प्यार चाहिए

कवि हरिवंश राय बच्चन ने कभी लिखा था, प्रेमियों के लिए हाय कितनी क्रूर दुनिया ! पीछे मुड़कर देखिये तो इस कविता-पंक्ति की सच्चाई का एहसास जरूर होगा. हरियाणा से लेकर उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में प्रेमी युगल प्रेम-दुर्घटना के क्रूर शिकार हुए. कहीं पंचायतों ने सजा सुनाई, हुक्का-पानी बंद किया तो कहीं परिजनों ने ही प्रेम की इहलीला समाप्त कर दी. कई जगह मुहब्बतें फतवों का भी शिकार हुईं.
याद होगा, दो साल पहले मेरठ के एक सार्वजानिक पार्क में घुसकर किस तरह पुलिस ने खदेड़-खदेड़ कर युवक-युवतियों की पिटाई की थी. यानि प्रेम पर नैतिक पुलिस ही नहीं, खाकी पुलिस का भी पहरा है. यह सब महाप्रेमी राधा-कृष्ण की भूमि पर होता है, प्रेम दीवानी मीराबाई के देश में होता है. यानि संस्कृत- काल से लेकर आज के हिंदी-काल तक के सैकड़ों कवियों की हजारों कविताएं भी एक प्रेममय समाज नहीं बना पाईं. तो क्या हमारा समाज प्रेम विरोधी है ? पाखंडी है कि खुल्लमखुल्ला प्यार करेंगे मगर फिल्म में - जीवन में नहीं ! जीवन में जो कुछ करेंगे
छिप-छिपाकर, लुक-लुकाकर. यानि व्यभिचार चलेगा, प्यार नहीं. प्यार - मोहब्बत सिनेमा के परदे पर, टीवी के सीरियलों में, किस्सा-कहानी-उपन्यास में, गीत-ग़ज़ल में ही अच्छा लगता है - वह जीवन में, समाज में, युवक-युवती के बीच नहीं होना चाहिए. यहाँ होगा तो वह बेहयाई है, चरित्रहीनता है. हालाँकि सड़क पर, बाज़ार में, गली-मोहल्ले में, मेला-उत्सव में लड़कियों पर फब्तियां कसी जाती हैं, छेड़खानी होती है, छोटी से लेकर बड़ी-बड़ी दुर्घटनाएं हो जाती हैं. क्या इसलिए नहीं कि हमने अपने समाज में युवक-युवती के बीच चुहलबाजी, हंसी-मजाक, प्रेम-मुहब्बत के लिए कोई जगह ही तय नहीं की है ?
सोचिये तो दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य हमारे लिए शायद यही है कि भाषा में तो प्रेमी-प्रेमिका हैं, लेकिन जीवन-समाज में नहीं. जीवन-समाज में सिर्फ पति-पत्नी हैं. यानि पहले विवाह फिर प्रेम. यानि पहले देह बाद में  मन. पहले वासना, बाद में कामना. जबकि होना तो यह चाहिए था सामंती पितृ सत्तात्मक समाज से निकल कर एक स्वतंत्र, लोकतान्त्रिक, शिक्षित मानवीय परिवेश में हम औरत-मर्द गैर-बराबरी को दूर कर एक समतामूलक प्रेमपूर्ण समाज की रचना करते, जिसकी बुनियाद पारस्परिकता, साझेदारी, भरोसा, आत्मसम्मान और आत्मस्वीकृति पर टिकी होती, न कि भय-संकोच, शक-शुबहा और परस्पर की खुफियागिरी पर.
कहते हैं कि संस्कृत-युग में वसंतोत्सव मदनोत्सव के रूप में मनाया जाता था. यानि जीवन एक सहज उल्लास से भरा था - उसमे रंग-गुलाल बहुत था, सतरंगी इन्द्रधनुषी आभा थी उसकी. धीरे-धीरे वह इतना फीका, इतना रंगहीन और इतना क्षीण हुआ कि लाख नाक-भौं सिकोड़ने और संस्कृति पर हमले की दुहाई देने के बावजूद वेलेंटाइन डे एक धमाके की तरह आधुनिक, शहरी युवा भारत के मानस में प्रेम दिवस के रूप में अवतरित हो गया.
इक्कीसवीं सदी की वैश्विक परिघटनावों के बीच चाहे-अनचाहे वेलेंटाइन डे देर-सवेर एक नया भारतीय त्यौहार बनकर ही रहेगा. इसलिए इसे किसी वज्रपात की तरह देखने के बजाय सोचना यह चाहिए कि आखिर वह कौन सी और कैसी रिक्तता है, जिसे भरने के लिए आधुनिक युवा भारतीय मानस में वेलेंटाइन डे उतर आया. स्वाभाविक तो यह होगा कि इसे हम सहजता से स्वीकार करें और कर सकें तो इस प्रेम पर्व का कोई देसी भारतीय संस्करण तैयार करें.
इसकी गुंजाइश भी भारतीय समाज में कम नहीं है. आखिर यह वही देश है, जहाँ कभी स्वयंबर प्रथा थी. घोर तपस्या करके पार्वती ने शिव का वरण किया था - उन्हें अपने लिए चुना और पाया था. सीता स्वयंवर यहीं हुआ था और धनुष यग्य के पूर्व जनक वाटिका में राम-सीता के मन में प्रेम का जो अंकुर प्रस्फुटित हुआ था, उसे आश्वस्ति भी   मिली थी तो इससे कि जा पर जाके सत्य सनेहू- सो तेहिं मिलहिं न कछु संदेहू. आज भी हमारे देश की कई जनजातियों में प्रेम की सामाजिक स्वीकारोक्ति है और युवक-युवतियों को परस्पर अपना जीवनसाथी चुनने की आजादी है. मणिपुर के मैतेई समाज में विवाह का श्रेष्ठ स्वरूप प्रेम विवाह ही है, जिसे वहां की भाषा में लुहोंग्बा कहते हैं. वेलेंटाइन डे हमें यही सन्देश देता है कि लाख आंधियां चलें प्रेम का दीपक जलता रहेगा -
न हारा है इश्क और न दुनिया थकी है,
दिया जल रहा है, हवा चल रही है !     

                                                                                       -  अरविन्द चतुर्वेद   
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3 comments: on "प्यार चाहिए"

गुस्ताख़ said...

प्यार पारिभाषित नहीं कर सकते...बहुत उम्दा लिखा है।

girish chandra said...

bahut sundar likha hai apne

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