सजना है मगर जीवन के लिए

जैसा देश-वैसा भेष...! इस मुहावरे को स्थानांतरित कीजिये और जाइये बाज़ार से एक अच्छा-सा व्यक्तित्व खरीद लाइए. यह अपील न अटपटी लगनी चाहिए, न इसपर चौंकने की जरूरत है. यही हो रहा है. रमैया की दुल्हिन बाज़ार नहीं लूट रही है, बाज़ार उसको लूट रहा है. बल्कि वोह तो बाज़ार पर लट्टू है. १९९४ में सुष्मिता सेन और ऐश्वर्या राय ने सौन्दर्य की देवी का ताज क्या पहना कि एक दशक के भीतर देश के छोटे-बड़े तमाम शहरों में सौन्दर्य प्रतियोगिताओं की होड़-सी लग गयी और देखते ही देखते सौन्दर्य-बाज़ार का चंदोवा पूरे देश पर तन गया. अब फैशन शो महज़ दिल्ली-मुम्बई-कोलकाता जैसे महानगरों के दायरे की चीज नहीं है, बल्कि बेंगलोर, हैदराबाद, अहमदाबाद, चंडीगढ़, जयपुर, लखनऊ आदि से होते हुए टूटी-फूटी सड़कों के रास्ते धूल-धूसरित कानपुर, बनारस और गोरखपुर तक अपनी चमक बिखेर रहा है. नतीजा है कि शहर और कस्बे ब्यूटी पार्लरों, डिजाइनर फैशन की दूकानों और बुटिक आदि से जगमगा रहे हैं. नख-शिख सिंगार की सैकड़ों चीजों के सैकड़ों ब्रांड दूकानों में उपचे पड़े हैं. चेहरे के दाग-धब्बे, खरोंच मिटाकर त्वचा को चिकनी और चमकदार बनाने वाली क्रीमों के साथ ही युवतियों की तरह युवकों को भी गोरा बनाने वाली  चीजें बाज़ार में बिक रही हैं. हाय हैंडसम, यह यूनी सेक्स- यूनी फैशन का ज़माना है!
बाज़ार के इस भव्य चमक-दमक भरे सौन्दर्य अभियान ने एक चीज जो पैदा की है, वह है व्यक्तित्व की एकरूपता. चाहे तो इसे एकरसता कह सकते हैं. जैसे सभी बड़े होटलों के प्रशिक्षित बावर्ची एक जैसा खाना बनाते हैं और हम चाहे दिल्ली में खाना खाएं या भोपाल-आगरा-बनारस में, सभी जगह एक ही स्वाद मिलता है - जायके में अपनी-अपनी विशेषता और विविधता नहीं होती, वैसे ही प्रायोजित और परिष्कृत सौन्दर्य के कारखाने के खांचों से एक जैसी सजधज के युवक-युवतियां कोलकाता से कानपुर तक, बनारस से बेंगलोर तक और गोरखपुर से ग्वालियर तक नज़र आते हैं. कह सकते हैं कि यह ग्लोबल फैशन की ऐसी एकरंगी और अनुकरणवादी प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्तित्व विशिष्टता और अद्वितीयता विसर्जित हो जाती है और तमाम चमक-दमक के बावजूद इकहरे व्यक्तित्व की भीड़ लग जाती है - भेड़ियाधसान पैदा होता है.
इसके बावजूद सौन्दर्य-बाज़ार का यह फैशन अभियान सौन्दर्य की सारी सीढियों को ढहा नहीं पाया है, भले ही वह ऊपर से नीचे उतरता जा रहा हो. साड़ी, सलवार-कुरता, चोली-घाघरा जैसी देसी पोशाकों का परचम आज भी फहरा रहा है. पूर्वोत्तर के मणिपुर, नागालैंड, असम, अरुणाचल की जनजातियों और देश के कई अंचलों लोगों का पारंपरिक सौन्दर्यबोध आज भी जाग्रत है और पर्याप्त आधुनिक शिक्षा-दीक्षा के बावजूद वे अपने व्यक्तित्व की वेशभूषा और श्रृंगार परक विशिष्टताओं को बड़े चाव और लगाव के साथ अपनाए हुए हैं.
आँगन के पार द्वार : आज की स्त्री के लिए यह नहीं कहा जा सकता कि सजना है उसे सजना के लिए! गहरी सौन्दर्य-चेतना के कवि जयशंकर प्रसाद का सवाल " हे लाज भरे सौन्दर्य बता दो, मौन बने रहते हो क्यों? " आज की स्त्री के लिए बेमानी है. वह लाजवंती रहकर अपना व्यक्तित्व नहीं बना सकती. अब वह अलस, मंथर,सकुचाये भावों वाली
कामिनी-भामिनी नहीं है. वह स्कूटी से फर्राटा भरते हुए कालेज जाती है, नौकरी करती है, खेल के मैदान में उसने बुलंदियां पाई हैं. इसलिए वह चंचल है, बोल्ड है. आत्मविश्वास से भरा, उद्दाम, सक्रिय, उल्लासपूर्ण व्यक्तित्व है उसका. लेकिन उसका यह आकर्षक व्यक्तित्व कर्म- सौन्दर्य से निखार पाया है - महज फैशन और सौन्दर्य के बाज़ार से नहीं !
- अरविन्द चतुर्वेद

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4 comments: on "सजना है मगर जीवन के लिए"

Udan Tashtari said...

सटीक आलेख.

संगीता पुरी said...

क्‍या कहा जाए ??

daily said...

very nice..sir ji

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