्बों से कोलकाता कमाने आए लाखों परदेसियों की व्यथा-कथा इन जिलों के देहात में लोकगीत बनकर जैसे औरतों के कंठहार बन गई है। कोलकाता महानगर अपने परदेसी की प्रतीक्षा में दिन गुजारने वाली औरतों के लिए एक टीस है- किसी सौत से कम नहीं है। अकेले महानगर में रहने वाले भोजपुरी भाषा-भाषियों की तादाद पंद्रह लाख से ऊपर पहुंचती है। उत्तर प्रदेश और बिहार के जातियों की बेड़ी में जकड़े इन सामंती जिलों के नौजवान-अधेड़ और बूढ़े हर साल सूखा और बाढ़ की मार खाकर ट्रेनों में टिड्डियों के दल की भांति चढ़ते हैं और हावड़ा का पुल पार करके महानगर की मायावी गुफा में समा जाते हैं।
अच्छा कमाएंगे, चार पैसा जुटाएंगे और फिर घर वापस लौट जाएंगे- का सपना लेकर आनेवालों के सपने रास्ते में ही ट्रेन की भीड़भाड़ और धक्कामुक्की में जो दबना-कुचलना शुरू होते हैं तो महानगर में पहुंचते-पहुंचते लहूलुहान हो जाते हैं। कठिन मेहनत-मशक्कत से सालभर में कमाकर, कलेजे पर पत्थर रखे, पेट काटे किसी भोजपुरी मजदूर की जेब वापसी में अगर मोकामा पैसेंजर में कट जाए और वह बुक्का फाड़कर माई गे-बाबू गे की दुहाई देता हुआ रो पड़े तो उस महाकरुणा की गिरफ्त में आने से बच पाना किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए मुश्किल हो जाता है।
कोलकाता के मोटिया मजदूर, होटल-रेस्तराओं में पानी भरते, बर्तन धोते, झालमुड़ी बेचते, पार्कों में चलती-फिरती अंगीठियों में गरम चाय बेचते, खोमचा लगाते, ठेला खींचते, पीठ पर माल ढोते-माल उतारते और हावड़ा-सियालदह के प्लेटफार्म पर आधे बांह की लाल कमीज पहने कुलियों के रूप में यूपी-बिहार के ये भोजपुरी लोग मिल जाएंगे। उजड्ïड-गंवार की हिकारत झेलकर, कनपटी का पसीना पोंछ मुस्करा देनेवाले इस भोजपुरी बिहारी को पता नहीं कब लागा झुलनिया का धक्का, बलम कलकत्ता निकल गए। इन लाखों भोजपुरी भाषियों के लिए रवींद्र सदन, अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स, सिनेमा का सरकारी पे्रक्षागृह नंदन आदि कोई अर्थ नहीं रखते। रामऔतार उपाध्याय नामक तोता-भविष्य वाचक एक ज्योतिषी, जो चौरंगी के फुटपाथ पर बरसों से बैठते आ रहे हैं, बताते हैं कि वे पहली बार जब कलकत्ता आए थे तब उनकी उम्र पंद्रह साल थी, आज वे छप्पन साल के हैं। बीस साल पहले उनकी कमाई अच्छी थी, मगर अब दिनभर में पचास रुपए भी मिल जाएं तो गनीमत है। फिर भी कहते हैं- जब सारी उमर इसी कलकत्ते में कट गई तो अब अंत में कहां जाएंगे, बचवा?
पता नहीं, ऐसे कितने रामऔतार इस कोलकाता में होंगे, जो भिखारी ठाकुर के बिदेसिया का सच ढो रहे हैं-
छह रे महीना कहि के गइले कलकतवा,
बीति गइले बारह बरिस रे बिदेसिया...
अब कोयला इंजन वाली ट्रेन का जमाना तो रहा नहीं और न छह पैसे का एक आनेवाला, लेकिन उसी जमाने से यूपी-बिहार के लोग परदेसी बनकर कोलकाता खाने-कमाने आते रहे हैं। यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। उनको ढोनेवाले इंजन की छुक-छुक्, छक्-छक् भोजपुरी इलाकों के देहात में बच्चों के रेल के खेल का छह-छह पैसा चल कलकत्ता बन गया है। देखिए कि आदमी अपने विषाद को भी कैसे विनोद में बदल देता है!
क्या हमाम में सभी नंगे हैं-इसी मुहावरे से काम चलाते रहेंगे?
अरविन्द चतुर्वेद :
संसद से सड़क तक भ्रष्टाचार-त्रिकोण की ही गूंज है। इस गूंज में बिहार विधान सभा चुनाव के आखिरी चरण की चर्चा समेत तमाम बड़ी घटनाएं तक धुंध और धुंधलके में ढक गइं। मसलन, असम में नए सिरे से बोडो उग्रवादियों की हिंसा भी लोगों और मीडिया की आंखों से ओझल होकर रह गई, जिसके शिकार हिन्दीभाषी खासकर बिहारी लोग हुए हैं और अब वहां से दहशत के मारे पलायन के बारे में सोच रहे हैं। भ्रष्टाचार-त्रिकोण यानी आदर्श सोसायटी-कामनवेल्थ खेल-2जी स्पेक्ट्रम ने पांच दिनों से संसद को लगभग ठप्प करके रखा है। मंत्री पद से हटने या हटाए जाने के बावजूद पूर्व केंद्रीय संचार मंत्री ए. राजा की जान सस्ते में छूटती नजर नहीं आ रही, बल्कि सच कहिए तो राजा की कारगुजारी को लेकर केंद्र की संप्रग सरकार और खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जान सांसत में पड़ी हुई है। विपक्ष इन भ्रष्टाचारों की संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी से जांच कराए जाने पर अड़ा हुआ है। लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता और केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की संसद की कार्यवाही चलने देने के लिए विपक्षी दलों से मिलकर कोई राह निकालने की कोशिश भी फिलहाल नाकाम हुई है। पहले तो मुखर्जी ने कड़ा रूख अपनाते हुए यह कहा कि कैग की रिपोर्ट संसद की लोकलेखा समिति को सौंप दी जाएगी और जेपीसी की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन विपक्षी दलों के प्रतिनिधि नेताओं से मुलाकात के बाद उनके रूख को देखते हुए उन्होंने कहा है कि कोई रास्ता निकालने के लिए वे प्रधानमंत्री से बात करके गुरूवार से पहले सरकार का पक्ष सामने रखेंगे। फिलहाल, इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने भी 2जी स्पेक्ट्रम मामले पर सुब्रह्मण्यम स्वामी की याचिका की सुनवाई करते हुए इस बात पर हैरानी जताई है कि इस मामले में स्वामी के लिखे शिकायती पत्र का प्रधानमंत्री कार्यालय ने कोई संज्ञान क्यों नहीं लिया और राजा के खिलाफ कार्रवाई करने में इतनी देर क्यों की गई। इस मामले में प्रधानमंत्री की तरफ से कोई जवाब न देकर खामोशी बरते जाने पर भी सुप्रीम कोर्ट को हैरानी हुई है। दूसरी तरफ देखें तो गठबंधन की मजबूरी और दबाव के चलते राजा के खिलाफ कदम उठाने में हीला-हवाली और देरी की वजह से संप्रग सरकार की हालत गुनाहे-बेलज्जत सरीखी साबित हुई है और विपक्ष इसे देर आयद-दुरूस्त आयद मानने को तैयार नहीं है। दरअसल, सत्ता से इंधन पाकर होनेवाला भ्रष्टाचार, चाहे किन्हीं सरकारों के कार्यकाल में हो, देश के जनमानस को इतना उद्वेलित और हताश कर देता है कि लोग नाउम्मीद होकर इसे नियति मान लेते हैं। यह भी एक कारण है कि जब एक तरफ से भ्रष्टाचार की बात उठती है तो जवाबी तौर पर दूसरी तरफ के भ्रष्टाचार की चर्चा छेड़ दी जाती है। लेकिन सवाल तो यह है कि क्या यह कहने से कि मेरी ही नहीं, तेरी कमीज भी गंदी है, सफाई हो सकती है? क्या हमाम में सभी नंगे हैं- हम इसी मुहावरे से काम चलाते रहेंगे?
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संसद से सड़क तक भ्रष्टाचार-त्रिकोण की ही गूंज है। इस गूंज में बिहार विधान सभा चुनाव के आखिरी चरण की चर्चा समेत तमाम बड़ी घटनाएं तक धुंध और धुंधलके में ढक गइं। मसलन, असम में नए सिरे से बोडो उग्रवादियों की हिंसा भी लोगों और मीडिया की आंखों से ओझल होकर रह गई, जिसके शिकार हिन्दीभाषी खासकर बिहारी लोग हुए हैं और अब वहां से दहशत के मारे पलायन के बारे में सोच रहे हैं। भ्रष्टाचार-त्रिकोण यानी आदर्श सोसायटी-कामनवेल्थ खेल-2जी स्पेक्ट्रम ने पांच दिनों से संसद को लगभग ठप्प करके रखा है। मंत्री पद से हटने या हटाए जाने के बावजूद पूर्व केंद्रीय संचार मंत्री ए. राजा की जान सस्ते में छूटती नजर नहीं आ रही, बल्कि सच कहिए तो राजा की कारगुजारी को लेकर केंद्र की संप्रग सरकार और खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जान सांसत में पड़ी हुई है। विपक्ष इन भ्रष्टाचारों की संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी से जांच कराए जाने पर अड़ा हुआ है। लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता और केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की संसद की कार्यवाही चलने देने के लिए विपक्षी दलों से मिलकर कोई राह निकालने की कोशिश भी फिलहाल नाकाम हुई है। पहले तो मुखर्जी ने कड़ा रूख अपनाते हुए यह कहा कि कैग की रिपोर्ट संसद की लोकलेखा समिति को सौंप दी जाएगी और जेपीसी की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन विपक्षी दलों के प्रतिनिधि नेताओं से मुलाकात के बाद उनके रूख को देखते हुए उन्होंने कहा है कि कोई रास्ता निकालने के लिए वे प्रधानमंत्री से बात करके गुरूवार से पहले सरकार का पक्ष सामने रखेंगे। फिलहाल, इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने भी 2जी स्पेक्ट्रम मामले पर सुब्रह्मण्यम स्वामी की याचिका की सुनवाई करते हुए इस बात पर हैरानी जताई है कि इस मामले में स्वामी के लिखे शिकायती पत्र का प्रधानमंत्री कार्यालय ने कोई संज्ञान क्यों नहीं लिया और राजा के खिलाफ कार्रवाई करने में इतनी देर क्यों की गई। इस मामले में प्रधानमंत्री की तरफ से कोई जवाब न देकर खामोशी बरते जाने पर भी सुप्रीम कोर्ट को हैरानी हुई है। दूसरी तरफ देखें तो गठबंधन की मजबूरी और दबाव के चलते राजा के खिलाफ कदम उठाने में हीला-हवाली और देरी की वजह से संप्रग सरकार की हालत गुनाहे-बेलज्जत सरीखी साबित हुई है और विपक्ष इसे देर आयद-दुरूस्त आयद मानने को तैयार नहीं है। दरअसल, सत्ता से इंधन पाकर होनेवाला भ्रष्टाचार, चाहे किन्हीं सरकारों के कार्यकाल में हो, देश के जनमानस को इतना उद्वेलित और हताश कर देता है कि लोग नाउम्मीद होकर इसे नियति मान लेते हैं। यह भी एक कारण है कि जब एक तरफ से भ्रष्टाचार की बात उठती है तो जवाबी तौर पर दूसरी तरफ के भ्रष्टाचार की चर्चा छेड़ दी जाती है। लेकिन सवाल तो यह है कि क्या यह कहने से कि मेरी ही नहीं, तेरी कमीज भी गंदी है, सफाई हो सकती है? क्या हमाम में सभी नंगे हैं- हम इसी मुहावरे से काम चलाते रहेंगे?
क्रिकेट के अपराधी
अरविन्द चतुर्वेद :
क्रिकेट के खेल में अब चूंकि पैसा बहुत है इसीलिए इस खेल के इर्दगिर्द लालच, तिकड़म और अपराध का अदृश्य ताना-बाना बुने जाने की आशंका भी बराबर बनी रहती है। एक जमाने में जेंटलमैन गेम कहे जाने वाले क्रिकेट की कहानियां और खिलाड़ियों की शानदार उपलब्धियों के किस्से आज भी खेल-प्रेमियों को रोमांचित करते ही हैं, लेकिन पिछले कुछ बरसों से इस खेल से ऐसी कलंक कथाएं जुड़ती जा रही हैं, जो क्रिकेट की किरकिरी कराने के साथ ही बहुत कड़वा एहसास कराती हैं। कहीं भी क्रिकेट मैच हो, जीत-हार को लेकर सटूटेबाजी के किस्से आम हो चले हैं और अब तो चार कदम आगे बढ़कर मैच फिक्सिंग तक की तिकड़में भी सामने आने लगी हैं। याद होगा कि कुछ साल पहले मैच फिक्सिंग के कलंक में ही भारतीय क्रिकेट के कप्तान रहे मुहम्मद अजहरूदूदीन के साथ-साथ होनहार खिलाड़ी अजय जडेजा का करियर चौपट हो गया और दक्षिण अफ्रीका के कप्तान रहे हैंसी क्रोनिए को फिक्सिंग की ग्लानि ने जीते-जी मार दिया था। इसी तरह बड़े धूमधाम से शुरू हुए शारजाह क्रिकेट टूर्नामेंट की इहलीला भी कुछेक बरसों में सटूटेबाजी और फिक्सिंग की बेईमानियों में खत्म हो गई। गनीमत है कि मैच फिक्सिंग के जाल में फंसकर अभी तक किसी क्रिकेटर को अपनी जान से हाथ नहीं धोना पड़ा है, लेकिन इधर पाकिस्तानी क्रिकेट को लेकर जैसे दुष्चक्र और भयावह षडूयंत्र सामने आ रहे हैं, उन्हें देखते हुए यह आशंका होती है कि कहीं किसी खिलाड़ी के साथ कोई हादसा न हो जाए। ताजा मामला पाकिस्तानी टीम के बिल्कुल युवा विकेटकीपर जुल्करनैन हैदर का सामने आया है, जिसे टीम में आए जुमा-जुमा तीन महीने हुए थे कि जान गंवाने के डर से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह देना पड़ा है। यह अपने आप में हैरत भरी बात है कि दुबई में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेली जा रही oृंखला के मैच में फिल्ड में उतरने के ऐन एक दिन पहले डरा हुआ जुल्करनैन हैदर अपने साथी खिलाड़ियों को बिना कुछ बताए ही होटल से निकल लिया। जिस हालत में हैदर चुपके से निकला, वह स्वयं ही इस बात की ओर इशारा है कि अपने साथी खिलाड़ियों पर भी उसे भरोसा नहीं रह गया था। हैदर को मैच फिक्स करने से इंकार करने पर जान मारने की मिल रही धमकी के कारण टीम छोड़कर भागना पड़ा। पाकिस्तान के लिए एक टेस्ट, चार एकदिवसीय और तीन टूवेंटी-20 अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने वाले इस 24 वर्षीय विकेटकीपर ने अब इंग्लैंड में राजनीतिक शरण की गुहार लगाई है। हैदर ने लंदन से एक पाकिस्तानी न्यूज चैनल को यह भी बताया है कि उसके परिवार को अब भी धमकियां मिल रही हैं और इसलिए संन्यास लेने का उसने फैसला किया है, क्योंकि उस पर बहुत दबाव है, जिसे वह झेल नहीं पा रहा है। हैदर के इस तरह टीम को छोड़कर जाने से आईसीसी भी परेशान है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का संचालन करने वाली इस संस्था का मानना है कि पाकिस्तान के इस विकेटकीपर को सटूटेबाजी के जाल से जुड़े अपराधियों ने निशाना बनाया है। होनहार युवा क्रिकेटर हैदर के साथ हुए इस वाकए से आईसीसी समेत समूचे क्रिकेट जगत का चिंतित होना स्वाभाविक है। आईसीसी ने कहा भी है कि यह काफी घिनौना है कि सटूटेबाजी से जुड़े अपराधी पहले भी खिलाड़ियों के परिवार को निशाना बना चुके हैं। हैरानी तो इस बात की है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी खुद पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का अध्यक्ष होने के बावजूद अपने एक प्रतिभाशाली युवा क्रिकेटर और उसके परिवार को आश्वस्त करने के बजाय पीसीबी के पक्ष में लीपापोती करने में लगे हुए हैं। जबकि पिछले कई मामलों की तरह हैदर के मामले में भी मैच फिक्सिंग से जुड़े पाकिस्तानी अंडरवल्र्ड और बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई के नापाक गठजोड़ का नाम लिया जा रहा है। समझा जा सकता है कि पैसे के बेरोकटोक प्रवाह वाले क्रिकेट को बंधक बनाने के लिए अपराधी किस हद तक जा सकते हैं।
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क्रिकेट के खेल में अब चूंकि पैसा बहुत है इसीलिए इस खेल के इर्दगिर्द लालच, तिकड़म और अपराध का अदृश्य ताना-बाना बुने जाने की आशंका भी बराबर बनी रहती है। एक जमाने में जेंटलमैन गेम कहे जाने वाले क्रिकेट की कहानियां और खिलाड़ियों की शानदार उपलब्धियों के किस्से आज भी खेल-प्रेमियों को रोमांचित करते ही हैं, लेकिन पिछले कुछ बरसों से इस खेल से ऐसी कलंक कथाएं जुड़ती जा रही हैं, जो क्रिकेट की किरकिरी कराने के साथ ही बहुत कड़वा एहसास कराती हैं। कहीं भी क्रिकेट मैच हो, जीत-हार को लेकर सटूटेबाजी के किस्से आम हो चले हैं और अब तो चार कदम आगे बढ़कर मैच फिक्सिंग तक की तिकड़में भी सामने आने लगी हैं। याद होगा कि कुछ साल पहले मैच फिक्सिंग के कलंक में ही भारतीय क्रिकेट के कप्तान रहे मुहम्मद अजहरूदूदीन के साथ-साथ होनहार खिलाड़ी अजय जडेजा का करियर चौपट हो गया और दक्षिण अफ्रीका के कप्तान रहे हैंसी क्रोनिए को फिक्सिंग की ग्लानि ने जीते-जी मार दिया था। इसी तरह बड़े धूमधाम से शुरू हुए शारजाह क्रिकेट टूर्नामेंट की इहलीला भी कुछेक बरसों में सटूटेबाजी और फिक्सिंग की बेईमानियों में खत्म हो गई। गनीमत है कि मैच फिक्सिंग के जाल में फंसकर अभी तक किसी क्रिकेटर को अपनी जान से हाथ नहीं धोना पड़ा है, लेकिन इधर पाकिस्तानी क्रिकेट को लेकर जैसे दुष्चक्र और भयावह षडूयंत्र सामने आ रहे हैं, उन्हें देखते हुए यह आशंका होती है कि कहीं किसी खिलाड़ी के साथ कोई हादसा न हो जाए। ताजा मामला पाकिस्तानी टीम के बिल्कुल युवा विकेटकीपर जुल्करनैन हैदर का सामने आया है, जिसे टीम में आए जुमा-जुमा तीन महीने हुए थे कि जान गंवाने के डर से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह देना पड़ा है। यह अपने आप में हैरत भरी बात है कि दुबई में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेली जा रही oृंखला के मैच में फिल्ड में उतरने के ऐन एक दिन पहले डरा हुआ जुल्करनैन हैदर अपने साथी खिलाड़ियों को बिना कुछ बताए ही होटल से निकल लिया। जिस हालत में हैदर चुपके से निकला, वह स्वयं ही इस बात की ओर इशारा है कि अपने साथी खिलाड़ियों पर भी उसे भरोसा नहीं रह गया था। हैदर को मैच फिक्स करने से इंकार करने पर जान मारने की मिल रही धमकी के कारण टीम छोड़कर भागना पड़ा। पाकिस्तान के लिए एक टेस्ट, चार एकदिवसीय और तीन टूवेंटी-20 अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने वाले इस 24 वर्षीय विकेटकीपर ने अब इंग्लैंड में राजनीतिक शरण की गुहार लगाई है। हैदर ने लंदन से एक पाकिस्तानी न्यूज चैनल को यह भी बताया है कि उसके परिवार को अब भी धमकियां मिल रही हैं और इसलिए संन्यास लेने का उसने फैसला किया है, क्योंकि उस पर बहुत दबाव है, जिसे वह झेल नहीं पा रहा है। हैदर के इस तरह टीम को छोड़कर जाने से आईसीसी भी परेशान है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का संचालन करने वाली इस संस्था का मानना है कि पाकिस्तान के इस विकेटकीपर को सटूटेबाजी के जाल से जुड़े अपराधियों ने निशाना बनाया है। होनहार युवा क्रिकेटर हैदर के साथ हुए इस वाकए से आईसीसी समेत समूचे क्रिकेट जगत का चिंतित होना स्वाभाविक है। आईसीसी ने कहा भी है कि यह काफी घिनौना है कि सटूटेबाजी से जुड़े अपराधी पहले भी खिलाड़ियों के परिवार को निशाना बना चुके हैं। हैरानी तो इस बात की है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी खुद पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का अध्यक्ष होने के बावजूद अपने एक प्रतिभाशाली युवा क्रिकेटर और उसके परिवार को आश्वस्त करने के बजाय पीसीबी के पक्ष में लीपापोती करने में लगे हुए हैं। जबकि पिछले कई मामलों की तरह हैदर के मामले में भी मैच फिक्सिंग से जुड़े पाकिस्तानी अंडरवल्र्ड और बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई के नापाक गठजोड़ का नाम लिया जा रहा है। समझा जा सकता है कि पैसे के बेरोकटोक प्रवाह वाले क्रिकेट को बंधक बनाने के लिए अपराधी किस हद तक जा सकते हैं।
ओबामा के आगे-पीछे
अरविंद चतुर्वेद :
जैसे-जैसे अमेरिका के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत-यात्रा का दिन यानी छह नवम्बर करीब आता जा रहा है, उत्सुकता और अधीरता दोनों बढ़ती जा रही है। जिस तरह इस यात्रा के पहले ही इसकी अहमियत और हासिल को लेकर अपेक्षाओं की अनुमानपरक मीमांसा हो रही है, उसके अनुरूप अगर ओबामा के सफर का फलितार्थ निकलता है तो इसमें कोई दो राय नहीं कि एशियाई मुल्कों, खासकर दक्षिण एशिया में भारत को एक नई चमक के साथ ठोस अग्रगामिता मिलेगी। जैसाकि खुद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इस यात्रा के संदर्भ में संकेत दिया है कि भारत और अमेरिका दोनों ही आपसी सम्बंधों में गुणात्मक बदलाव लाना चाहते हैं। जापान, मलेशिया और वियतनाम के हफ्तेभर के सफर से वापसी के दौरान मनमोहन सिंह ने कहा है कि भारत और अमेरिका के पारस्परिक सम्बंध एक नए चरण में प्रवेश कर गए हैं और दोनों देशों के बीच सौहार्द व समझ कायम है। प्रधानमंत्री ने इस बात की भी ताईद की है दोनों देशों के बीच विभिन्न मामलों पर रणनीतिक साझेदारी है और दोनों देशों की नजर ऐसे उन सभी क्षेत्रों व पहलुओं पर मिलकर यानी कि तालमेल के साथ काम करने की है, जो दोनों देशों के हितों से सम्बंध रखते हैं। बहरहाल, यह तो अमेरिकी राष्ट्रपति की भारत-यात्रा का एक पहलू है, लेकिन दूसरा पहलू चुनौतियां पेश करने वाला भी है, जिसे कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस यात्रा की चमक को धुंधलाने की कोशिश करने के मकसद से कुछ चुनौतियां देर-सबेर जरूर दरपेश की जाएंगी, जिन पर दोनों ही देशों को सतर्क निगाह रखनी होगी। उदाहरण के लिए, यह अचानक या आकस्मिक नहीं है कि कश्मीर के अलगाववादी तथाकथित आजादी की मांग के लिए घाटी में अशांति और उपद्रव के ताप को लगातार ऊंचा और सरगर्म बनाए रखना चाहते हैं और उनकी मदद में इंधन के तौर पर पाकिस्तानी फौज सीजफायर का उल्लंघन करते हुए चेतावनी दिए जाने के बावजूद बीच-बीच में गोलाबारी कर चुका है। यही नहीं, अपनी धरती का आतंकवादियों के लिए इस्तेमाल न होने देने का वायदा करने के बावजूद पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मुजफ्फराबाद में लश्करे-तैयबा समेत विभिन्न नामधारी आतंकी संगठनों के लोग दो दिन पहले ही हजारों की भीड़वाली रैली में खुलेआम शिरकत कर चुके हैं। उधर दूसरी ओर ओबामा के भारत आने की तारीख से चंद रोज पहले यमन से शिकागो के दो यहूदी प्रार्थनागृहों के पते पर भेजे जा रहे दो पार्सल बमों का पता चलने के बाद अमेरिका समेत यूरोपीय देशों के खिलाफ अलकायदा की नई हमलावर मुहिम की आशंका सामने आई है। इस मामले के रहस्योदूघाटन के संदर्भ में खुद अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने कुबूल किया है कि इस समय अमेरिका ठोस आतंकी धमकी का सामना कर रहा है। कुल मिलाकर ये चंद घटनाएं ही बताती हैं कि ओबामा की भारत-यात्रा के आगे-पीछे ऐसी नकारात्मक गतिविधियों का सिलसिला चलाकर चुनौतियां पेश करने का इरादा रखने वालों की तत्परता बढ़ सकती है। लेकिन, इस सबके बावजूद मोटे तौर पर जो बातें बहुत साफ हैं, वह यह कि क्लिंटन और बुश के जमाने की तुलना में ओबामा के अमेरिका का रूख भारत के प्रति बहुत सकारात्मक हुआ है और उसकी तमाम गलतफहमियां भी दूर हुई हैं। फिर इस दौरान भारत ने भी अपने बलबूते विकास की कई मंजिलें तय की हैं। वास्तविकता तो यह है कि समकालीन विश्व में भारत को ही नहीं अमेरिका को भी भारत से बेहतर तालमेल बनाकर चलने की जरूरत है।
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जैसे-जैसे अमेरिका के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत-यात्रा का दिन यानी छह नवम्बर करीब आता जा रहा है, उत्सुकता और अधीरता दोनों बढ़ती जा रही है। जिस तरह इस यात्रा के पहले ही इसकी अहमियत और हासिल को लेकर अपेक्षाओं की अनुमानपरक मीमांसा हो रही है, उसके अनुरूप अगर ओबामा के सफर का फलितार्थ निकलता है तो इसमें कोई दो राय नहीं कि एशियाई मुल्कों, खासकर दक्षिण एशिया में भारत को एक नई चमक के साथ ठोस अग्रगामिता मिलेगी। जैसाकि खुद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इस यात्रा के संदर्भ में संकेत दिया है कि भारत और अमेरिका दोनों ही आपसी सम्बंधों में गुणात्मक बदलाव लाना चाहते हैं। जापान, मलेशिया और वियतनाम के हफ्तेभर के सफर से वापसी के दौरान मनमोहन सिंह ने कहा है कि भारत और अमेरिका के पारस्परिक सम्बंध एक नए चरण में प्रवेश कर गए हैं और दोनों देशों के बीच सौहार्द व समझ कायम है। प्रधानमंत्री ने इस बात की भी ताईद की है दोनों देशों के बीच विभिन्न मामलों पर रणनीतिक साझेदारी है और दोनों देशों की नजर ऐसे उन सभी क्षेत्रों व पहलुओं पर मिलकर यानी कि तालमेल के साथ काम करने की है, जो दोनों देशों के हितों से सम्बंध रखते हैं। बहरहाल, यह तो अमेरिकी राष्ट्रपति की भारत-यात्रा का एक पहलू है, लेकिन दूसरा पहलू चुनौतियां पेश करने वाला भी है, जिसे कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस यात्रा की चमक को धुंधलाने की कोशिश करने के मकसद से कुछ चुनौतियां देर-सबेर जरूर दरपेश की जाएंगी, जिन पर दोनों ही देशों को सतर्क निगाह रखनी होगी। उदाहरण के लिए, यह अचानक या आकस्मिक नहीं है कि कश्मीर के अलगाववादी तथाकथित आजादी की मांग के लिए घाटी में अशांति और उपद्रव के ताप को लगातार ऊंचा और सरगर्म बनाए रखना चाहते हैं और उनकी मदद में इंधन के तौर पर पाकिस्तानी फौज सीजफायर का उल्लंघन करते हुए चेतावनी दिए जाने के बावजूद बीच-बीच में गोलाबारी कर चुका है। यही नहीं, अपनी धरती का आतंकवादियों के लिए इस्तेमाल न होने देने का वायदा करने के बावजूद पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मुजफ्फराबाद में लश्करे-तैयबा समेत विभिन्न नामधारी आतंकी संगठनों के लोग दो दिन पहले ही हजारों की भीड़वाली रैली में खुलेआम शिरकत कर चुके हैं। उधर दूसरी ओर ओबामा के भारत आने की तारीख से चंद रोज पहले यमन से शिकागो के दो यहूदी प्रार्थनागृहों के पते पर भेजे जा रहे दो पार्सल बमों का पता चलने के बाद अमेरिका समेत यूरोपीय देशों के खिलाफ अलकायदा की नई हमलावर मुहिम की आशंका सामने आई है। इस मामले के रहस्योदूघाटन के संदर्भ में खुद अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने कुबूल किया है कि इस समय अमेरिका ठोस आतंकी धमकी का सामना कर रहा है। कुल मिलाकर ये चंद घटनाएं ही बताती हैं कि ओबामा की भारत-यात्रा के आगे-पीछे ऐसी नकारात्मक गतिविधियों का सिलसिला चलाकर चुनौतियां पेश करने का इरादा रखने वालों की तत्परता बढ़ सकती है। लेकिन, इस सबके बावजूद मोटे तौर पर जो बातें बहुत साफ हैं, वह यह कि क्लिंटन और बुश के जमाने की तुलना में ओबामा के अमेरिका का रूख भारत के प्रति बहुत सकारात्मक हुआ है और उसकी तमाम गलतफहमियां भी दूर हुई हैं। फिर इस दौरान भारत ने भी अपने बलबूते विकास की कई मंजिलें तय की हैं। वास्तविकता तो यह है कि समकालीन विश्व में भारत को ही नहीं अमेरिका को भी भारत से बेहतर तालमेल बनाकर चलने की जरूरत है।
भ्रष्टाचार के भवन में
अरविन्द चतुर्वेद :
क्या पूरा देश ही भ्रष्टाचार के भवन में बदलता जा रहा है? छोटे-मोटे भ्रष्टाचार की तो बात ही छोड़ दीजिए, समय-समय पर इतने बड़े-बड़े भ्रटाचारों का भेद खुलता है, जिनकी जांच और चर्चा कई महीनों तक छाई रहती है। दिलचस्प यह भी है कि एक घोटाले की चर्चा तब मद्धिम पड़ती है, जब उसको पीछे ठेलकर कोई नया घोटाला सीना ताने सामने आ खड़ा होता है। अब जैसे सत्यम वाले रामलिंगा राजू की चर्चा कोई नहीं करता, क्योंकि उनके घोटाले को पीछे धकेल कर झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा का हजारों करोड़ का घोटाला सामने आ गया। इस घोटाले की जांच अभी भी चल रही है, लेकिन इसी बीच मधु कोड़ा की चर्चा को पीछे धकेलकर कामनवेल्थ खेलों के आयोजन और उससे सम्बंधित निर्माण कायों में हुआ महा घोटाला सामने आ गया। खेल खतम हुए तो अब खेलों के पीछे हुए खेल की जांच हो रही है। सरकार की पांच-पांच एजेंसियां अंधों के हाथी की तरह प्रसिद्ध दार्शनिक सत्य की तरह इस महा भ्रष्टाचार की जांच में लगी हैं। अब देखना यह है कि कौन पूंछ को सत्य बताता है, कौन कान को और कौन सूंड़ को। बहरहाल, भ्रष्टाचार का भवन बन चुके देश में राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान हुई वित्तीय अनियमितताओं और घोटालों की जांच के सिलसिले में तीन सौ आयकर अधिकारियों ने देशभर में एक साथ 50 स्थानों पर छापे मारे हैं। ये छापे खेलों से सम्बंधित चार ठीकेदार कंपनियोें के दफ्तरों-परिसरों में मारे गए हैं। केंद्रीय सतर्कता आयोग यानी सीवीसी राष्ट्रमंडल खेलों के एक शीर्ष अधिकारी द्वारा दो सौ करोड़ की धांधली से संबंधित शिकायत की जांच कर रहा है। यह वही अधिकारी हैं, जिन्हें आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी का करीबी सहयोगी माना जाता है। गौरतलब है कि राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ी अलग-अलग निर्माण परियोजनाओं में आर्थिक अनियमितताओं से संबंधित कुल 22 शिकायतों की जांच सीवीसी कर रहा है। भ्रष्टाचार की यह एक अकेली चादर ही कितनी देशव्यापी है, इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि छापेमारी राजधानी दिल्ली समेत बंगलुरू, मुंबई, जमशेदपुर, कोलकाता में तो की ही गई है, अकेले राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में करीब 50 स्थानों पर मारकर बड़ी संख्या में खेलों से सम्बंधित दस्तावेज जब्त किए गए हैं। क्या दिलचस्प बात है कि आयकर विभाग की जांच के घेरे में आई कंपनियों को इन अंतरराष्ट्रीय खेलों के बाबत राजधानी दिल्ली के सौंदर्यीकरण और स्ट्रीट लैम्पों को बदलने आदि का ठेका दिया गया था, लेकिन इन लोगों ने सौंदर्यीकरण के बहाने कालिख पोत दिया और स्ट्रीट लैम्पों के उजाले की आड़ में अंधेरगर्दी मचाकर रख दी। देश वासियों की गाढ़ी कमाई के पैसे से देश की इज्जत और शान की खातिर कराए गए राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी के बहाने लूट-खसोट मचाने वालों को क्या देशभक्त कहा जा सकता है? असल में भ्रष्टाचारी पैसे के पिशाच होते हैं, जो सिर्फ देश और देशवासियों का खून चूसना जानते हैं। चूंकि इस महा भ्रष्टाचार की जांच प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई, केंद्रीय सतर्कता आयोग के साथ ही प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त विशेेष समिति भी कर रही है, इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बहुस्तरीय जांच में उन सभी कसूरवारों की गरदन फंसेगी, जो भ्रष्टाचार के समंदर में मगरमच्छ की तरह डुबकी लगाते आए हैं। जांच एजेंसियों के साथ ही सरकार से भी आम नागरिक की यही अपेक्षा है कि इस महाघोटाले में दूध का दूध और पानी का पानी होने तक पूरी मुस्तैदी बनाए रखे। ऐसा न हो कि चार-छह महीने में कोई नया घोटालेबाज भ्रष्टाचारी सामने आ जाए और कामनवेल्थ खेलों में हुए घोटाले को धकेलकर पीछे कर दे। वैसे भी अगर कामनवेल्थ खेल देश की प्रतिष्ठा से जुड़े हुए थे, जैसा कि सरकार ने कहा था तो यह भी सरकार की ही जवाबदेही है कि इसके आयोजन में गड़बड़ियां और वित्तीय घपलेबाजी करने वालों की प्रामाणिक तौर पर पहचान करके उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दिलाए , चाहे वे कितने भी ऊंचे रसूख वाले लोग हों। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर कराई जा रही बहुस्तरीय जांच की साख का मामला है। यह भ्रष्टाचार एक देश विरोधी कार्य है, जिसमें लिप्त लोगों को सजा मिलनी ही चाहिए।
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क्या पूरा देश ही भ्रष्टाचार के भवन में बदलता जा रहा है? छोटे-मोटे भ्रष्टाचार की तो बात ही छोड़ दीजिए, समय-समय पर इतने बड़े-बड़े भ्रटाचारों का भेद खुलता है, जिनकी जांच और चर्चा कई महीनों तक छाई रहती है। दिलचस्प यह भी है कि एक घोटाले की चर्चा तब मद्धिम पड़ती है, जब उसको पीछे ठेलकर कोई नया घोटाला सीना ताने सामने आ खड़ा होता है। अब जैसे सत्यम वाले रामलिंगा राजू की चर्चा कोई नहीं करता, क्योंकि उनके घोटाले को पीछे धकेल कर झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा का हजारों करोड़ का घोटाला सामने आ गया। इस घोटाले की जांच अभी भी चल रही है, लेकिन इसी बीच मधु कोड़ा की चर्चा को पीछे धकेलकर कामनवेल्थ खेलों के आयोजन और उससे सम्बंधित निर्माण कायों में हुआ महा घोटाला सामने आ गया। खेल खतम हुए तो अब खेलों के पीछे हुए खेल की जांच हो रही है। सरकार की पांच-पांच एजेंसियां अंधों के हाथी की तरह प्रसिद्ध दार्शनिक सत्य की तरह इस महा भ्रष्टाचार की जांच में लगी हैं। अब देखना यह है कि कौन पूंछ को सत्य बताता है, कौन कान को और कौन सूंड़ को। बहरहाल, भ्रष्टाचार का भवन बन चुके देश में राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान हुई वित्तीय अनियमितताओं और घोटालों की जांच के सिलसिले में तीन सौ आयकर अधिकारियों ने देशभर में एक साथ 50 स्थानों पर छापे मारे हैं। ये छापे खेलों से सम्बंधित चार ठीकेदार कंपनियोें के दफ्तरों-परिसरों में मारे गए हैं। केंद्रीय सतर्कता आयोग यानी सीवीसी राष्ट्रमंडल खेलों के एक शीर्ष अधिकारी द्वारा दो सौ करोड़ की धांधली से संबंधित शिकायत की जांच कर रहा है। यह वही अधिकारी हैं, जिन्हें आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी का करीबी सहयोगी माना जाता है। गौरतलब है कि राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ी अलग-अलग निर्माण परियोजनाओं में आर्थिक अनियमितताओं से संबंधित कुल 22 शिकायतों की जांच सीवीसी कर रहा है। भ्रष्टाचार की यह एक अकेली चादर ही कितनी देशव्यापी है, इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि छापेमारी राजधानी दिल्ली समेत बंगलुरू, मुंबई, जमशेदपुर, कोलकाता में तो की ही गई है, अकेले राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में करीब 50 स्थानों पर मारकर बड़ी संख्या में खेलों से सम्बंधित दस्तावेज जब्त किए गए हैं। क्या दिलचस्प बात है कि आयकर विभाग की जांच के घेरे में आई कंपनियों को इन अंतरराष्ट्रीय खेलों के बाबत राजधानी दिल्ली के सौंदर्यीकरण और स्ट्रीट लैम्पों को बदलने आदि का ठेका दिया गया था, लेकिन इन लोगों ने सौंदर्यीकरण के बहाने कालिख पोत दिया और स्ट्रीट लैम्पों के उजाले की आड़ में अंधेरगर्दी मचाकर रख दी। देश वासियों की गाढ़ी कमाई के पैसे से देश की इज्जत और शान की खातिर कराए गए राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी के बहाने लूट-खसोट मचाने वालों को क्या देशभक्त कहा जा सकता है? असल में भ्रष्टाचारी पैसे के पिशाच होते हैं, जो सिर्फ देश और देशवासियों का खून चूसना जानते हैं। चूंकि इस महा भ्रष्टाचार की जांच प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई, केंद्रीय सतर्कता आयोग के साथ ही प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त विशेेष समिति भी कर रही है, इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बहुस्तरीय जांच में उन सभी कसूरवारों की गरदन फंसेगी, जो भ्रष्टाचार के समंदर में मगरमच्छ की तरह डुबकी लगाते आए हैं। जांच एजेंसियों के साथ ही सरकार से भी आम नागरिक की यही अपेक्षा है कि इस महाघोटाले में दूध का दूध और पानी का पानी होने तक पूरी मुस्तैदी बनाए रखे। ऐसा न हो कि चार-छह महीने में कोई नया घोटालेबाज भ्रष्टाचारी सामने आ जाए और कामनवेल्थ खेलों में हुए घोटाले को धकेलकर पीछे कर दे। वैसे भी अगर कामनवेल्थ खेल देश की प्रतिष्ठा से जुड़े हुए थे, जैसा कि सरकार ने कहा था तो यह भी सरकार की ही जवाबदेही है कि इसके आयोजन में गड़बड़ियां और वित्तीय घपलेबाजी करने वालों की प्रामाणिक तौर पर पहचान करके उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दिलाए , चाहे वे कितने भी ऊंचे रसूख वाले लोग हों। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर कराई जा रही बहुस्तरीय जांच की साख का मामला है। यह भ्रष्टाचार एक देश विरोधी कार्य है, जिसमें लिप्त लोगों को सजा मिलनी ही चाहिए।
ऊँट के मुंह में जीरा
अरविन्द चतुर्वेद :
हालांकि किसान ऊंट नहीं हैं, वे देश के अन्नदाता हैं और उन्हीं की बदौलत यह देश आज भी बहुतायत में कृषि प्रधान बना हुआ है। मगर यह किसानों के साथ-साथ देश का भी दुर्भाग्य कहेंगे कि बात-बात पर किसानों को ऊंट की तरह सरकार का मुंह देखना पड़ता है। सरकार खेती के हर सीजन के पहले जरूरी उपज के प्रोत्साहन के लिए हर साल न्यूनतम समर्थन मूल्य का एलान किया करती है और मानना चाहिए कि किसान रवी की खेती की तैयारी करें, उसके पहले गेहूं व सरसों समेत दालों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की सरकार ने घोषणा की है। लेकिन सरकार ने गेहूं और सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य महज 20 रूपए बढ़ाकर ऊंट के मुंह में जीरा वाली कहावत को चरितार्थ कर दिया है। खेती के साल-दर-साल बढ़ते खर्च के आगे न्यूनतम समर्थन मूल्य की यह बढ़त किसानों के जले पर नमक छिड़कने वाली है और उपज के लिए प्रोत्साहित करने के बजाय यह किसानों को हतोत्साहित ही करेगी। क्या सरकार ने गेहूं का समर्थन मूल्य इसलिए मामूली तौर पर बढ़ाया है कि उसके गोदामों में गेहूं रखने की जगह नहीं है और पहले से जो स्टाक पड़ा हुआ है, वह सड़कर सरकार की भदूद पिटवा चुका है? कितना शर्मनाक है कि एक तरफ देश में भुखमरी व कुपोषण का रोना है और दूसरी ओर सरकार किसानों को प्रोत्साहित करने के बजाय हतोत्साहित करने पर आमादा है। गौरतलब है कि प्रति क्विंटल 1. 8 प्रतिशत की मामूली बढ़ोतरी के साथ गेहूं का समर्थन मूल्य जहां सरकार ने 1120 रूपए प्रति क्विंटल किए हंै, वहीं उसने केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन में औसतन दस प्रतिशत की बढ़ोतरी की थी। यानी खरीदने वालों की जेब भारी हो, भले ही किसानों का हाल ठन ठन गोपाल हो। देश में चूंकि दालों का उत्पादन जरूरत भर नहीं हो पाता, इसलिए दालों के उत्पादन को प्रोत्साहन देने के मकसद से सरकार ने मसूर और चने की दालों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 380 रूपए प्रति क्विंटल तक की बढ़ोतरी की है। न्यूनतम समर्थन मूल्य वह कीमत होती है, जो सरकार किसानों से उनकी उपज खरीदने के लिए भुगतान करती है। लेकिन सरकारी खरीद के लिए भी क्रय केंद्रों पर किसानों को कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, यह बेचारा किसान ही जानता है। उसे अपनी उपज बेचने के एवज में जो चेक मिलते हैं, वे भी कई बार महीनों बाद कमीशन ले-देकर भुनाए जा पाते हैं। ऐसी लचर और धांधली पूर्ण व्यवस्था में गेहूं और सरसों के समर्थन मूल्य में महज पौने दो फीसदी प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी वाकई जले पर नमक छिड़कने वाली ही कही जाएगी। जहां तक दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन का मामला है तो अपेक्षाकृत कुछ बेहतर समर्थन मूल्य जरूर घोषित किए गए हैं, लेकिन एक तो दालों वाली फसलें समान रूप से हर जगह पैदा नहीं हो पातीं, दूसरे कई बार इनका उत्पादन प्रतिकूल मौसम की मार का शिकार होकर किसानों की कमर तोड़ देता है। मसूर दाल का समर्थन मूल्य 380 रूपए और चने की दाल का 340 रूपए बढ़ाया गया है। सरकार ने इस साल दालों के उत्पादन को प्रोत्साहन देने और आयात पर निर्भरता घटाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में यह इजाफा किया है। असल में भारत दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक देश तो है, फिर भी घरेलू मांग को पूरा करने के लिए सालाना 35 से 40 लाख टन दालों का आयात करना पड़ता है। तिलहन उत्पादों का भी समर्थन मूल्य कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की सिफारिशों के मदूदेनजर कुछ बढ़ा दिया गया है। लेकिन असल सवाल तो यह है कि जब सरकार और प्रधानमंत्री खुद कह चुके हैं कि देश को एक और हरित क्रांति की जरूरत है तो क्या उसकी जरूरतें इसी तरह के समर्थन मूल्यों के ऐलान से पूरी हो जाएंगी। सच्चाई तो यह है कि किसान हितैषी होने की बातें तो खूब दोहराई जाती हैं, लेकिन कृषि और किसान के समग्र विकास के लिए प्रभावी तौर पर सरकारें कुछ खास कर नहीं रही हैं- केंद्र हो या राज्य सरकारें।
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हालांकि किसान ऊंट नहीं हैं, वे देश के अन्नदाता हैं और उन्हीं की बदौलत यह देश आज भी बहुतायत में कृषि प्रधान बना हुआ है। मगर यह किसानों के साथ-साथ देश का भी दुर्भाग्य कहेंगे कि बात-बात पर किसानों को ऊंट की तरह सरकार का मुंह देखना पड़ता है। सरकार खेती के हर सीजन के पहले जरूरी उपज के प्रोत्साहन के लिए हर साल न्यूनतम समर्थन मूल्य का एलान किया करती है और मानना चाहिए कि किसान रवी की खेती की तैयारी करें, उसके पहले गेहूं व सरसों समेत दालों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की सरकार ने घोषणा की है। लेकिन सरकार ने गेहूं और सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य महज 20 रूपए बढ़ाकर ऊंट के मुंह में जीरा वाली कहावत को चरितार्थ कर दिया है। खेती के साल-दर-साल बढ़ते खर्च के आगे न्यूनतम समर्थन मूल्य की यह बढ़त किसानों के जले पर नमक छिड़कने वाली है और उपज के लिए प्रोत्साहित करने के बजाय यह किसानों को हतोत्साहित ही करेगी। क्या सरकार ने गेहूं का समर्थन मूल्य इसलिए मामूली तौर पर बढ़ाया है कि उसके गोदामों में गेहूं रखने की जगह नहीं है और पहले से जो स्टाक पड़ा हुआ है, वह सड़कर सरकार की भदूद पिटवा चुका है? कितना शर्मनाक है कि एक तरफ देश में भुखमरी व कुपोषण का रोना है और दूसरी ओर सरकार किसानों को प्रोत्साहित करने के बजाय हतोत्साहित करने पर आमादा है। गौरतलब है कि प्रति क्विंटल 1. 8 प्रतिशत की मामूली बढ़ोतरी के साथ गेहूं का समर्थन मूल्य जहां सरकार ने 1120 रूपए प्रति क्विंटल किए हंै, वहीं उसने केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन में औसतन दस प्रतिशत की बढ़ोतरी की थी। यानी खरीदने वालों की जेब भारी हो, भले ही किसानों का हाल ठन ठन गोपाल हो। देश में चूंकि दालों का उत्पादन जरूरत भर नहीं हो पाता, इसलिए दालों के उत्पादन को प्रोत्साहन देने के मकसद से सरकार ने मसूर और चने की दालों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 380 रूपए प्रति क्विंटल तक की बढ़ोतरी की है। न्यूनतम समर्थन मूल्य वह कीमत होती है, जो सरकार किसानों से उनकी उपज खरीदने के लिए भुगतान करती है। लेकिन सरकारी खरीद के लिए भी क्रय केंद्रों पर किसानों को कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, यह बेचारा किसान ही जानता है। उसे अपनी उपज बेचने के एवज में जो चेक मिलते हैं, वे भी कई बार महीनों बाद कमीशन ले-देकर भुनाए जा पाते हैं। ऐसी लचर और धांधली पूर्ण व्यवस्था में गेहूं और सरसों के समर्थन मूल्य में महज पौने दो फीसदी प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी वाकई जले पर नमक छिड़कने वाली ही कही जाएगी। जहां तक दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन का मामला है तो अपेक्षाकृत कुछ बेहतर समर्थन मूल्य जरूर घोषित किए गए हैं, लेकिन एक तो दालों वाली फसलें समान रूप से हर जगह पैदा नहीं हो पातीं, दूसरे कई बार इनका उत्पादन प्रतिकूल मौसम की मार का शिकार होकर किसानों की कमर तोड़ देता है। मसूर दाल का समर्थन मूल्य 380 रूपए और चने की दाल का 340 रूपए बढ़ाया गया है। सरकार ने इस साल दालों के उत्पादन को प्रोत्साहन देने और आयात पर निर्भरता घटाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में यह इजाफा किया है। असल में भारत दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक देश तो है, फिर भी घरेलू मांग को पूरा करने के लिए सालाना 35 से 40 लाख टन दालों का आयात करना पड़ता है। तिलहन उत्पादों का भी समर्थन मूल्य कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की सिफारिशों के मदूदेनजर कुछ बढ़ा दिया गया है। लेकिन असल सवाल तो यह है कि जब सरकार और प्रधानमंत्री खुद कह चुके हैं कि देश को एक और हरित क्रांति की जरूरत है तो क्या उसकी जरूरतें इसी तरह के समर्थन मूल्यों के ऐलान से पूरी हो जाएंगी। सच्चाई तो यह है कि किसान हितैषी होने की बातें तो खूब दोहराई जाती हैं, लेकिन कृषि और किसान के समग्र विकास के लिए प्रभावी तौर पर सरकारें कुछ खास कर नहीं रही हैं- केंद्र हो या राज्य सरकारें।
विकास की चुभन
अरविन्द चतुर्वेद :
विकास के नाम पर अपने देश में विकसित पूंजीवादी देशों, खासकर अमेरिकी उतरन को जिस तरह आदर्श मानकर अंधाधुंध अपनाते जाने की आदत है और इसके जो नतीजे सामने आ रहे हैं, लगता है कि अब वे खुद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को भी चुभने लगे हैं। तभी तो हैदराबाद में एकेडमी ऑफ साइंसेज फार द डेवलपिंग वल्र्ड की वाष्रिक बैठक का उदूघाटन करते हुए उन्होंने कहा है कि औद्योगिक राष्ट्रों द्वारा अपनाए गए विकास मॉडल विकासशील देशों के अस्तित्व के लिए खतरनाक हो सकते हैं और जरूरत इस बात की है कि इनसे सतर्क रहते हुए विकास के लिए प्रगति के अधिक स्थाई उपाय खोजे जाएं। यही नहीं, प्रधानमंत्री ने भारत जैसे विकासशील देश की पारिस्थितिकी का खास तौर पर जिक्र किया और कहा कि हम दरअसल उष्णकटिबंधीय इलाकों में पैदा होनेवाली बीमारियों से लड़ने के साथ-साथ परम्परागत खेती-बारी में बदलाव और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने जैसी साझा चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। असल में हमारी सरकारें भी और तमाम बड़े-छोटे गैर-सरकारी औद्योगिक कम्पनियां भी तेजी से तरक्की करने और कम खर्च में अधिक से अधिक उत्पादन व मुनाफा कमाने के चक्कर में ऐसी हड़बड़ी का विकासवादी रास्ता अपनाती हैं, जो स्थाई भी नहीं होता और प्रकृति-पर्यावरण के तमाम अंगों समेत सामान्य जन के जीवन में भी मुश्किलें पैदा करता है। सबको पता है कि स्थानीय पारिस्थितिकीय जरूरतों और सीमाओं को नजरअंदाज करते हुए हम जिन विकास परियोजनाओं को अबतक अमलीजामा पहनाते आए हैं, उन्होंने इस हद तक पर्यावरणीय असंतुलन पैदा किया है कि आए दिन हमें प्राकृतिक विभीषिकाओं व आपदाओं का शिकार होना पड़ता है। इनसे होनेवाले व्यापक नुकसान की भरपाई क्या दस औद्योगिक परियोजनाएं भी मिलकर पूरी कर सकती हैं? उदाहरण के लिए अगर हम गंगा और यमुना सरीखी दो नदियों की ओर ही देखें तो औद्योगिक और तटवर्ती शहरी विकास का कचरा ढोते-ढोते ये इस कदर प्रदूषित हो चुकी हैं कि अबतक अरबों रूपए खर्च करने के बावजूद इन्हें स्वच्छ नहीं बनाया जा सका है। बिना सोचे-बिचारे अंधाधुंध विकास के कारण जंगलों और पहाड़ों का भी हुआ है। दरअसल, नदियां-पहाड़ और जंगल प्रकृति-पर्यावरण व जीवन की सुरक्षा के ऐसे गार्ड हैं, जिनकी बर्बादी की कीमत पर किया जानेवाला विकास हमेशा घाटे का सौदा ही साबित होता है। कौन नहीं जानता कि न तो हम नदियां बना सकते हैं और न पहाड़, मगर इसके बावजूद विकास का वही मॉडल अपनाए हुए हैं, जो सबसे ज्यादा चोट इन्हीं चीजों को पहुंचाता आ रहा है। नतीजा यह है कि मौजूदा विकास मॉडल एक बड़ी आबादी के जीवन को तहस-नहस करता आ रहा है, उन्हें विस्थापित करता आ रहा है और इसीलिए ऐसे विकास को बहुतेरे लोग स्वाभाविक ही सत्यानाशी कहते हैं। अब अगर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने वैश्विक अनुभव और अभिज्ञता के हवाले से कहा है कि हमने देखा है कि किस तरह औद्योेगिक राष्ट्रों द्वारा अपनाए गए विकास के रास्ते हमारे अस्तित्व और जिंदगी के लिए खतरनाक हैं, तो शायद हम सतर्क होकर अपने लिए विकास का उपयुक्त और उपादेय मॉडल अपनाएं। क्योंकि अभी भी कोई बहुत देर नहीं हुई है। अगर हम ऐसा कोई रास्ता खोज निकालते हैं जो बेवजह हमारी क्षमताओं पर दबाव नहीं डालता और विकास की मूलभूत चुनौतियों से निपटने में सक्षम होता है तो उसका हम अपने खुद के हित में उपयोग कर सकेंगे। अच्छी बात यही है कि भारत समेत दूसरे विकासशील देश भी इस दिशा में सचेत हुए हैं और बेहतर फ्रेमवर्क के तहत समुद्री अनुसंधान, कृषि, जलवायु परिवर्तन और नैनो तकनीक सहित विज्ञान व तकनीक में सामूहिक गतिविधियों की oृंखला चल निकली है। अंधानुकरण के बजाय अपना रास्ता हमेशा बेहतर होता है।
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विकास के नाम पर अपने देश में विकसित पूंजीवादी देशों, खासकर अमेरिकी उतरन को जिस तरह आदर्श मानकर अंधाधुंध अपनाते जाने की आदत है और इसके जो नतीजे सामने आ रहे हैं, लगता है कि अब वे खुद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को भी चुभने लगे हैं। तभी तो हैदराबाद में एकेडमी ऑफ साइंसेज फार द डेवलपिंग वल्र्ड की वाष्रिक बैठक का उदूघाटन करते हुए उन्होंने कहा है कि औद्योगिक राष्ट्रों द्वारा अपनाए गए विकास मॉडल विकासशील देशों के अस्तित्व के लिए खतरनाक हो सकते हैं और जरूरत इस बात की है कि इनसे सतर्क रहते हुए विकास के लिए प्रगति के अधिक स्थाई उपाय खोजे जाएं। यही नहीं, प्रधानमंत्री ने भारत जैसे विकासशील देश की पारिस्थितिकी का खास तौर पर जिक्र किया और कहा कि हम दरअसल उष्णकटिबंधीय इलाकों में पैदा होनेवाली बीमारियों से लड़ने के साथ-साथ परम्परागत खेती-बारी में बदलाव और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने जैसी साझा चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। असल में हमारी सरकारें भी और तमाम बड़े-छोटे गैर-सरकारी औद्योगिक कम्पनियां भी तेजी से तरक्की करने और कम खर्च में अधिक से अधिक उत्पादन व मुनाफा कमाने के चक्कर में ऐसी हड़बड़ी का विकासवादी रास्ता अपनाती हैं, जो स्थाई भी नहीं होता और प्रकृति-पर्यावरण के तमाम अंगों समेत सामान्य जन के जीवन में भी मुश्किलें पैदा करता है। सबको पता है कि स्थानीय पारिस्थितिकीय जरूरतों और सीमाओं को नजरअंदाज करते हुए हम जिन विकास परियोजनाओं को अबतक अमलीजामा पहनाते आए हैं, उन्होंने इस हद तक पर्यावरणीय असंतुलन पैदा किया है कि आए दिन हमें प्राकृतिक विभीषिकाओं व आपदाओं का शिकार होना पड़ता है। इनसे होनेवाले व्यापक नुकसान की भरपाई क्या दस औद्योगिक परियोजनाएं भी मिलकर पूरी कर सकती हैं? उदाहरण के लिए अगर हम गंगा और यमुना सरीखी दो नदियों की ओर ही देखें तो औद्योगिक और तटवर्ती शहरी विकास का कचरा ढोते-ढोते ये इस कदर प्रदूषित हो चुकी हैं कि अबतक अरबों रूपए खर्च करने के बावजूद इन्हें स्वच्छ नहीं बनाया जा सका है। बिना सोचे-बिचारे अंधाधुंध विकास के कारण जंगलों और पहाड़ों का भी हुआ है। दरअसल, नदियां-पहाड़ और जंगल प्रकृति-पर्यावरण व जीवन की सुरक्षा के ऐसे गार्ड हैं, जिनकी बर्बादी की कीमत पर किया जानेवाला विकास हमेशा घाटे का सौदा ही साबित होता है। कौन नहीं जानता कि न तो हम नदियां बना सकते हैं और न पहाड़, मगर इसके बावजूद विकास का वही मॉडल अपनाए हुए हैं, जो सबसे ज्यादा चोट इन्हीं चीजों को पहुंचाता आ रहा है। नतीजा यह है कि मौजूदा विकास मॉडल एक बड़ी आबादी के जीवन को तहस-नहस करता आ रहा है, उन्हें विस्थापित करता आ रहा है और इसीलिए ऐसे विकास को बहुतेरे लोग स्वाभाविक ही सत्यानाशी कहते हैं। अब अगर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने वैश्विक अनुभव और अभिज्ञता के हवाले से कहा है कि हमने देखा है कि किस तरह औद्योेगिक राष्ट्रों द्वारा अपनाए गए विकास के रास्ते हमारे अस्तित्व और जिंदगी के लिए खतरनाक हैं, तो शायद हम सतर्क होकर अपने लिए विकास का उपयुक्त और उपादेय मॉडल अपनाएं। क्योंकि अभी भी कोई बहुत देर नहीं हुई है। अगर हम ऐसा कोई रास्ता खोज निकालते हैं जो बेवजह हमारी क्षमताओं पर दबाव नहीं डालता और विकास की मूलभूत चुनौतियों से निपटने में सक्षम होता है तो उसका हम अपने खुद के हित में उपयोग कर सकेंगे। अच्छी बात यही है कि भारत समेत दूसरे विकासशील देश भी इस दिशा में सचेत हुए हैं और बेहतर फ्रेमवर्क के तहत समुद्री अनुसंधान, कृषि, जलवायु परिवर्तन और नैनो तकनीक सहित विज्ञान व तकनीक में सामूहिक गतिविधियों की oृंखला चल निकली है। अंधानुकरण के बजाय अपना रास्ता हमेशा बेहतर होता है।
गंगा प्रदूषकों पर चाबुक
अरविन्द चतुर्वेद :
उत्तर भारत की जीवन रेखा और तकरीबन 45 करोड़ भारतीयों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अन्न-जल दे-दिलाकर उनका भरण-पोषण करने वाली गंगा नदी की लगातार बिगड़ती सेहत दुरूस्त करना केंद्र से लेकर सम्बंधित राज्य सरकारों के लिए कई दशकों से लगातार एक चुनौती है। पौराणिक काल से लेकर आज की उत्तर आधुनिक इक्कीसवीं सदी में भी गंगा का धार्मिक व सांस्कृतिक प्रवाह भारतीय जनमानस में अविरल भले ही हो, लेकिन भौतिक सच्चाई तो यही है कि बुरी तरह प्रदूषित इस पवित्र नदी का पानी आचमन लायक नहीं रह गया है। ैकहीं-कहीं नदी का पानी इस कदर प्रदूषित हो चुका है कि आदमी नहाए तो उसे चर्मरोग हो जाए। प्रदूषित गंगा नदी अपने जल-जीवों को भी जीवन दे पाने में कई स्थानों पर फेल साबित हुई है। यह ऐसी कड़वी सच्चाई है, जो गंगा को देवी और मां मानने वाले सरल हृदय धार्मिक लोगों को भी कष्ट पहुंचाती है और प्रकृति व पर्यावरण से प्रेम करने वाले आधुनिक, पढ़े-लिखे लोगों को भी। लेकिन जिस तरह कहीं न कहीं हमारे जंगलात के महकमे में एक बेईमानी है कि वनों की सुरक्षा और संवर्द्धन पर हर साल करोड़ों रूपए उड़ाने के बावजूद जंगल खत्म होते गए, कुछ उसी तरह गंगा समेत कई दूसरी नदियां भी प्रदूषण नियंत्रण की तमाम हवाई कसरत के बावजूद अपना प्राकृतिक स्वास्थ्य हासिल नहीं कर पाइं। केवल गंगा और यमुना की ही बात की जाए तो अबतक एक्शन प्लान के नाम पर हजारों करोड़ रूपए पानी में बहाए जा चुके हैं, मगर यहां भी एक बेईमानी है कि इन नदियों का प्रदूषण कम होने के बजाय बढ़ता गया है। हमारी संस्कृति और जीवन से जुड़ी ये नदियां दिन पर दिन प्रदूषित क्यों होती गइं और हजारों करोड़ रूपए बहा देने के बाद भी इन्हें स्वच्छ क्यों नहीं बनाया जा सका, दरअसल इसमें कोई गूढ़ रहस्य नहीं है। ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ है कि इन दोनों नदियों को प्रदूषित करने वाले सफाई करने वालों पर लगातार भारी पड़ते रहे हैं। राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हों या फिर केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड, गंगा-यमुना में रात-दिन कचरा उगलने वाली औद्योगिक इकाइयों की अनदेखी करके या उनको चेतावनी देकर और बहुत हुआ तो आर्थिक दंड देकर अबतक बख्शती आई हैं। इसका नतीजा ढाक के पात रहा है। अब जाकर मनमानी करने वाली औद्योगिक इकाइयों पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने चाबुक चलाया है। कड़ा रूख अख्तियार करते हुए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने ऐसी चार प्रदूषक औद्योगिक इकाइयों को बंद करा दिया है। इसके अलावा एक औद्योगिक इकाई को बंद कर देने का नोटिस दिया है। उदूगम से लेकर मंजिल तक गंगा के समूचे क्षेत्र को तो छोड़िए, केंद्रीय प्रदूषण निगरानी संस्था ने उत्तर प्रदेश में कन्नौज से वाराणसी के बीच पांच सौ किलोमीटर की लंबाई में गंगा के प्रदूषण पर सघन निगरानी के बाद तीन हफ्तों में यह कार्रवाई की है। इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि अपने समूचे सफर के दौरान औद्योगिक से लेकर अन्य प्रकार के कितने प्रदूषणों की मार हमारी यह पूज्य पवित्र नदी झेल रही होगी। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पहली बार पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986 की धारा पांच को लागू करते हुए गंगा के अपराधियों पर यह चाबुक चलाया है। यही नहीं, पर्यावरण मंत्री के निर्देश पर गंगा की स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए कानपुर की 402 चमड़ा इकाइयों की भी जांच होनी है। असल में अब इन नदियों को दुर्गति से उबारने के लिए चाबुक चलाने के अलावा कोई रास्ता भी नहीं है।
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उत्तर भारत की जीवन रेखा और तकरीबन 45 करोड़ भारतीयों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अन्न-जल दे-दिलाकर उनका भरण-पोषण करने वाली गंगा नदी की लगातार बिगड़ती सेहत दुरूस्त करना केंद्र से लेकर सम्बंधित राज्य सरकारों के लिए कई दशकों से लगातार एक चुनौती है। पौराणिक काल से लेकर आज की उत्तर आधुनिक इक्कीसवीं सदी में भी गंगा का धार्मिक व सांस्कृतिक प्रवाह भारतीय जनमानस में अविरल भले ही हो, लेकिन भौतिक सच्चाई तो यही है कि बुरी तरह प्रदूषित इस पवित्र नदी का पानी आचमन लायक नहीं रह गया है। ैकहीं-कहीं नदी का पानी इस कदर प्रदूषित हो चुका है कि आदमी नहाए तो उसे चर्मरोग हो जाए। प्रदूषित गंगा नदी अपने जल-जीवों को भी जीवन दे पाने में कई स्थानों पर फेल साबित हुई है। यह ऐसी कड़वी सच्चाई है, जो गंगा को देवी और मां मानने वाले सरल हृदय धार्मिक लोगों को भी कष्ट पहुंचाती है और प्रकृति व पर्यावरण से प्रेम करने वाले आधुनिक, पढ़े-लिखे लोगों को भी। लेकिन जिस तरह कहीं न कहीं हमारे जंगलात के महकमे में एक बेईमानी है कि वनों की सुरक्षा और संवर्द्धन पर हर साल करोड़ों रूपए उड़ाने के बावजूद जंगल खत्म होते गए, कुछ उसी तरह गंगा समेत कई दूसरी नदियां भी प्रदूषण नियंत्रण की तमाम हवाई कसरत के बावजूद अपना प्राकृतिक स्वास्थ्य हासिल नहीं कर पाइं। केवल गंगा और यमुना की ही बात की जाए तो अबतक एक्शन प्लान के नाम पर हजारों करोड़ रूपए पानी में बहाए जा चुके हैं, मगर यहां भी एक बेईमानी है कि इन नदियों का प्रदूषण कम होने के बजाय बढ़ता गया है। हमारी संस्कृति और जीवन से जुड़ी ये नदियां दिन पर दिन प्रदूषित क्यों होती गइं और हजारों करोड़ रूपए बहा देने के बाद भी इन्हें स्वच्छ क्यों नहीं बनाया जा सका, दरअसल इसमें कोई गूढ़ रहस्य नहीं है। ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ है कि इन दोनों नदियों को प्रदूषित करने वाले सफाई करने वालों पर लगातार भारी पड़ते रहे हैं। राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हों या फिर केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड, गंगा-यमुना में रात-दिन कचरा उगलने वाली औद्योगिक इकाइयों की अनदेखी करके या उनको चेतावनी देकर और बहुत हुआ तो आर्थिक दंड देकर अबतक बख्शती आई हैं। इसका नतीजा ढाक के पात रहा है। अब जाकर मनमानी करने वाली औद्योगिक इकाइयों पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने चाबुक चलाया है। कड़ा रूख अख्तियार करते हुए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने ऐसी चार प्रदूषक औद्योगिक इकाइयों को बंद करा दिया है। इसके अलावा एक औद्योगिक इकाई को बंद कर देने का नोटिस दिया है। उदूगम से लेकर मंजिल तक गंगा के समूचे क्षेत्र को तो छोड़िए, केंद्रीय प्रदूषण निगरानी संस्था ने उत्तर प्रदेश में कन्नौज से वाराणसी के बीच पांच सौ किलोमीटर की लंबाई में गंगा के प्रदूषण पर सघन निगरानी के बाद तीन हफ्तों में यह कार्रवाई की है। इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि अपने समूचे सफर के दौरान औद्योगिक से लेकर अन्य प्रकार के कितने प्रदूषणों की मार हमारी यह पूज्य पवित्र नदी झेल रही होगी। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पहली बार पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986 की धारा पांच को लागू करते हुए गंगा के अपराधियों पर यह चाबुक चलाया है। यही नहीं, पर्यावरण मंत्री के निर्देश पर गंगा की स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए कानपुर की 402 चमड़ा इकाइयों की भी जांच होनी है। असल में अब इन नदियों को दुर्गति से उबारने के लिए चाबुक चलाने के अलावा कोई रास्ता भी नहीं है।
इकहरे चेहरे से लोगों का काम ही नहीं चलता
अरविन्द चतुर्वेद
आजकल इकहरे चेहरे से लोगों का काम ही नहीं चलता, और फिर राजनीति में तो पूछना ही क्या! पारदर्शिता की बातें तो खूब की जाती हैं, लेकिन चेहरे पर चेहरा चढ़ा रहता है। कमाल यह कि राजनीति करने वाले अपने हर चेहरे को असली चेहरे की तरह पेश करते हैं। अभी कल तक कांग्रेस के प्रवक्ता रहे अभिषेक मनु सिंघवी को ही लीजिए। उनका एक चेहरा पार्टी के प्रवक्ता के अलावा नामी वकील का भी है और जाहिर है कि वकील होने के नाते वे अपने किसी भी मुवक्किल के साथ कोर्ट में खड़े हो सकते हैं- उसके बचाव में दलीलें भी दे सकते हैं। लेकिन ठीक इसी जगह यदि वही वकील किसी राजनीतिक दल का प्रवक्ता या प्रतिनिधि चेहरा भी होता है तो उससे अगर पारदर्शिता और नैतिकता की अपेक्षा न भी की जाए तो कम से कम पार्टी के सिद्धांतों और नीतियों के लिए प्रतिबद्धता की अपेक्षा तो रहती ही है। अभिषेक मनु सिंघवी का यही वकील वाला चेहरा केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस के लिए अचानक इतना असुविधा जनक और धर्म संकट में डालने वाला साबित हुआ है कि उन्हें पार्टी प्रवक्ता क ी भूमिका से बेदखल कर दिया गया। वैसे दो चेहरे रखने वाले सिंघवी एक तरह से न घर के हुए, न घाट के। क्योंकि केरल में भूटान लॉटरी के एक घोटालेबाज एजेंट की तरफ से केरल सरकार के खिलाफ मुकदमा लड़ने का मामला जब उजागर हुआ और सिंघवी पर दबाव पड़ा तो एक ओर तो उन्होंने मुकदमे से अपने को पीछे खींच लिया, दूसरी ओर जब कांग्रेस की केरल इकाई की ओर से पार्टी आला कमान पर दबाव बढ़ा तो धर्म संकट की हालत में सिंघवी की कांग्र्रेस के प्रवक्ता पद से भी छुटूटी हो गई। इसी को कहते हैं- दुविधा में दोऊ गए, माया मिली न राम। जरा याद कीजिए कि कांग्रेस के प्रवक्ता के बतौर अभिषेक मनु सिंघवी पत्रकारों को शेर ओ शायरी, कानून की धाराओं का हवाला देकर तर्कसंगत ढंग से विभिन्न मुदूदों पर कितनी कुशलता व प्रखरता से जवाब देते थे और पार्टी का पक्ष रखते थे। मगर उन्होंने वकील के बतौर जो कुछ किया, उसे कांग्रेस पचा नहीं सकती थी। एक आदमी भारत के सबसे घनिष्ठ मित्र व छोटे-से देश भूटान की लॉटरी का भारत में ठेका लेता है और देखते ही देखते एक छोटे-से दुकानदार से भूटान को ठग कर खरबपति बन जाता है और जब भूटान सरकार केरल उच्च न्यायालय में उसके खिलाफ मामला दायर करती है तो बचाने के लिए भारत सरकार का नेतृत्व कर रही पार्टी का प्रवक्ता अपने वकील चेहरे में सामने आ जाता है। जैसी कि खबर है वकील सिंघवी की फीस 20 करो.ड रूपए तय हुई थी, लेकिन पैसे का पता नहीं उन्हें मिले या नहीं, हां चेहरे पर चेहरा रखने की दुविधा में उनकी राजनीति जरूर ध्वस्त हो गई। दिवंगत लक्ष्मीमल सिंघवी सरीखे संविधान के बड़े जानकार वकील और सादगी पूर्ण ढंग से रहने वाले शख्स के बेटे अभिषेक मनु सिंघवी को असल में उनका शानो-शौकत में डूबा अहंकार पूर्ण दोहरा व्यक्तित्व ही ले डूबा। आखिर केरल सरकार की शिकायत को प्रधानमंत्री कार्यालय ने गंभीरता से लिया और केरल में अगले वर्ष होनेवाले चुनाव में फजीहत को टालने की लाचारी में कांग्रेस आला कमान को अभिषेक मनु सिंघवी की प्रवक्ता पद से छुटूटी करनी पड़ी। इस संदर्भ में अगर कोई याद करना चाहे तो देश के दूसरे बड़े वकील राम जेठमलानी को भी याद कर सकता है, जिनका वकील और राजनेता वाले दोनों चेहरे भाजपा को पर्याप्त धर्म संकट में डालते आए हैं।
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आजकल इकहरे चेहरे से लोगों का काम ही नहीं चलता, और फिर राजनीति में तो पूछना ही क्या! पारदर्शिता की बातें तो खूब की जाती हैं, लेकिन चेहरे पर चेहरा चढ़ा रहता है। कमाल यह कि राजनीति करने वाले अपने हर चेहरे को असली चेहरे की तरह पेश करते हैं। अभी कल तक कांग्रेस के प्रवक्ता रहे अभिषेक मनु सिंघवी को ही लीजिए। उनका एक चेहरा पार्टी के प्रवक्ता के अलावा नामी वकील का भी है और जाहिर है कि वकील होने के नाते वे अपने किसी भी मुवक्किल के साथ कोर्ट में खड़े हो सकते हैं- उसके बचाव में दलीलें भी दे सकते हैं। लेकिन ठीक इसी जगह यदि वही वकील किसी राजनीतिक दल का प्रवक्ता या प्रतिनिधि चेहरा भी होता है तो उससे अगर पारदर्शिता और नैतिकता की अपेक्षा न भी की जाए तो कम से कम पार्टी के सिद्धांतों और नीतियों के लिए प्रतिबद्धता की अपेक्षा तो रहती ही है। अभिषेक मनु सिंघवी का यही वकील वाला चेहरा केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस के लिए अचानक इतना असुविधा जनक और धर्म संकट में डालने वाला साबित हुआ है कि उन्हें पार्टी प्रवक्ता क ी भूमिका से बेदखल कर दिया गया। वैसे दो चेहरे रखने वाले सिंघवी एक तरह से न घर के हुए, न घाट के। क्योंकि केरल में भूटान लॉटरी के एक घोटालेबाज एजेंट की तरफ से केरल सरकार के खिलाफ मुकदमा लड़ने का मामला जब उजागर हुआ और सिंघवी पर दबाव पड़ा तो एक ओर तो उन्होंने मुकदमे से अपने को पीछे खींच लिया, दूसरी ओर जब कांग्रेस की केरल इकाई की ओर से पार्टी आला कमान पर दबाव बढ़ा तो धर्म संकट की हालत में सिंघवी की कांग्र्रेस के प्रवक्ता पद से भी छुटूटी हो गई। इसी को कहते हैं- दुविधा में दोऊ गए, माया मिली न राम। जरा याद कीजिए कि कांग्रेस के प्रवक्ता के बतौर अभिषेक मनु सिंघवी पत्रकारों को शेर ओ शायरी, कानून की धाराओं का हवाला देकर तर्कसंगत ढंग से विभिन्न मुदूदों पर कितनी कुशलता व प्रखरता से जवाब देते थे और पार्टी का पक्ष रखते थे। मगर उन्होंने वकील के बतौर जो कुछ किया, उसे कांग्रेस पचा नहीं सकती थी। एक आदमी भारत के सबसे घनिष्ठ मित्र व छोटे-से देश भूटान की लॉटरी का भारत में ठेका लेता है और देखते ही देखते एक छोटे-से दुकानदार से भूटान को ठग कर खरबपति बन जाता है और जब भूटान सरकार केरल उच्च न्यायालय में उसके खिलाफ मामला दायर करती है तो बचाने के लिए भारत सरकार का नेतृत्व कर रही पार्टी का प्रवक्ता अपने वकील चेहरे में सामने आ जाता है। जैसी कि खबर है वकील सिंघवी की फीस 20 करो.ड रूपए तय हुई थी, लेकिन पैसे का पता नहीं उन्हें मिले या नहीं, हां चेहरे पर चेहरा रखने की दुविधा में उनकी राजनीति जरूर ध्वस्त हो गई। दिवंगत लक्ष्मीमल सिंघवी सरीखे संविधान के बड़े जानकार वकील और सादगी पूर्ण ढंग से रहने वाले शख्स के बेटे अभिषेक मनु सिंघवी को असल में उनका शानो-शौकत में डूबा अहंकार पूर्ण दोहरा व्यक्तित्व ही ले डूबा। आखिर केरल सरकार की शिकायत को प्रधानमंत्री कार्यालय ने गंभीरता से लिया और केरल में अगले वर्ष होनेवाले चुनाव में फजीहत को टालने की लाचारी में कांग्रेस आला कमान को अभिषेक मनु सिंघवी की प्रवक्ता पद से छुटूटी करनी पड़ी। इस संदर्भ में अगर कोई याद करना चाहे तो देश के दूसरे बड़े वकील राम जेठमलानी को भी याद कर सकता है, जिनका वकील और राजनेता वाले दोनों चेहरे भाजपा को पर्याप्त धर्म संकट में डालते आए हैं।
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