मेरे गावं की कहानी : एक

अरविन्द चतुर्वेद
समय की अपनी फिक्र होती है जो हर आदमी के चेहरे पर लकीरें खींचती रहती है। उसके विशाल परदे पर पुराने दृश्य ओझल होते हुए गायब होते जाते हैं और उनकी जगह नए दृश्य, नए चित्र उभरते हैं। क्या यह रूप-परिवर्तन ही समय-परिवर्तन है?
नहर किनारे बसे इस गांव का वृहत्तर लैंडस्केप वही है, लेकिन हरियाली घटकर आधी रह गई है। बस्ती के उत्तरी छोर पर पश्चिम से पूरब की ओर फैले आम के तीन पुराने बगीचों में से दो लगभग उजड़ चुके हैं। पुराने पेड़ साल-दर-साल कटते गए और उनकी जगह एक भी नया पौधा किसी ने नहीं लगाया। इस तरह दो बगीचे स्मृतिशेष रह गए। गांव के दक्षिण तरफ वाले ताल के भीटे पर भी पेड़ों और झाड़ियों की वह घनी हरियाली नहीं दीखती जो सहज ही अपनी ओर निगाह खींचती थी। ताल के इसी भीटे पर देर शाम के अंधियारे में सियारों का झुंड हुंआता था और जवाब में गांव के कुत्तों की मिली-जुली भूंक का मुकाबला घंटेभर चला करता था। अब ताल के भीटे नंगे हो चुके हैं और नाम भर के लिए ताल कही जानेवाली जमीन पर खेती हो रही है। यही हाल गांव के पूरब का भी है। डीह के नीचे पूरब की ओर क्रमश: एक-दूसरे से लगे पतेर, घटवन और भाठ की पठारी भूमि के बाद दिन में भी अंधेरे से घिरे रहने वाले गहरे नाले के पार नलराजा का जंगल हुआ करता था। इस समूचे वन-प्रांतर के उत्तरी छोर पर पूरब से पश्चिम की ओर बहने वाली कर्मनाशा नदी के दोनों किनारे धवई, साखू, तेंदू, जिगिना और महुआ के बड़े घने और झंखाड़ वृक्षों से लदे-फंदे थे। इन्हीं वृक्षों के बीच-बीच में पीपल, बरगद और गूलर के भी कुछ पेड़ थे जिन पर काले मुंह और लंबी पूंछ वाले हनुमान बंदरों का बसेरा हुआ करता था। वे दिनभर गूलर, पीपल और बरगद के कच्चे-पके फल खाते और प्यास लगने पर कर्मनाशा का ठंडा पानी पीकर यहां से वहां तक धमाचौकड़ी मचाते। कभी पलाश के छोटे-बड़े पेड़ों से भरे अब इस समूचे पठारी इलाके में जंगल नहीं, जंगल की याद भर बची है। बंदर-सियार कहां चले गए, कोई नहीं जानता। जंगल विहीन पठार पर कर्मनाशा विधवा की सूनी मांग की तरह खिंची हुई है। गांव के पूरबी छोर पर खेतों के पार सरकारी पटूटे की जमीन पर उत्तर से दक्षिण दलितों की नई बस्ती बस गई है। इस बस्ती में बंसवारियां खूब हैं। दलितों के इर्दगिर्द ही दक्षिणी छोर पर चेरो जनजाति के दर्जन भर परिवार बसे हैं। बंसवारियां उनके घरों के आसपास भी हैं। ऐसा लगता है कि इस गांव के मूल निवासी यही चेरो आदिवासी ही हैं जिनके आधार पर गांव का नाम चेरो कोना-चेरो कोनवां-चरकोनवां हुआ होगा। इस बात की पुष्टि गांव के बीच वाले बगीचे में स्थापित ग्रामदेवता चेरो बाबा से भी होती है, जो गांव की सभी जातियों द्वारा पूजित हैं। यों गांव में प्रमुखता चौबे यानी चतुर्वेदी ब्राह्मणों की है जिनका पारंपरिक पेशा पूजा-पाठ और पुरोहिताई वगैरह नहीं है, सभी खेतिहर किसान हैं और 90 फीसदी से भी ज्यादा जमीनें इन्हीं की हैं। गांव की बाकी आबादी खेतमजूरी करती है। इन ब्राह्मणों का पुरोहित एक शुक्ल परिवार है, जिसने दो भाइयों में बंटवारे के बाद गांव की पुरोहिताई भी दो हिस्से में बांट रखी है। यों खेतीबारी यह परिवार भी करता है।
इस गांव का अतीत बीसवीं सदी के आरंभ में कुछ ऐसे हादसों से होकर गुजरा कि उनसे जो लकीरें खिंच गइं और उनकी जो छाया पड़ी, वह वक्त के तमाम गर्द-गुबार के बावजूद आज भी महसूस होती है। जैसे कि पड़ोसी गांवों के लोग सुबह-सुबह इस गांव का नाम लेना पसंद नहीं करते। चरकोनवां’ न कहकर चौबेगांव’ या फिर कलहवा गांव’ कहकर सम्बोधित करते हैं। कहते हैं कि सबेरे-सबेरे इस गांव का नाम लेने से उस दिन ठीक से खाना नहीं मिल सकता...
जारी
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1 comments: on "मेरे गावं की कहानी : एक"

deepa srivastava said...

bahot acha likha sir,ganv se poudhe aur unki yaaden sb khatm hoti ja
rhi hai.mgr kisi ko ye dikhai nahi deta.poudhe ki baare me koi socta hi nahi.

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