हिन्दी का हाल और कुछ सवाल

अरविंद चतुर्वेद :
हर साल एक तारीख आती है : 14 सितम्बर, जिसे हिन्दी दिवस कहते हैं। सालभर तक पता नहीं क्या करते रहने वाले सरकारी दफ्तरों के राजभाषा विभाग और उनके कर्ता-धर्ता हिन्दी दिवस व सप्ताह वगैरह मनाने में जुट जाते हैं। एक राजभाषा अधिकारी मित्र की कही हुई बात याद आ रही है। उन्होंने कहा था- सच पूछिए तो चाहता ही कौन है कि हिन्दी वास्तव में लागू हो जाए। अगर ऐसा हो गया तो फिर राजभाषा विभागों और हिन्दी अधिकारियों की जरूरत क्या रहेगी? उन्होंने यह बात मजाक में भले ही कही हो, लेकिन यह एक गंभीर संकेत भी है।
इस बात को दूसरी तरफ से देखें। क्या यह सच नहीं है कि अगर हिन्दुस्तान से अंग्रेजी और अंग्रेजियत का खात्मा हो जाए तो बहुतेरे लोग मुश्किल में पड़ जाएंगे? असल में हमारी समूची नौकरशाही निचले दर्जे के कर्मचारियों समेत जनता पर अंग्रेजी में ही तो रोब झाड़ती है। भारतीय भाषाओं में रोब झाड़ना आसान नहीं है। वहां रोब झाड़ने का तर्क देना पड़ेगा और तुरंत जवाब भी सुनना पड़ जाएगा। इस तरह अपने देश के संदर्भ में अंग्रेजीदां लोगों को अंग्रेजी तर्क या बहस से बचने की सहूलियत तो देती ही है, वह उन्हें जवाबदेही से भी बचाती है। यानी कि मनमानी के मौके मुहैया कराती है। चाहे देश के इतिहास, भूगोल, प्रकृति, संपदा, कला, संस्कृति, विज्ञान आदि के बारे में रत्ती भर जानकारी न हो, लेकिन यदि एक भाषा अंग्रेजी आती हो तो अपने को न सिर्फ विद्वान गिनाया जा सकता है, बल्कि बड़े-बड़े विद्वानों की पंूछ मरोड़ी जा सकती है। उन्हें नकेल पहनाई जा सकती है। तमाम संस्थानों-प्रतिष्ठानों और प्रकल्पों-उपक्रमों को देख लीजिए, क्या ऐसा नहीं हो रहा है। आखिर एक लोकतांत्रिक देश में लोक भाषाओं को धकिया कर अंग्रेजियत की अल्पसंख्यक जिद बनाए रखने की तुक ही क्या है?
अब अंग्रेजी के भारतीय हमददों के तर्क पर गौर करें। उनका पहला तर्क यही होता है कि भारत जैसे बहुभाषी देश में अंग्र्रेजी एकसूत्रता का काम करती है- सबको जोड़ती है। दूसरे, वह विश्वभाषा है और इसके जरिए हम दुनिया के संपर्क में रहते हैं। और तीसरे, यह कि विज्ञान और टेक्नोलॉजी में अंग्रेजी के बगैर हम तरक्की नहीं कर सकते-पिछड़ जाएंगे। पर इन तकों की असलियत क्या है? क्या अंग्रेजी इसलिए अलग-अलग भाषा-भाषियों को जोड़ती है कि वह किसी की भाषा नहीं है और इसे सीखकर अलग-अलग भाषा-भाषियों को आपस में संवाद करना पड़ता है। फिर संवाद कायम करने की जरूरत के तहत भारतीय भाषाएं या हिन्दी क्यों नहीं सीखी जा सकती? क्या यह जरूरी है कि दो बिल्लियों में बराबर-बराबर बांटने के बहाने सारी रोटियां बंदर के ही हाथ लगें।
असल में ऐसा है भी नहीं। कोलकाता व बंगाल और मुंबई व महाराष्ट्र के कल-कारखानों में काम करने वाले, व्यापार-कारोबार करने वाले ज्यादातर लोग अंग्रेजी सीखकर तो नहीं ही गए हैं और न रास्ता-बाजार में हर जगह टकराने वाला आम बंगाली या मराठी अंग्रेजी जानता है। फिर भी सबकुछ चल रहा है। ऐसा ही चेन्नई, अहमदाबाद, सूरत, हैदराबाद, नागपुर, गुवाहाटी और चंडीगढ़ में भी है। संवाद की जरूरत तो जीवनयापन और सामाजिकता के तकाजे से है। और, यह काम आपस में भारतीय भाषाभाषी ही मिलजुल कर कर सकते हैं, करते आ रहे हैं। अलबत्ता अंग्रेजी की वकालत करने वालों से यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि क्या अंग्रेजों के भारत आने से पहले भारतीयों का आपसी संपर्क नहीं था? या अंग्रेज ही जब आए तो उन्होंने भारतीयों से कैसे संवाद कायम किया? कम से कम अंग्रेजों के भारत आने से पहले तो यहां अंग्रेजी नहीं ही आई थी। इसी के साथ अंग्रेजी के विश्वभाषा होने और अंग्रेजी के बगैर विज्ञान-टेक्नोलॉजी में पिछड़ जाने के तर्क का भी मुआयना किया जा सकता है। विकास का अर्थ अगर मनुष्य व संपदा के विकास और प्रकृति की समृद्धि से है तो तुलनात्मक दृष्टि से भारतीय अंग्रेजों के आने से पहले उनसे पिछड़े हुए नहीं, बल्कि ज्यादा विकसित थे। और, इससे भी काफी पहले श्रीलंका, बर्मा, थाइलैंड, चीन, जापान आदि देशों तक बौद्ध धर्म-दर्शन का प्रचार-प्रसार भी अंग्रेजी के जरिए नहीं हुआ था। आज भी दुनिया में ऐसे तमाम देश हैं, जहां की भाषा यानी संपर्क भाषा अंग्रेजी नहीं है फिर भी वे दुनिया की मुख्य धारा में शामिल हैं और उन्होंने ब्रिटेन से कुछ कम तरक्की नहीं की है। कई तो उससे आगे भी हैं- चीन और जापान को अपनी तरक्की के लिए अंग्रेजी की बैसाखी नहीं टेकनी पड़ी है। यह जग-जाहिर है।
वास्तविकता यह है कि अंग्रेजी भारत के अलग-अलग भाषा-समाजों के बीच पर्दा गिराने और दीवार खड़ी करने का काम कर रही है। यहां तक कि लोक और तंत्र के बीच खाई खोदने का काम भी इसने किया है, जिसके कारण देश में लोकतंत्र अपने सही अर्थ में फलीभूत नहीं हो पा रहा है और तमाम जनवादी मूल्य पानी भर रहे हैं। स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर राजधानी दिल्ली में एक कवि सम्मेलन या मुशायरा आयोजित कर-करा देने से राजभाषा या राष्ट्रभाषा का दायित्व पूरा नहीं हो जाता। असल में हमारे पास न कोई सुस्पष्ट भाषानीति है, न साफ सांस्कृतिक दृष्टि और न ही मजबूत इच्छा-शक्ति। हिन्दी ही नहीं, कोई भी भाषा महज शब्दावली, व्याकरण या तकनीक भर नहीं होती। वह अपने बोलने वाले समाज की जीवन शैली, उसके सपने और उन सपनों को पूरा करने की इच्छाओं व कोशिशों का वाहक होती है। यही होकर अंग्रेजी सारी खुराफातों की जड़ है और यही न होने देकर हिन्दी की राह में रोड़े अटकाए जाते हैं।
लेकिन इतना तो मानना पड़ेगा कि तमाम रूकावटों और उपेक्षाओं के बावजूद हिन्दी का दायरा अपनी तरह से बढ़ता गया है। दूसरी भारतीय भाषाओं और उनके बोलने वालों के संपर्क में आने के कारण एक सहज रासायनिक प्रक्रिया में हिन्दी का शब्द भंडार काफी बढ़ा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक खास अंचल की खड़ी बोली जिसे आज कीहिन्दी के रूप में हम जानते हैं, उसने तमाम बोलियों व प्रादेशिक भाषाओं के साहचर्य से बहुत कुछ अर्जित किया है। आज की हिन्दी में 10 से लेकर 75 फीसदी तक ऐसे शब्द मिल जाएंगे, जो देशभर की बोलियों और भाषाओं में मौजूद हैं। और ऐसा हुआ है तो इसलिए नहीं कि राजभाषा विभाग ने कोई तीर मारा है। हिन्दी का विकास तो इसलिए हुआ और हो रहा है कि संचार के साधनों, भाषा-व्यवहार के माध्यमों और यातायात के साधनों का देशभर में तेज विस्तार हुआ है। अलग-अलग भाषाभाषी रोजगार और कारोबार के लिए देश में इधर से उधर स्थाई तौर पर जा बसे हैं, या फिर उनका आना-जाना यहां से वहां तक लगा रहता है। हिन्दी की अग्रगामिता और गुणधर्मिता यहीं देखी जा सकती है।
इसके समांतर खेद के साथ कहना पड़ता है कि जहां राजभाषा विभाग हिन्दी के मामले में अपनी अटपटी नियमावलियों में उलझे और जकड़े हुए हैं, वहीं दूसरी ओर हिन्दी भाषा-साहित्य की शिक्षा देनेवाले विश्वविद्यालय और कालेजों के हिन्दी विभागों का पाठूयक्रम बहुत हद तक लकीर का फकीर, पुराना-धुराना और अजीबोगरीब किस्म की शास्त्रीयता में जकड़ा हुआ है। यह पाठूय क्रम सुधारों और परिवर्तनों के बावजूद सृजन के बहुआयामी समकालीन परिदृश्य से 25 से लेकर 40 साल पीछे है। ऐसा कहने का अर्थ यह नहीं है कि हिन्दी के छात्रों को इसकी परंपरा और अतीत की जानकारी न दी जाए। लेकिन यह भी जरूरी है कि वे अपने भाषा-साहित्य की मौजूदा स्थिति और स्वभाव के बारे में भी तो जानें। वरना भाषा-साहित्य के भविष्य-संकेत व चुनौतियां को वे कैसे जान-समझ पाएंगे। जहां तक राजभाषा विभाग और इसके हिन्दी अधिकारियों का सवाल है, स्थिति कुछ ज्यादा ही विकट है। हिन्दी को देश की संपर्क भाषा बनाने के मकसद से आजादी के बाद सरकार ने इसे राजभाषा का संवैधानिक दर्जा देकर इसकी तरक्की के लिए अपने तमाम संस्थानों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों में राजभाषा विभाग खोले। सभी मंत्रालयों की राजभाषा समितियां भी हैं, केंद्रीय हिन्दी निदेशालय है, भाषा प्रशिक्षण केंद्र हैं, और भी बहुत कुछ है। इन विभागों के तमाम कागज-पत्र, बही-खाता, सम्मेलन-रिपोर्ट, फाइल-दफ्तर वगैरह तामझाम को देखकर लगता है कि राजभाषा विभाग हिन्दी के लिए जैसे कोई पहाड़ तोड़ रहे हों। लेकिन हकीकत में ऐसा है नहीं। अगर ये विभाग, इनके अफसर और अमले सचमुच पहाड़ तोड़ रहे होते और हिन्दी का माहौल बनाने का काम कर रहे होते तो क्या आजादी के इतने बरसों बाद भी राजभाषा के मामले में संविधान की ऐसी-तैसी होती? कौन नहीं जानता कि अंग्रेजी की अठखेलियां सबसे ज्यादा सरकारी दफ्तरों में ही हैं और अफसरशाही की अंग्रेजी हेकड़ी भी।
इस विभाग की अपनी कोई भाषा नीति होगी तो जरूर ही। लेकिन इनके लोगों ने अंग्रेजी से अनुवाद की जैसी सरकारी हिन्दी पैदा की, उससे मुठभेड़ हो जाए तो अच्छी-खासी हिन्दी जानने वालों के भी छक्के छूट जाएं। पता नहीं क्यों और किस भाषा वैज्ञानिक आधार पर सरकारी हिन्दी की शब्दावली में तत्सम यानी संस्कृत के अप्रचलित शब्दों को रखने की रूझान अधिक दिखाई पड़ती है। हिन्दी के मानक रूप का मतलब संस्कृत की तत्सम शब्दावली ही होती है, ऐसा किस भाषा विज्ञान और वैज्ञानिक की मान्यता है? नतीजा यह है कि इस शुद्धतावाद और अंग्रेजी के सरकसी अनुवाद में राजभाषा विभाग हिन्दी की फजीहत कर रहा है। इससे तो यही लगता है गोया हिन्दी को कठिन व दुरूह बनाए रखने और अप्रचलित कर देने की कोई सुनियोजिज योजना हो। हिन्दी के सरकारी सेवकों को शायद हिन्दी की ग्रहणशीलता पर भरोसा नहीं है। वरना अंग्रेजी, पुर्तगाली, अरबी, फारसी से लेकर देश की तमाम बोलियों और प्रादेशिक भाषाओं के शब्दों को हिन्दी ने पचाया है-उन्हें अपना बनाया है। यह प्रक्रिया लगातार जारी है।
लेकिन नहीं, हिन्दी के सरकारी सेवक टाइपराइटर को टंकक, टाइप को टंकण, नोट या नोटिंग करने को टिप्पण, ड्राफ्ट को प्रारूप और ड्राफ्टिंग को प्रारूपण ही लिखेंगे। इसी तरह डॉक्टर, मास्टर, स्कूल, कॉलेज, टीचर, इंस्पेक्टर, सुपरवाइजर, एसपी या पुलिस कप्तान कहने में क्या हर्ज है। अंग्रेजी के ये शब्द हिन्दी में घुलमिल गए हैं और अपने स्वभाव के मुताबिक हिन्दी ने इनका बहुवचन-डाक्टरों, मास्टरों, टीचरों, स्कूलों, कालेजों, इंस्पेक्टरों, सुपरवाइजरों वगैरह बनाया है। क्या कोई कह सकता है कि अंग्रेजी शब्दों के ये बहुवचन भी अंग्रेजी हैं? असल में यह हिन्दी की अपनी गतिशीलता और ग्रहणशीलता की पहचान है।
भाषा की शुद्धता और शास्त्रीयता का राग अलापने वाले हिन्दी की गतिशीलता के इस प्रवाह और ग्रहणशीलता के इस गहरे प्रभाव पर चाहे जितना बिदकें और नाक-भौं सिकोड़ें, लेकिन महज तत्सम शब्दों और संस्कृत के उपसर्ग-प्रत्यय लगाकर बनाई गई शब्दावली से इसे नहीं रोक पाएंगे। आप अधिशासी, अधीक्षक, निरीक्षक, अभियंता, अधिकर्ता, धारक, यंत्री वगैरह लिख-छापकर कागज काला करते रहिए,, मोटी-मोटी पोथियां छापिए, अनुदान लीजिए, तरक्की पाइए- लेकिन इससे कुछ होने-जाने का नहीं है। जनता तो इनके प्रचलित अंग्रेजी शब्द एक्जिक्यूटिव, सुपरिटेंडेंट, इंस्पेक्टर इंजीनियर, एजेंट, ओवरशियर आदि ही बोलेगी। क्योंकि इन शब्दों को हिन्दी पचा चुकी है। क्योंकि हिंदी को आज नहीं तो कल सचमुच समूचे भारत की जीवंत संपर्क भाषा होना है। क्योंकि इसी ग्रहणशीलता के बल पर वह ऐसा कर भी सकती है।
सरकारी हिन्दी का तो यह हाल है कि एक विभाग की शब्दावली जानने वाला अधिकारी दूसरे विभाग की शब्दावली का बहुत आसानी से मायने तक नहीं बता सकता है। भरोसा न हो तो किसी सरकारी हिन्दी सेवक से पूछकर देखिए कि भारत के भाषाजात अल्प भाषा-भाषियों के आयुक्त का कार्यालय कहां है? बशर्ते वह हिन्दी अधिकारी इसी विभाग में काम न करता हो और यह हिन्दी उसने खुद ईजाद न की हो। ऊटपटांग सरकारी हिन्दी के ऐसे बेशुमार उदाहरण दिए जा सकते हैं।
फिर अंग्रेजी ही क्यों? बांग्ला, मराठी, गुजराती, पंजाबी, असमिया, ओड़िया आदि के संपर्क-साहचर्य में आकर भी हिन्दी ने बहुत सारे शब्द और अभिव्यंजना-कौशल इन भाषाओं से ग्रहण किया है। यह हिन्दी की कमजोरी या भाषा-प्रदूषण नहीं है। यह हिन्दी की शक्ति और अपना स्वभाव है। इस शक्ति और स्वभाव को राजस्थान की मीरा, पंजाब के नानक, ब्रज के सूर, अवधी के तुलसी-जायसी, पूरबी के कबीर, मैथिली के विद्यापति, बुंदेलखंड के जगनिक ही नहीं, चंद बरदाई से लेकर अमीर खुसरो और नामदेव-रैदास सरीखे कितनों ने बनाया है-पुख्ता किया है। और, इसीलिए भारतीय संदर्भ में इस भाषा के साथ गैर-हिन्दीभाषी शब्द बेमानी हो जाता है। असल में इस देश में जो भी जिस अंदाज और लहजे में हिन्दी बोलता है, बोलने की प्रक्रिया में है, सीख रहा है या समझ लेता है, वह हिन्दीभाषी ही है। सुविधा के लिए अगर कहना ही चाहें तो बांग्ला-हिन्दीभाषी, मराठी-हिन्दीभाषी, असमिया-हिन्दी भाषी, तमिल-तेलगू-मलयालम-हिन्दीभाषी कह सकते हैं। आखिर कोलकाता में हिन्दी का स्थानीय कलकतिया रूप और मुंबई में हिन्दी का मुंबइया मिजाज है या नहीं। मुंबई में मराठी के संपर्क-साहचर्य में जो बिंदास हिन्दी बोली-बतियाई जाती है, उसे आप खाली-पीली नहीं कह सकते और न कलकतिया हिन्दी में जो बांग्ला ढुक गई है, उसे निकाल सकते हैं- बूझे कि नहीं। भाषा के मामले में बोका बनने से नहीं चलेगा। इसी तरह गुवाहाटी में असमिया के संपर्क-साहचर्य से जो हिन्दी लाहे-लाहे पसर रही है, उसे कबूल करना होगा। नहीं तो बनारसी लहजे में कहें तो आप घोंचू रह जाएंगे।
कहना नहीं होगा कि अहिंदी भाषी कहे जानेवाले राज्यों की राजधानियों -कोलकाता, गुवाहाटी, मुंबई, चंडीगढ़ और नागपुर आदि शहरों से छपकर अपने-अपने इलाके में पढ़ जा रहे हिन्दी के दैनिक-साप्ताहिक अखबार ही भविष्य की हिन्दी का स्वरूप व चरित्र बनाएंगे। क्योंकि वे सीधे पाठकों के हाथ पहुंचते हैं और उनसे सीधा संवाद बनाते हैं। हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिहाज से फिल्म, टीवी व रेडियो जैसे दृश्य-श्रव्य माध्यमों की भूमिका भी झुठलाई नहीं जा सकती। यह जरूर है कि सांस्कृतिक स्तर पर येे माध्यम कई बुराइयां भी फैला रहे हैं।
लेकिन, हिन्दी के सामने असली खतरा दूसरा ही है। डर इस बात से लगता है कि इतिहास में जो दुर्घटना संस्कृत जैसी अत्यंत समृद्ध भाषा या पालि के साथ घटी, वैसी ही दुर्घटना का शिकार हिन्दी न हो जाए। अगर राम जैसे चरित्र को साम्प्रदायिक बनाने की कोशिश की जा सकती है, तुलसी जैसे लोकनायक महाकवि को साम्प्रदायिकता के घेरे में लाने की कोशिश की जा सकती है तो क्या ताज्जुब कि साम्प्रदायिकता की राजनीति हिन्दी को भी अपनी जद में लेने-लाने की कोशिश न करे? अगर ऐसा कभी हुआ तो यह हिन्दी का दुर्भाग्य होगा। क्योंकि कालिदास, बाण, भवभूति, चरक, सुश्रुत जैसी प्रतिभाओं के बावजूद संस्कृत पर पंडितों और कर्मकांडियों की धार्मिक-साम्प्रदायिक भाषा होने का ठप्पा लगते ही बौद्धौं की पालि भाषा ने इसे उखाड़ फेंका। इसी तरह बौद्ध मठों के अनाचार और हीनयानियों  के दुराचरण के चलते पालि भाषा को मिटूटी पलीद होते देर नहीं लगी। तब फिर हिन्दी के साथ ऐसा अघट क्यों नहीं घट सकता?
हिन्दी का भला चाहने वालों को इसके प्रति ही ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। ताकि हिन्दी के जरिए जोड़ने के बजाय तोड़ने की कोशिश न की जा सके।
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आओ किसान-किसान खेलें

अरविन्द चतुर्वेद
उत्तर प्रदेश में नोएडा-आगरा एक्सप्रेस वे के 168 किलोमीटर की लम्बाई में उसके लिए अधिग्रहीत की जानेवाली इर्दगिर्द की जमीन और उस जमीन के लिए किसानों को दिए जानेवाले मुआवजे को लेकर इस पूरे दायरे में सभी राजनीतिक दलों की सियासत तेज हो गई है। राजनीतिक दलों की प्रतिस्पद्धा और प्रतियोगिता ऐसी कि कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता। सभी चाहते हैं कि वही किसानों के असली हमदर्द दिखें। अबकी बार चूंकि प्रदेश में सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी के हाथ जले हैं, इसलिए स्वाभाविक रूप से उसे दबाव में रखकर सभी कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। जबकि असलियत यह है कि देशभर में विकास योजनाओं की दुहाई देकर उद्योग-धंधे और दूसरे निर्माण कायों के लिए विभिन्न दलों की राज्य सरकारें किसानों-आदिवासियों की जमीनें अधिगृहीत करती आ रही हैं। अभी लोगों को पिछले बरसों में पश्चिम बंगाल के सिंगूर और नंदीग्राम में किसानों की जमीन के अधिग्रहण और उग्र आंदोलनों के बाद जमीन वापसी और टाटा की विदाई की घटना भूली नहीं होगी। उड़ीसा में तो भूमि अधिग्रहण के खिलाफ लगातार आंदोलन ही चल रहा है और वहां की सरकार कान में रूई डालकर बैठी हुई है। फिर उड़ीसा ही क्यों, कांग्रेस और भाजपा शासित राज्यों में भी किसानों की जमीनें औने-पौने मुआवजे पर अधिगृहीत की गई हैं और स्थानीय लोगों की मांगों की खूब अनदेखी हुई है।
अगर तुलना ही की जाए तो यूपी सरकार ने हठधर्मिता के बजाय किसानों की मांगों के अनुरूप न सिर्फ तत्परता दिखाई है, बल्कि दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करते हुए प्रदर्शनकारी किसानों का गुस्सा शांत करने की कोशिश भी की है। इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि भूमि अधिग्रहण और मुआवजे के मसले को हल करने के लिए समस्या की जड़ों को देखा जाए, न कि टहनियां और पत्ते गिने जाएं। अपने आप में इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि आजादी के 63 साल बाद भी जमीन अधिग्रहण के मामले में अंग्रेजी राज में 1894 में बना भूमि अध्याप्ति अधिनियम लागू है। जाहिर है कि ऐसी सूरत में देश के विभिन्न राज्यों में सत्तारूढ़ दलों की सरकारें अपने-अपने ढंग से जमीनों का अधिग्रहण करती आ रही हैं। यूपी ही नहीं दूसरे राज्यों में भी अलग-अलग काम के लिए अलग-अलग जगहों पर अधिगृहीत जमीन के मुआवजे अलग-अलग रेट पर दिए गए हैं। इस मामले में कोई भी सत्तारूढ़ दल पाक साफ नहीं कहा जा सकता।यूपी के ताजा किसान आंदोलन के बाद राज्य सरकार ने हठधर्मिता के बजाय ऐसे विवादों को सुलझाने के लिए जिला, मंडल और राज्य स्तर पर कमेटियां गठित करने की घोषणा की है। मुख्यमंत्री मायावती ने किसानों की भूमि के अधिग्रहण को लेकर आए दिन हो रहे विवादों व खून खराबे के लिए अगर केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया है तो इसे महज आरोप कहकर झुठलाया नहीं जा सकता। उनका यह कहना कतई गलत नहीं है कि बदलते परिवेश में केंद्र सरकार को चाहिए था कि वह भूमि अध्याप्ति अधिनियम में ऐसे संशोधन करती, जिससे किसानों का हित सुरक्षित होता और सार्वजनिक उदूदेश्यों के लिए भूमि अधिग्रहण की आवश्यकताओं की पूíत भी होती। अब केंद्र सरकार ने कहा है कि भूमि अधिग्रहण पर जल्दी ही वह एक व्यापक विधेयक लाएगी। चलिए, अगर आग लगने के बाद ही सही, केद्र सरकार कुआं खोदना चाह रही है तो उसका भी इंतजार किया जा सकता है!
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भोपाल त्रासदी का उत्तरकाण्ड

अरविन्द चतुर्वेद : 
भोपाल की औद्योगिक गैस त्रासदी का खलनायक  वारेन एंडरसन हजारों लोगों को मारकर, हजारों की जिंदगी अपाहिज बनाकर और हजारों के भविष्य को बीमार बनाकर शासन-प्रशासन के सुरक्षा कवच की मदद से भोपाल से दिल्ली और फिर दिल्ली से सीधे अमेरिका भाग गया, यह तो एक कहानी है, लेकिन बहुत बड़े जनसंहार के अभियुक्तों के खिलाफ बहुत मामूली-सी दो वर्ष की जमानती सजा के बाद अब विभिन्न माध्यमों से इस त्रासदी के उत्तर कांड की जो कथाएं सामने आई हैं, वह तो और भी ज्यादा त्रासदी पूर्ण हैं। मध्य प्रदेश के तत्कालीन कांगे्रसी मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और कांगे्रस की तत्कालीन केंद्र सरकार पर अमेरिकी दबाव में यमराज एंडरसन को भगाने, सीबीआई द्वारा लचर तरीके से जांच करने, अभियोग की कमजोर धाराएं लगाने और कमजोर पैरवी के कारण सहअभियुक्तों के अदालत में ‘हारकर भी जीत जाने जैसी सहूलियत’ में आ जाने के कारण भुक्तभोगियों के 25 साल पुराने जख्म हरे हो गए हैं। लेकिन क्या गैस त्रासदी के भुक्तभोगियों के जख्म बीते 25 बरसों में एक दिन के लिए भी कभी सूखे हैं? गैस प्रभावित लोग इन बरसों में असाध्य बीमारियों की गिरफ्त में आकर तिल-तिल कर मरते आए हैं, मगर उनके इलाज की जैसी मुकम्मल और सघन व्यवस्था होनी चाहिए, वह इतने बरसों में भी नहीं हो पाई है- यह है भोपाल त्रासदी का उत्तर कांड। पुराने भोपाल के वह इलाके जो यूनियन कार्बाइड कारखाने की गैस की जद में आ गए थे, उनकी जिंदगी आजतक क्यों नरक बनी हुई है? नए भोपाल के स्वर्ग में जो सरकार और प्रशासन बैठा हुआ है, उसके चिराग तले यह नरक का अंधेरा क्यों है? इतना तो तय है कि जिन जिंदगियों को जहरीली गैस के दैत्य ने लील लिया है, उन्हें कोई वापस नहीं ला सकता, मगर बच गई जिंदगियों को बेहतर इलाज और बेहतर जीवन स्थितियां तो मुहैया कराई ही जा सकती हैं। कम से कम राहत और हिफाजत के मामले में तो राजनीति की गुंजाइश नहीं ही खोजी जानी चाहिए। गैसकांड के बाद के 25 बरसों में मध्य प्रदेश के इस राजधानी-शहर में कांगे्रस की भी सरकार रह चुकी है और भाजपा के भी कई मुख्यमंत्री गद्दीनशीन रहे आए हैं, लेकिन गैस के मारे बदनसीबों को बेहतर इलाज और समुचित राहत के लिए किसी ने कुछ खास नहीं किया है। सच पूछिए तो यूनियन कार्बाइड से मिले हुए या वसूले गए नाकाफी मुआवजे के आधे-अधूरे, छीना-झपटी वाले वितरण के अलावा किन्हीं सरकारों ने गैस प्रभावितों के लिए कुछ खास किया ही नहीं है। आज भी गैस पीडि़त-प्रभावित लोग अपनी घायल जिंदगी लिए दर-दर की ठोकर खा रहे हैं। दो साल की जमानती मामूली सजा की प्रतिक्रिया में उठे तूफान के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कुछ सदस्यों की कमेटी बनाकर कानूनी पहलुओं की छानबीन के साथ हाईकोर्ट जाने की बात कही तो केंद्रीय विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने कहा कि अभी खेल खत्म नहीं हुआ है और एंडरसन का प्रत्यर्पण कराया जा सकता है। प्रधानमंत्री ने भी मंत्रियों का एक समूह बनाया, जिसने  भोपाल जाकर गैस पीडि़तों-प्रभावितों की स्थितियों-परिस्थितियों का जायजा लेकर उनको अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। लेकिन एक गैस प्रभावित का सवाल वाकई सबके सामने खड़ा है- अगर हम गैस पीडि़तों की इतनी ही चिंता थी तो किसी पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में कभी हमारा जिक्र क्यों नहीं किया?
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महंगाई की बारिश में समर्थन मूल्य की छतरी

अरविन्द चतुर्वेद : 
मानसून की  आहट मिल चुकी  है और सरकार ने हर साल की  तरह खरीफ की  फसलों के समर्थन मूल्य घोषित कर दिए हैं। यह अलग बात है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की छतरी महंगाई की तूफानी बारिश में किसानों समेत देश के उपभोक्ताओं को  भीगने और गलने से कितना बचा पाती है। इंद्रदेव से प्रार्थना कीजिए  कि मानसून की कृपा  बनी रहे ताकि खेती -किसानी अच्छी  हो जाए। इसके दो फायदे होंगे- एक  तो पैदावार अच्छी होगी तो किसानों और ग्रामीन  भारत को राहत मिलेगी, दूसरे सरकार को  अब तक  महंगाई के लिए खराब मौसम की  बहानेबाजी का  मौका नहीं मिलेगा। फिर  भी ऐसा हो सकता है कि अगर महंगाई बनी ही रहती है तो अपने कृषि  मंत्री शरद पवार और अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह मिलजुल कर कोई नई अर्थशास्त्रीय बहानेबाजी खोज ही लेंगे। प्रधानमंत्री की  अध्यक्षता  में संसद की  आर्थिक  समिति ने दाल-दलहन की  आसमान छूती कीमतों को  ध्यान  में रखते हुए इस बार खरीफ की  दलहन फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में जबरदस्त बढ़ोतरी करते हुए कीर्तिमान ही कायम कर डाला है। सरकार के  फैसले के  मुताबिक  अरहर, मूंग और उड़द के  न्यूनतम समर्थन मूल्य में 380 से 700 रुपए कुंतल  की  वृद्धि कर दी गई है। अब अरहर दाल का न्यूनतम समर्थन मूल्य 3000 रुपए कुंतल होगा, जबकी  मूंग का  न्यूनतम समर्थन मूल्य  410 रुपए बढ़ाकर 3,170 रुपए और उड़द का  380 रुपए बढ़ाकर 2,900 रुपए प्रति-कुंतल कर दिया गया है। सरकार की  तरफ  से यह भी कहा गया है कि अनाजों दाम किसानों को  मंडियों में फसल के आने के  दो महीने के  भीतर मिल जाएगा। बताया गया है कि कृषि लागत और कीमत आयोग की सिफारिशों को  ध्यान  में रखते हुए सरकार ने समर्थन मूल्य बढ़ाए हैं, बल्कि  सिफारिशों से कुछ ज्यादा ही समर्थन मूल्य घोषित किया है। दलहन फसलों के अलावा धान का  न्यूनतम समर्थन मूल्य भी 50 रुपए बढ़ाकर हजार रुपए कुंतल कर दिया गया है। दलहन फसलों पर प्रति किलो  पांच रुपए की अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि देने की भी सरकार ने बात कही है। सरकार का मकसद शायद  यह हो कि किसानों को खेती की लागत से ज्यादा मूल्य दिया जाए ताकि  उत्साहित  होकर देश भर के किसान दलहन फसलों की  खेती में ज्यादा दिलचस्पी लें और दलहन खेती का रकबा बढ़ जाए। शायद यह इसलिए भी जरूरी है कि देश को  खिलाने भर के  लिए दाल का  पर्याप्त उत्पादन  न होने के कारण हर साल सरकार को करीब 40 लाख टन दालों का  आयात करना पड़ता है। लेकिन क्या  समर्थन मूल्य में यह बढ़त खेती के घाटे को पाटने में सक्षम साबित हो सकेगी? यह याद रखना होगा कि  डीजल की आसमान छूती कीमतें, महंगी रासायनिक  खाद व महंगे कीटनाशकों समेत महंगाई के ही अनुरूप खेत मजूरी में वृद्धि -- कुल  मिलाकर अपने देश में किसानों को घाटे की  खेती हताश और हतोत्साहित किये  रहती है। फिर  इस बात की गारंटी कौन दे सकता है कि किसानों को उनकी उपज का पूरा मूल्य बिचौलियों और कमीशनखोरों के बीच में आए बगैर ही मिल जाएगा? समर्थन मूल्य में बढ़त का बहाना लेकर आढ़तियों से लेकर अनाज बाजार के  छोटे-बड़े कारोबारी अनाजों के दाम बढ़ाकर क्या  आम उपभोक्ताओं की माली हालत और पतली नहीं करेंगे? बात-बात पर अमेरिका को आदर्श मानने वाली हमारी सरकार आखिर किसानों को  खेती पर न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने के बजाय अधिकतम सब्सिडी  देने के बारे में क्यों  नहीं सोचती!
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नरेंद्र मोदी का बच्चा-राग

अरविन्द चतुर्वेद :
बचपन कैसे सुरक्षित रहे, बच्चों की दुनिया को कैसे खुशगवार और रचनात्मक बनाया जाए- इसकी चिंता सरकारों को भले ही कम हो और बच्चों की बेहतरी का सारा दारोमदार उनके मां-बाप पर छोड़कर सरकारें निश्चिंत हो जाती हों, लेकिन सियासत करने वाले बच्चों का इस्तेमाल अपनी राजनीति के लिए भी खूब करते हैं। अभी ताजा उदाहरण गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के भविष्य की आशा कहे-समझे जाने वाले नरेंद्र मोदी ने पेश किया है। अपने गृह प्रदेश महाराष्ट्र में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने पार्टी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई पार्टी और उसकी सरकारों के बाबत विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श के लिए, लेकिन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना न देखकर दूसरे के फटे में हाथ डालने की अपनी पुरानी आदत के मुताबिक यह उच्च विचार प्रकट किया कि कहा जाता है कि जवाहरलाल नेहरू को बच्चों से बेहद प्रेम था और उनके जन्मदिन को बाल दिवस का नाम दिया गया। बच्चे उन्हें चाचा नेहरू कहकर पुकारते थे और यह हमारे मन में परोपकारी नेहरू की छवि तैयार करता है। लेकिन उन्होंने बच्चों का क्या भला किया? नरेंद्र मोदी इतने पर ही नहीं रूके, उन्होंने कहा कि बाल दिवस से उन बच्चों की दशा सुधारने में क्या मदद मिली है जिन्होंने गरीबी के साए में अपना बचपन खोया। मोदी का सवाल था कि क्या इससे उन बच्चों के आंसू पोछे जा सकते हैं जिन्हें बाल दिवस पर एक थाली भोजन पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है? नरेंद्र मोदी के इन उच्च विचारों से अव्वल तो यही लगता है, गोया गडकरी ने भाजपा के मुख्यमंत्रियों को देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू के कामकाज की समीक्षा के लिए बुलाया हो! आखिर आजादी के तुरंत बाद खड़े हो रहे देश के प्रधानमंत्री के कामकाज के मूल्यांकन की आज क्या जरूरत है, यह शायद मोदी ही जानते होंगे। असल में होता यह है कि जब लोग वर्तमान की चुनौतियों और समस्याओं का मुकाबला नहीं कर पाते तो अतीत की गुफाओं में झांकने लगते हैं। शायद मोदी ने भी यही रास्ता चुना हो। जबकि आज के भारत की अपनी अनेक समस्याएं हैं, जिनमें एक बड़ी आबादी का देश होने के नाते स्वाभाविक तौर पर बच्चों के लिए भी बहुत कुछ करने की जरूरत है। दूसरी बात यह भी है कि नरेंद्र मोदी अपनी प्रतिद्वंदी पार्टियों पर राजनीतिक बयानबाजी के लिए भाजपा में अधिकृत संगठन के नेता नहीं, बल्कि एक राज्य के जिम्मेदार मुख्यमंत्री हैं और बाकी देश की तरह गुजरात में भी "बच्चों की दुनिया" बहुत खुशहाल नहीं है। गुजरात में भी, खासकर आदिवासी इलाकों में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का भगवान ही मालिक है और गैर कानूनी बालश्रम की समस्या भी काफी गहरी है। दरअसल, बच्चों का दुर्भाग्य यह है कि उनकी मासूमियत का इस्तेमाल अपने देश में खूब होता है। बाजार तो बच्चों का इस्तेमाल एक अरसे से ही अबाध ढंग से करता आ रहा है, जिसका प्रमाण यह है कि बच्चे  उन उत्पादों के विज्ञापनों में भी छाए रहते हैं, जो चीजें बच्चों के काम की नहीं होतीं। अब नरेंद्र मोदी ने भाजपा अध्यक्ष की बुलाई पार्टी मुख्यमंत्रियों की बैठक में नेहरू के बहाने बच्चों के सियासी इस्तेमाल का श्रीगणेश कर दिया है। शायद नरेंद्र मोदी यह भी भूल रहे हैं कि उनके मुख्यमंत्रित्व काल में ही गुजरात दंगों में बच्चे हिंसा के शिकार भी हुए थे और बड़ी तादाद में अनाथ भी हुए। बहुत स्वाभाविक है कि बच्चों को हथियार बनाकर नेहरू पर किए गए प्रहार का कांग्रेस की तरफ से तीखा जवाब दिया गया। शायद बिना मौके के छेड़े गए इस बच्चा-राग का मकसद भी यही रहा हो। फिर भी बच्चों का इस तरह सियासी इस्तेमाल करने से राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को बचना चाहिए, क्योंकि बच्चे देश का भविष्य ही नहीं, भविष्य की आंख भी हैं।
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भारत की बढती स्वीकार्यता

अरविन्द चतुर्वेद :
आजकल हमारे विदेश मंत्री एसएम कृष्णा प्रतिनिधि मंडल के साथ अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में हैं। अपनी समकक्ष अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन से हुई मुलाकात और उनके साथ हुई आधिकारिक बातचीत में हिलेरी ने भारत को च्एक उभरती हुई विश्व शक्ति’ कहते हुए इस बात को बहुत जरूरी बताया कि दक्षिण एशिया क्षेत्र की मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए अमेरिका और भारत को दो करीबी सहयोगियों की तरह काम करने की जरूरत है। कहा जा रहा है कि दोनों देशों के बीच यह अपनी तरह की च्पहली रणनीतिक बातचीत’ हो रही है। यही नहीं, अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता के लिए अपने देश के समर्थन का संकेत भी दिया है। कुल मिलाकर यह अच्छी बात है कि अमेरिका अपने लिए भारत को अब अनिवार्य रूप से महत्वपूर्ण मानने और स्वीकारने लगा है, लेकिन भारत के लिए यह कोई बहुत गदगद हो जानेवाली बात नहीं है। भारत अगर विकास करेगा, मजबूत होगा तो अपने बलबूते और अपनी वजह से और तभी उसकी वैश्विक स्वीकार्यता भी बढ़ेगी, वरना किसी का पिछलग्गू दिखते हुए तो न स्वीकार्यता बढ़ाई जा सकती है और न वैश्विक सहयोग पाया जा सकता है। एकध्रुवीय हो चुके विश्व में भी इतना सचेत होकर तो चलना ही पड़ेगा कि और भी च्दुनिया’ है दुनिया में अमेरिका के सिवा। कहने का मतलब यह कि सवा अरब की आबादी वाले दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत को अबतक काफी पहले ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य हो जाना चाहिए था। अगर भारत अबतक सुरक्षा परिषद का सदस्य नहीं हो पाया तो क्या यह कहने की जरूरत है कि इसके पीछे वीटो पावर धारी दादा देशों की अड़ंगेबाजी ही मुख्य वजह रही है। बहरहाल, अगर अमेरिका अब भारत के महत्व को गहराई से समझने लगा है तो बहुत अच्छी बात है- हिलेरी क्लिंटन के मुंह में घी-शक्कर! जहां तक दक्षिण एशियाई क्षेत्र की चुनौतियों का सवाल है, कुछ चुनौतियां अमेरिका और भारत की साझा भी हो सकती हैं, जैसे कि अफगानिस्तान का पुनर्निर्माण और उसे तालिबानी आतंकवाद से मुक्त कराया जाना। इसी तरह भारत के साथ मजबूती से खड़े रहकर अमेरिका एशिया में चीन के बढ़ते वर्चस्व और खुराफातों को नियंत्रित करने में भी एक हद तक मददगार हो सकता है। पड़ोस पोषित आतंकवाद, जिससे भारत एक लम्बे अरसे से आक्रांत है, जो कश्मीर-सीमा की ओर से लगभग स्थाई सरदर्द बना हुआ है और जो अब स्थानिक न रहकर लगभग विश्वव्यापी बन चुका है और अमेरिका को भी गहरा आघात दे चुका है- एक ऐसी चुनौती है, जिसका मुकाबला अमेरिका-भारत साझेदारी में ही नहीं, एक-दूसरे के कंधे से कंधा मिलाकर कर सकते हैं। पड़ोस पोषित इस आतंकवाद की तरफ भारतीय विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने बातचीत में हिलेरी क्लिंटन का ध्यान भी दिलाया है। इसलिए अगर अमेरिका मानता है कि भारत एक उभरती हुई वैश्विक ताकत है तो यह जरूरी नहीं होना चाहिए कि भारत-दौरे के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन च्संतुलन’ बनाने के लिए पाकिस्तान जाकर उसके हुक्मरानों के मन-मुआफिक बयान दें और गैर-जरूरी ढंग से पीठ थपथपाएं। अमेरिका और भारत में आपसी समझदारी, सहयोग और किन्हीं मामलों में साझेदारी भी अच्छी बात है, लेकिन कई चुनौतियां और समस्याएं दोनों देशों की अपनी-अपनी भी हैं, इसलिए अनावश्यक हस्तक्षेप से अमेरिका को बचना भी चाहिए। संबंधों की समझदारी यही है।
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बदल रहा बंगाल

अरविन्द चतुर्वेद :
पश्चिम बंगाल में 15वीं लोकसभा के चुनावों के पहले से ही बदलाव की जो बयार बह रही है, उसका रूख किसी भी प्रकार से मोड़ पाने या दूसरी ओर घुमा सकने की सत्तारूढ़ वाममोर्चा की कोई भी कोशिश कामयाब होती नहीं दिखाई दे रही है। पहले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव, फिर लोकसभा के आम चुनाव, इसके बाद खाली हुई विधानसभा सीटों के उपचुनाव और अब नगर निकायों के चुनाव तक यही देखने को मिला है कि सीपीएम की अगुवाई वाला लेफ्ट फ्रंट वाकई फ्रंट से बैकफुट पर है। यही हाल रहा तो अगले साल होनेवाले विधानसभा के आम चुनावों में शायद वह आखिरी दीवार भी ढह जाएगी, जिससे पीठ टिकाए सत्तारूढ़ वाममोर्चा किसी तरह खड़ा है। यह सही है कि वाममोर्चा त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और केरल सरीखे तीन राज्यों तक ही सत्ता की दौड़ में सिमटा रहा है, लेकिन इसके बावजूद उसे भारतीय राजनीति में अगर क्षेत्रीय दलों जैसा नहीं देखा गया तो इसका सबसे बड़ा कारण उसकी विचारधारा रही है, जो जनता के जनवादी अधिकारों और जनतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। लेकिन यह कहना ही पड़ता है कि अच्छे से अच्छे विचार और सिद्धांत अगर अमल में न लाए जाएं और उन्हें सिर्फ बहस-मुबाहिसे के औजार के तौर पर इस्तेमाल किया जाए- सिद्धांत और व्यवहार में उत्तरी-दक्षिणी ध्रुव जैसा फर्क हो तो नतीजा वही होता है, जो पश्चिम बंगाल में विभिन्न स्तरीय चुनावों में इधर देखने में आया है। आखिर पश्चिम बंगाल की वही जनता लेफ्ट फ्रंट को पटखनी पर पटखनी देती जा रही है, जिस जनता के भले की बड़ी-बड़ी बातें और लम्बे-चौड़े तर्क-वितर्क सीपीएम के नेता मंचों पर करते रहते हैं। राजधानी कोलकाता के दशकों से अविजित नगर निगम और साल्टलेक सिटी की नगर पालिका से सीपीएम का लाल पताका उतार कर जिस तरह से ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस का झंडा लहराया है, उसने वास्तव में लेफ्ट फ्रंट के सिपहसालारों की बोलती बंद कर दी है। नगर निकाय चुनावों के नतीजों पर मुख्यमंत्री बुद्धदेव भटूटाचार्य द्वारा कुछ भी बोलने से इनकार कर दिए जाने के दो ही अर्थ हो सकते हैं- या तो वे सचमुच बहुत हताश हो चुके हैं, या फिर साढ़े तीन दशक की सत्ता का वह दम्भ है,जो सहजता और विनम्रता पूर्वक जनादेश को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करके ममता बनर्जी को बधाई देने से उन्हें रोक देता है! बुद्धदेव या फिर बिमान बोस वैसे ही ममता बनर्जी को बधाई देते हुए हार स्वीकार कर सकते थे, जैसा कि कभी ममता के राजनीतिक गुरू रहे प्रणब मुखर्जी ने कांग्रेस की ओर से स्वीकार की। लेकिन नहीं, राजनीतिक शिष्टाचार और बड़प्पन की बात तो छोड़ दीजिए, अभी भी वाम खेमे के नेतागण अपने मुताबिक तर्क-तीर संधान करते नजर आ रहे हैं। जबकि इतने झटके खा चुकने के बाद सत्तारूढ़ वाममोर्चा और इसके नेताओं को जनता के मनोभाव के अनुरूप अपने और सरकार के तौर-तरीके बदलना-सुधारना इस समय पहली जरूरत है। अब तक तो यही देखा गया है कि वाममोर्चा की अगुवाई करनेवाली सीपीएम खुद मोर्चे के अपने सहयोगियों फारवर्ड ब्लाक, आरएसपी और सीपीआई के साथ दादागीरी करती आई है। सीपीएम और वाममोर्चा में " दुर्नीति का रोग " लगा हुआ है और पार्टी में " गलत व स्वार्थी तत्व " आ गए हैं, जिनकी सफाई की जरूरत है, यह विरोधी नहीं, स्वयं सीपीएम के जिम्मेदार लोग कह चुके हैं। लेकिन यक्ष प्रश्न तो यह है कि हार को भी सहजता से न लेने वाले वाममोर्चा के पास विधानसभा चुनाव तक खुद को सुधारने का वक्त ही कहां है?
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