गगन घटा घहरानी

अरविन्द चतुर्वेद
क्या मुश्किल है कि आसमान में बादल धरती वालों को ठेंगा दिखाकर चले जाएं, तब भी रोना और अगर घटाएं झूम के बरस जाएं, तब भी मुसीबत। हमने विकास का जो रास्ता चुन लिया है, उसने हमें इस कदर कुदरत विरोधी बना दिया है कि बरसात को ही लीजिए तो या तो हम उसके लायक नहीं हैं या फिर बरसात ही हमारे लायक नहीं रही है। गरमी की झुलसाती तपिश के बाद मानसून के बादल दो दिन झूमकर क्या बरसे कि चारों तरफ से मुसीबत और मुश्किलों की खबरें आ गइं। हमारी नदियां कूड़े-कचरे और गाद से इस कदर अटी-पटी हैं कि बारिश हुई नहीं कि बाढ़ आ जाती है, कटान के चलते गांव-खेत-डबरे जलमग्न हो जाते हैं, बस्तियों-घरों में पानी भर जाता है, कज्जे मकान गिर पड़ते हैं और कई बार कई जगह जान-माल से भी हाथ धोना पड़ता है। बरसात के पहले नदी तटों की भ्रष्टाचार मुक्त मरम्मत कर ली जाए, तटबंधों को दुरूस्त व पुख्ता कर लिया जाए और दिन-ब-दिन छिछली होती नदियों के पेटे में बरसों से जमी गाद निकाल ली जाए तो जल प्रवाही नदियां हमारी कोई दुश्मन नहीं हैं, जो बाढ़ बनकर हम पर यों टूट पड़ें। असल में नदियों के साथ जैसा बुरा सुलूक हम सालों-साल करते हैं, बरसात में मौका मिलने पर हमारी कारस्तानी का सूद समेत खामियाजा चार महीने में बाढ़ के रूप में नदियां हमें लौटा देती हैं। हम चीखते-चिल्लाते हैं, हाथ-पांव मारते हैं, फिर भी कोई सबक नहीं सीखते। दूसरे, नदियों से कम प्रदूषित हमारा प्रशासनिक तंत्र और सियासी पेचोखम नहीं है- राज्य सरकारें केंद्र पर तो केंद्र सरकार राज्यों पर नदियों के मामले में दांव खेलती रहती हैं और प्रशासनिक तंत्र तो खैर कागजों में ही सबकुछ चुस्त-दुरूस्त कर लिया करता है। आखिर नदियां और नहरें भी तो कमाई के अच्छे स्रोत हैं! मसलन, उत्तर प्रदेश के ही सुलतानपुर में सिंचाई विभाग के एक इंजीनियर साहब ने कागज में ही कई किलोमीटर लंबी नहर का काम तमाम करके लाखों रूपए का वारा-न्यारा कर लिया है। अब इस मामले की जांच भी हो रही है और साथ ही कहते हैं कि इसे दबाने की कोशिश भी चल रही है। बहरहाल, हर साल की तरह शुरूआती बरसात ने ही उत्तर प्रदेश में सरकारी कामकाज की पोल-पटूटी खोलकर रख दी है। प्रदेश के जनपदों और दूर-दराज के इलाकों की तो छोड़ ही दीजिए, राजधानी लखनऊ में एक-डेढ़ महीने पहले बनी नई सड़कें तक दो दिन की बरसात में कई जगह धंस गइं- कई जगह उनकी ठठरी निकल आई। समझा जा सकता है कि कितना गुणवत्तायुक्त काम हुआ है और कैसी पैसे की बंदरबांट हुई है। शहर के नाले इसलिए उफना पड़े कि उनकी सफाई ही नहीं हुई। सड़कों पर पानी भर गया, क्योंकि जल निकासी का बेहतर इंतजाम ही नहीं है। शहर में जगह-जगह गडूढे खुदे हुए हैं, मोरम और मलबा पड़ा हुआ है। सारा काम जून में पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन अभी तक लस्टम-पस्टम चल रहा है। खुदे हुए गडूढों में बरसात का पानी भर जाए और किसी की जान भी चली जाए तो बेशर्म प्रशासन को क्या फर्क पड़ता है? फिल्मों में और कविता में बरखा-बहार भले ही बहुत रूमानियत भरी हो, मगर हमारी व्यवस्था का एक बरसाती बीमार चेहरा यह भी है कि बीते बरस की तरह इस बार के मौसम में भी उत्तर प्रदेश में गोदामों की किल्लत के चलते कई जगहों पर करोड़ों रूपए के हजारों कुंतल गेहूं खुले आसमान तले भीगकर सड़ रहे हैं, जो सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए गरीबों का पेट भरते। सार्वजनिक खाद्यान्न की इस बर्बादी का दोषी कौन है- हमारी सड़ी व्यवस्था या बेचारी यह बरसात?
read more...

आत्मीय एक छवि तुम्हें नित्य भटकाएगी

कवि मुक्तिबोध की पांच चरणों में लिखी कविता का पहला और अंतिम हिस्सा प्रस्तुत है। जिंदगी क्या आत्मीयता की तलाश में एक पुलक भरा भटकाव है? क्या यह भटकाव ही हमें अनुभव सम्पन्न नहीं बनाता? इस भटकाव में ही जिंदगी को अर्थवत्ता मिलती है...

पता नहीं.../मुक्तिबोध

पता नहीं, कब कौन कहां किस ओर मिले
किस सांझ मिले, किस सुबह मिले!!
यह राह जिंदगी की
जिससे जिस जगह मिले
हैं ठीक वहीं, बस वहीं अहाते मेंहदी के
जिनके भीतर
है कोई घर
बाहर प्रसन्न पीली कनेर
बरगद ऊंचा, जमीन गीली
मन जिन्हें देख कल्पना करेगा जाने क्या!!
तब बैठ एक
गंभीर वृक्ष के तले
टटोलो मन, जिससे जिस छोर मिले,
कर अपने-अपने तप्त अनुभवों की तुलना
घुलना मिलना!!
.............
अपनी धकधक
में दर्दीले फैले-फैलेपन की मिठास,
या नि:स्वात्मक विकास का युग
जिसकी मानव-गति को सुनकर
तुम दौड़ोगे प्रत्येक व्यक्ति के
चरण-तले जनपथ बनकर!!
वे आस्थाएं तुमको दरिद्र करवाएंगी
कि दैन्य ही भोगोगे
पर, तुम अनन्य होगे,
प्रसन्न होगे!!
आत्मीय एक छवि तुम्हें नित्य भटकाएगी
जिस जगह, जहां जो छोर मिले
ले जाएगी...
...पता नहीं, कब कौन कहां किस ओर मिले।
read more...

नाम में क्या रखा है!

सोनागाछी में सोने का गाछ यानी पेड़ न कभी था, न आज है। फिर भी नाम सोनागाछी है। कुछ बुजुर्गों का कहना है कि पुराने जमाने में यह जगह सोने के गहने-जेवर बनाने-बेचने की पूर्वी भारत में एक बड़ी मंडी थी और तब के हिसाब से यहां बहुत निपुण स्वर्णकार बसते थे. बृहत्तर सोनागाछी इलाके में आज भी सोना-चांदी की कुछ दूकानें हैं, पर सोने की मंडी के रूप में सोनागाछी कोलकाता महानगर में भी मशहूर नहीं है।
पुराने जमाने की सोने की मंडी बताने वाले बुजुर्गों का खयाल है कि दूर-देहात से आनेवाली भोली और सोने की लोभी सुंदर औरतों को ऐय्याश किस्म के स्वर्णकार और दूसरे लोग बहका लिया करते थे। धीरे-धीरे यह आम बात हुई और सोनागाछी ऐय्याशी की छोटी-मोटी मंडी बन गई। लेकिन कंचन और कामिनी के संयोग से पैदा हुई सोनागाछी के लिए इतिहास की कोई गली नहीं खुलती। इसे लोक-लोक की बात ही कह सकते हैं।
फिर सोनागाछी नाम क्यों पड़ा इस बदनाम बस्ती का? एक थीं देवी सोना गाजी। उनकी सोनागाछी में मजार भी है। वे इतनी मशहूर हुईं कि इस इलाके का नाम ही उनके नाम पर हो गया। यानी सोना गाजी से सोनागाछी। बहरहाल, इतिहास में झांकते हैं तो पाते हैं कि मनोरंजन के आधुनिक साधनों से दूर 18वीं-19वीं सदी के अंग्रेजी भारत में कलकत्ता का मुख्य मनोरंजन केंद्र थी सोनागाछी। पानी के जहाज से आनेवाले सात समुंदर पार के लोगों का भी मन बहलाती थी सोनागाछी। हुगली की लहरों पर चांदनी रात में हिचकोले खाती नौकाओं पर अंग्रेज साहबों का साथ देती थी यह सोनागाछी। बड़े-बड़े जमींदारों, सेठ-साहूकारों, उनके बिगडै़ल लाडलों, रईसों के पहलू में भी थी सोनागाछी। पर तब सोनागाछी आम ग्राहक की नहीं थी, जैसी कि आज नजर आती है।
असल में सोनागाछी के विकास में बंगाल के अकाल, ऐतिहासिक बंगभंग और फिर पूर्वी पाकिस्तान के रूप में एक हिस्से के चले जाने का बड़ा हाथ है. बड़ा हाथ है पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान के आज़ाद मुल्क बंगलादेश बनने का भी.
नजीर के तौर पर १९८०-८१ में सोनागाछी आई संध्या दे की दास्ताँ ही देखें. बंगलादेश के जैसोर जिले में केशवपुर थाने के तहत एक गाँव है- मध्यकुल ग्राम. संध्या इसी गाँव की बेटी है. जब वह १३-१४ साल की हुई तो उसके पिता सुधीर दे को डर लगा कि बेटी की इज्जत खतरे में है. कभी भी कोई उसे छीनकर ले जा सकता है. संध्या के पिता ने उसे उत्तर चौबीस परगना के हाबरा में नाना-नानी के पास पहुंचा दिया.
एक दिन शेफाली दी नाम की महिला ने गाँव की सीधी-सादी संध्या को कलकत्ता घुमाने का बहाना बनाया और पहुंचा दिया उसे सोनागाछी. संक्षेप में संध्या के सोनागाछी पहुँचने की यही दास्ताँ है. ऐसी सैकड़ों-हज़ारों संध्याओं से अटी पड़ी है सोनागाछी. और, अभी तो सोनागाछी की हालत नो वैकेंसी या हाउस फुल जैसी है.
इतिहास की पगडण्डी पर और पीछे चलते हैं तो १९११ की मर्दुमशुमारी की रिपोर्ट बताती है कि तब कलकत्ता में १४ हज़ार २७१ महिलायें जिस्म के पेशे में थीं. इस रिपोर्ट के मुताबिक़ तब कलकत्ता की कुल स्त्रियों में से जिनकी उम्र २०-४० साल की है, हर १२ वीं स्त्री जिस्म बेचती है. १२ से २० साल तक की उम्र की लड़कियों में हर सौ में छः लड़कियाँ इस जलालत भरे पेशे में हैं. यह रिपोर्ट कहती है कि १०९६ वेश्या लड़कियों की उम्र दस साल से भी कम है और यों ९० फीसदी वेश्याएं हिन्दू हैं.
सोनागाछी का मतलब है- इस आग के दरिया में डूब ही जाना है...!
read more...

गुनाह और पनाह


अरविन्द चतुर्वेद
जिस्म, जाम और जान की बाजी- तीन खेल से सोनागाछी...। जी हां, सोनागाछी के ये तीन खास खेल हैं। मसलन 1992 में सोनागाछी जिस्म बाजार के एक अड्ïडे से कोलकाता पुलिस के ही एक जवान की लाश मिली थी। कभी-कभार जान लेने-देने के ऐसे हादसे हो जाते हैं तो चंद दिनों के लिए सोनागाछी में तूफान-सा आ जाता है- पुलिस की छापेमारियां, लड़कियों-दलालों की धर-पकड़, काली गाड़ी में सबको लादकर थाने ले जाना। लेकिन वहां भी कबतक रखेंगे? एक-आध दिन में ले-देकर जमानत हो जाती है। फिर सबकुछ पहले जैसा।
बड़ी पुरानी कहावत है कि कंचन-कामिनी और मदिरा की तिकड़ी भी अपने आप बन जाती है। जिस्म की दूकान पर मौज-मस्ती के लिए बेफिक्र बनाने में जाम शायद मददगार साबित होता होगा। यह भी हो सकता है कि दो घूंट गले से उतरने के बाद गलत काम का अपराध बोध काफूर हो जाता हो। या फिर बेपर्दगी का सामना करने के लिए शराब पीकर पर्देदार लोग अपनी झिझक व शर्म भगाते हों और हिम्मत जुटाते हों।
मसलन, दलाल के साथ गली से गुजरते हुए एक बेफिक्र अधेड़ और उसके साथ लडख़ड़ाते हुए चल रहे 25-26 साल के युवक के बीच की बातचीत गौर करने लायक है-
- अमां यार, घबड़ाने की क्या बात थी? साला, मूड खराब हो गया। बेकार तुमको दारू पिलाया।
- नेई, ये बात नेई। हमको वो जंची ही नेई। मेरा सर चक्कर खा रहा था, साला।
- तेरे चक्कर में हमारा भी मजा खराब हो गिया। हम अब्बी और दारू पिएगा।
- ठीक है, हम आपको दारू पिलाएगा। बाकी आपको कसम, अब्बा को बिल्कुल खबर न चले।
- हम तुम्हारा दारू नेई पिएगा। तुमको हमारा यकीन नेई? क्या समझता, हमारे पास पैसा नेई?
वह अधेड़ आदमी नशे के सुरूर में नौजवान पर उखड़ गया। नौजवान नशे में लडख़ड़ाती आवाज में अधेड़ साथी को मनाने की कोशिश में मिमियाने लगा। गरमी कुछ खास नहीं थी, फिर नौजवान का चेहरा पसीने से तर-ब-तर क्यों था- घबराहट और डर की वजह से, या तेज नशे में खाए पान के किमाम व जर्दे की वजह से?
सोनागाछी की गलियों में कई जगह तो जाहिरा तौर पर शराब मिलती है और कई जगह किस्म-किस्म की ऐसी रंग-बिरंगी शीशियों-बोतलों में कि सरसरी तौर पर लगे कहीं यह शरबत या टॉनिक तो नहीं है। प्याजी पकौड़ी की दूकानों पर बाजार की नजाकत से वाकिफ लोगों को गिलास में पानी की जगह पानी के ही रंग वाली देसी दारू भी आसानी से मिल जाती है। कई दूकानों पर चाय-पकौड़ी और दूसरी चीजें बेचना तो महज एक आड़ है। दरअसल इन दूकानों पर बिकती है देसी शराब, जिसे बांग्ला या बांग्लू कहते हैं।
शौकीन ग्राहकों के मांगने पर बाड़ीवाली बऊ दी खुद भी देसी-विदेशी शराब मंगा देती है। लेकिन आम तौर पर धंधे के वक्त लड़कियों के दारू पीने पर मनाही है। शायद इसलिए कि लड़की कहीं धंधे के दौरान ही नशे के सुरूर में बहक कर धंधा चौपट न कर दे। हां, सारी रात के लिए आए और बुक कराए ग्राहक की फरमाइश पर लड़की का दारू-सिगरेट पीना जरूर धंधे का हिस्सा है।
जिस्म बाजार के कई अड्डे किसिम-किसिम के अपराधियों, गुंडे, बदमाशों के पनाहगार भी हैं। क्योंकि वे ग्राहक हैं और ग्राहक के लिए दरवाजा हर वक्त खुले रखना इस बाजार का धर्म है। एक दलाल ने एक दिलचस्प बात बताई कि यहां एक अड्डे पर तो केवल शहर के गुंडे-बदमाश ही आते हैं। यह अड्डा आम ग्राहक के लिए नहीं है। शायद अड्डे की मालकिन ने सब तरह से हिसाब बैठाकर इसे स्पेशल बना रखा है।
..... जारी  
read more...

बाड़ी वाली बऊ दी उर्फ मौसी

अरविन्द चतुर्वेद
सोनागाछी जिस्म बाजार के संचालन का सारा दारोमदार बाड़ी वाली बऊ दी पर होता है। कुछ तो बऊ दी किस्म की महिलाओं की अपनी बाड़ी है और बहुतेरी बऊ दी मकानों की पुरानी किराएदार हैं। जिस्म बाजार में समय-समय पर पुलिस की होनेवाली छापेमारियों से निपटना, पकड़ी गई लड़कियों को छुड़ाकर वापस लाना, ग्राहकों और गुंडे-बदमाशों की ज्यादतियों से अपनी लड़कियों को बचाना- यह सारा सिरदर्द बऊ दी का है। बऊ दी इस सिरदर्द के बदले में लड़कियों की कमाई में हिस्सा लेती हैं।
यह बताते समय दलाल मंगला प्रसाद के होठों पर बऊ दी के लिए एक व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट चिपकी रहती है। वह कहता है- क्या है कि साहब, ये जो बऊ दी लोग हैं न, इनको भी तो सबकुछ का परेटिकल एक्सपीरियन(प्रैक्टिकल एक्सपीरियंश) होता है, न। किसी बराबर आनेवाले ग्राहक को तजबीज कर उसके साथ एक तरह से घर बसा लेती हैं।
- क्या बऊ दी लोग शादीशुदा होती हैं?
इस सवाल पर ठहाके लगाकर हंस पड़ता है मंगला। हंसते-हंसते कहता है- धत्त तेरे की। अरे, उसे क्या कहेंगे-बऊ दी रखैला रखती हैं, रखैला। कोई टैक्सी वाला होता है, कोई चाय-पान की गुमटी वाला और कोई छोटा-मोटा दुकानदार। सब साला मउगा होता है, साहब। बाकी क्या है कि हफ्ता में एक-दो बार बऊ दी का आदमी जरूर आता है।
सोनागाछी की बऊ दी महिलाओं के बच्चे भी हैं- लड़के-लड़कियां। वे बच्चों को स्कूल भेजती हैं। बाड़ी में मास्टर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने आते हैं। जाहिर है कि बऊ दी के मन में यह इच्छा जरूर है कि उनके बच्चे किसी तरह पढ़-लिखकर सोनागाछी जिस्म बाजार की चौहद्दी पार करके दूसरी बेहतर दुनिया में शामिल हो जाएं।
इस जिस्म बाजार की लड़कियों की हैसियत भी तीन तरह की है। पांच सौ से हजार तक ऐसी लड़कियां हैं, जिन्हें दलाल मंगला प्रसाद हाई क्लास कहता है। इनकी फीस ढाई सौ से तो कतई कम नहीं है और ऊपर हजार-डेढ़ हजार तक जा सकता है. गिफ्ट वगैरह अलग से. हाई क्लास लड़कियां शहर के होटलों में भी जाती हैं, खाली फ़्लैट वाले तनहा गुणग्राहक के घर भी. कुछ ऐसी भी हैं जो किसी की निजी हैं. लेकिन अगर सचमुच वे वफादारी के साथ निजी बनी रहें, तब फिर क्या जिस्म बाज़ार का रिवाज नहीं टूटेगा? बेवफाई और फरेब पर ही तो टिका है यह जिस्म बाज़ार. मंगला बताता है - जब लड़की का परमानेंट आदमी किसी दिन नहीं आता तो महँगी फीस वाला टेम्परेरी ग्राहक भी चल जाता है.
सोनागाछी की हाई क्लास लड़कियों के पास एक-एक साफ़-सुथरे अच्छे कमरे हैं और टीवी-वीडियो जैसी मनोरंजन की सुविधाएं भी. खाना बनाने, खिलाने के लिए नौकरानी भी है. बाज़ार से रोजमर्रा की खरीदारी के लिए नौकर भी. ये लड़कियां उत्तर प्रदेश के आगरा और आसपास के इलाके की हैं. कह सकते हैं कि ये जानबूझ कर पेशेवर बनी हैं. मंगला बताता है- ये लड़कियां मां-बाप, भाई-बहनों के लिए अपने देस मनिआर्दर और बैंक ड्राफ्ट के जरिये पैसे भेजती हैं. बीच-बीच में इनसे मिलने घरवाले भी आया करते हैं. सोनागाछी की हाई क्लास लड़कियां कम-से-कम हाई स्कूल तक जरूर पढ़ी-लिखी हैं. इन्होने अपनी कमाई के पैसे कुछ दूसरे कारोबार में भी लगा रखा है. मसलन, कुछ हाई क्लास लड़कियों की महानगर में टैक्सियाँ भी चलती हैं.
..... जारी  
read more...

साला, इस लाइन में भी बड़ा कंपटीशन हो गया है

अरविन्द चतुर्वेद
वाकई एक तिलस्म है सोनागाछी. यहाँ की बदनाम बस्तियों में जिस्म के खरीदार ग्राहक के लिए भी बहुत आसान नहीं है इस तिलस्म का खुल जा सिमसिम. इस तिलस्म को खोलकर ठिकाने तक ले जाने का काम करते हैं समस्तीपुर के मंगला ( पूरा नाम मंगला प्रसाद ), बीरभूम के बोनू और राधा ( पूरा नाम राधाचरण ) जैसे दलाल .
सोनागाछी के मायावी जिस्म बाज़ार के विस्तार का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह इमामबख्श लेन, गौरी शंकर लेन, दुर्गाचरण मित्र लेन, मस्जिदबादी स्ट्रीट और दालपट्टी तक कमोबेश अपना दायरा बना चुका है। यह बाजार सिमटने के बजाय दिन-ब-दिन फैलता ही जा रहा है। फिलहाल, सोनागाछी जिस्म बाजार की चौहद्दी पश्चिम में चितपुर ट्राम लाइन, पूरब में सेंट्रल एवेन्यू, दक्षिण में चक्रवर्ती लेन और उत्तर में मस्जिदबाड़ी स्ट्रीट तक फैली हुई है।
ऐसा नहीं है कि इस समूचे दायरे में सिर्फ जिस्म की दूकानें ही सजी हैं। शरीफ नागरिकों का घर-संसार भी है, पुश्तैनी बाशिंदों के मकान भी हैं, दूसरे आम कारोबारी लोग भी हैं और नौकरी-पेशा लोग भी। लेकिन इनकी हालत बत्तीस दांतों के बीच जीभ जैसी है। जिस्म बाजार के बीच बसे परिवारी लोगों के घरों के दरवाजे अमूमन शाम साढ़े सात-आठ बजे तक बंद हो जाते हैं। अगर घर का कोई आदमी बाहर रह गया है तो वह भी कोशिश यही करता है कि किसी तरह रात नौ बजे तक जरूर घर पहुंच जाए।
सोनागाछी के विशाल देह बाजार के बारे में दलाल मंगला प्रसाद बड़े फख्र के साथ कहता है- दुनियाभर में मशहूर है साहब, कलकत्ते की यह सोनागाछी। करीब पच्चीस-तीस हजार औरतें तो होंगी ही।
- आप लोग कितने होंगे?
मंगला ने जवाब दिया- साला, इस लाइन में भी बड़ा कंपटीशन हो गया है, साहब। दस हजार दलाल तो होंगे ही।
- कितनी कमाई हो जाती है?
- ऊपर वाले की मेहरबानी से ठीके हो जाती है। सत्तर-पचहत्तर तो कहीं नहीं गया है। किसी किसी दिन दो-चार दिलदार ग्राहक मिल गए तो दो-ढाई सौ भी हो जाता है।
सोनागाछी का दलाल मंगला अपना परिवार यहां कोलकाता में नहीं रखता। परिवार समस्तीपुर में गांव में रहता है। यहां से पैसे भेजता है। तीन-चार महीने पर दो-चार दिन के लिए गांव हो आता है। गांव-घर वाले यही जानते हैं कि मंगला कोलकाता में कोई नौकरी करता है। पैंतालिस साल की उम्र वाला मंगला बीस सालों से दलाली कर रहा है।
बताता है- शुरू-शुरू में यह काम बहुत खराब लगता था। एक-दो साल तक रोज यही मन में आता था कि कल से यह काम छोड़ देंगे। लेकिन एक बार जो यह धंधा पकड़ाया तो कहां छूटा, साहब।
जिस चाय की दूकान पर मंगला से बात हो रही थी, वह दूकान भी मंगला की जान-पहचान की थी। फिर भी मंगला हड़बड़ी में था। वह मुझसे जल्दी से जल्दी पिंड छुड़ा लेना चाहता था। जब उससे मैंने सोनागाछी का जिस्म बाजार पूरा दिखा देने और किसी अड्डे पर चलकर किसी लड़की से बातचीत करा देने की बात की तो मेरी बात पूरी होने के पहले ही चालाक व अनुभवी दलाल मंगला ने कहा- पूरा सोनागाछी देखने-दिखाने में दो-तीन घंटे से कम टाइम नहीं लगेगा, साहब। मेरा तो आज का धंधा ही चौपट हो जाएगा।
आखिर में मुफ्त के चाय-नाश्ते-सिगरेट के बाद बेहयायी से मुस्कराते हुए मंगला धंधा चौपट करने के एवज में कुछ लेकर एक अड्डे पर मुझे ले गया। बीस-पच्चीस साल की दो लड़कियां अनमनी-सी कमरे के बाहर संकरे बरांडेनुमा गलियारे में खड़ी थीं। उन्होंने एक उचटती-सी नजर हम पर डाली और फिर नीचे से आने वाली सीढिय़ों की तरफ देखने लगीं।
मंगला मुझे लेकर कमरे में घुस गया। उसके साथ होने के कारण मैं निश्चिंत था। कमरे में सजधज कर बैठी, करीब तीस साल की औसत शक्ल-सूरत मगर अच्छे कद-काठी वाली युवती के चेहरे पर हमें देखकर पहले तो चमक उभरी। पर मैथिली में जैसे ही मंगला ने उससे कहा- देस से आए हैं, अपने भरोसे के आदमी हैं। थोड़ा यह सब देखना-जानना चाहते हैं- महिला के चेहरे पर झल्लाहट का भाव उभर आया। वह शिष्ट महिला थी और शायद मंगला के लिहाज के चलते वह उखड़ी तो नहीं, फिर भी नाराजगी की झलक देते सपाट लहजे में कहा- इसमें देखने-जानने का क्या है? हमलोग क्या कोई तमाशा हैं? अपने बारे में कुछ भी बोलने-बताने से उसने साफ मना कर दिया और अपने हावभाव से जता दिया कि मैं वहां से चलता बनूं।
इतनी देर में ही उस अच्छे-खासे आयताकार कमरे की एक झलक मिल चुकी थी। कमरे के एक सिरे पर लकड़ी की बंद आलमारी थी जिसमें शायद उसके कपड़े-लत्ते रहे होंगे। बेंत की इकलौती कुर्सी पर कुशन- ग्राहक के बैठने के लिए, तिपाईनुमा टेबुल, लकड़ी के तख्त पर हल्का गद्ïदेदार बिस्तर और साफ धुली चादर-उसी पर वह बैठी थी। कमरे के दूसरे छोर पर एक स्टैंड था, जिस पर प्लास्टिक का पानी भरा एक जग कांच की दो गिलासें और एक-दो प्लेटें पड़ी थीं। लंबाई वाली भीतरी दीवार में एक दरवाजा भी था, जिसपर परदा टंगा था। शायद वह बाथरूम और छोटी-मोटी रसोई जैसी जगह में खुलता हो। दीवार पर दो कैलेंडर अलग-अलग टंगे थे- एक, लेटे हुए शिव की छाती पर खड़ी, गले में मुंड-माला पहने, जीभ निकाले हुई काली का और दूसरा, सिर्फ चड्ढी पहने, खड़े, मांस-पेशियां दिखाते, चौड़ी छाती वाले बॉडीबिल्डर पहलवान का, जो निश्चय ही आनेवाले ग्राहक को चुनौती देता हुआ लगता होगा।
बहरहाल, कमरे से निकल कर जब मैं सीढिय़ां उतर रहा था, पीछे से बरामदे में खड़ी दोनों लड़कियों की जोरदार खिलखिलाहट सुनाई पड़ी।
.... जारी
read more...

सोनागाछी की सैर

अरविन्द चतुर्वेद
एक शाम हम तीन दोस्त बड़ी हिम्मत जुटाकर बदनाम बस्ती सोनागाछी की निषिद्ध गली के मुहाने पर खड़े हुए। इरादा था कि गली के इस पार से सेंट्रल एवेन्यू तक निकल कर पूरी गली का  जायजा लिया जाए। इससे पहले हममें से कोई भी इस गली से होकर गुजरा नहीं था।
जबरन चेहरे पर सहजता लाने की कोशिश करते हुए हम गली में ऐसे घुसे, जैसे किसी भी गली या सड़क से आम तौर पर राहगीर गुजरते हैं। सोनागाछी की गली में मेला-सा लगा था। सड़क के दोनों किनारे पर बदन दिखाऊ पोशाकों में, चेहरे पर जरूरत से ज्यादा क्रीम-पावडर पोते अलग-अलग उम्र की किशोरियां, युवतियां और तमाम कोशिश के बावजूद बढ़ती उम्र की निशानियां न छिपा पाती अधेड़ औरतें।
यह जिस्म का बाजार है। ये औरतें-लड़कियां आपस में बातचीत भी कर रही हैं और आने-जाने वालों को तरह-तरह के इशारे भी। सारा माहौल रोशनी में जगमग है। छनती प्याज की पकौडिय़ों और आलूचाप की वजह से समूची गली में जलते तेल और बेसन की गंध समाई हुई है। पकौडिय़ों और पान-सिगरेट की इन छोटी-मोटी दुकानों पर दो-तीन दिनों की बढ़ी हुई दाढ़ी वाले तमाम लोग अड्डे जमाए हुए हैं।
इनमें कुछ लोग इधर-उधर चहलकदमी भी कर रहे हैं। सबकी निगाहें गली में आने-जाने वालों पर टिकी हैं। अजीब चमक है इन निगाहों में। आपसे अगर इनकी नजर मिली तो लगेगा जैसे निगाहों के जरिए आपके भीतर कुछ टटोला जा रहा है।
निगाहें हमारी भी मिलीं और उधर से इशारे भी हुए। पर हम बराबर सहज बने रहने की कोशिश के साथ यूं चलते रहे, जैसे इस दुनिया से हमारा कोई वास्ता नहीं है।
एक गुमटी के सामने सिगरेट सुलगाने के लिए हम खड़े ही हुए थे कि आजू-बाजू में तीन लोग आकर खड़े हो गए। हमारे कुछ बोले बिना ही किसी होटल के बेयरे की तरह उनका मुंहजबानी मेनू पेश हो गया-
- चलेगा, साब?
- बिल्कुल नया, ताजा माल है।
- एक बार देख तो लीजिए, तबियत खुश हो जाएगी।
फिर इसके बाद देश के जितने प्रदेशों के नाम उन्हें मालूम थे, उन सबका उन्होंने जाप कर डाला- बंगाली है, बिहारी है, यूपी है, पंजाबी है, मद्रासी है। नेपाली भी है। जो आपको पसंद हो, साहब।
इतना सुनते ही मेरे दोनों साथियों के चेहरे पर घबराहट उभर आई। अब वे जल्दी से जल्दी इस गली से निकल जाना चाहते थे। मैंने बात जारी रखने के खयाल से पूछा- कितने पैसे लगेंगे?
जवाब मिला- पचास रुपए से लेकर ढाई सौ तक। जैसी चीज, वैसा दाम। इससे ऊपर की भी हैं।
अब उनसे पीछा छुड़ाने के लिए काफी भरोसा दिलाते हुए मुझे कहना पड़ा- ठीक है, मैं अपने साथियों को सेंट्रल एवेन्यू तक छोड़कर अभी आता हूं। इन लोगों को नहीं जाना है।
(जारी)

read more...