गाँव कहानी/आठ : वनरक्षक मुच्छड़ तिवारी

अरविन्द चतुर्वेद :
पुजारी बाबा बोले- हम लोगों के लड़कपन में कर्मनाशा के जंगल में घों-घों करते सूअर, भालू और तेंदुआ का बराबर डर बना रहता था। एक बार तो बाघ भी आ गया था। पहली बार विजयगढ़ के राजा साहब का मचान नलराजा के नाले के किनारे गूलर के पेड़ पर बांधा गया था। तीन गांव के लोगों ने मिलकर पच्छिम, दक्खिन और पूरब से हांका चलाया था। दिनभर हांका चला, लेकिन बाघ का कोई पता नहीं। बाघ निकला शाम को चार बजे, उसी नाले से। ठायं-ठायं गोलियां चलीं। बाघ दहाड़ कर उछला, लेकिन फिर गिर गया। नलराजा के मेले में जितनी भीड़ लगती है, उससे कम आदमी नहीं जुटे थे बाघ देखने। मैंने भी जिंदगी में वही एक बार बाघ देखा है।
- बाघ-भालू तो छोड़िए, अब साले सियार भी चिंता का कारण बन गए। लड़के-बच्चों का अकेले इधर-उधर निकलना ठीक नहीं है। बड़ा खराब टाइम आ गया है। शिव प्रसाद ने कहा।
- अरे, पहिले के जमाने में मजाल था कि कोई अकेले कर्मनाशा के जंगल में चला जाए। जाना भी होता था तो चार-छह आदमी एकसाथ निकलते थे, लाठी-डंडा, कुल्हाड़ी-टंगारी लेकर। अब तो खाली हाथ झुलाए कोई भी नलराजा तक चला जाता है। पुजारी बाबा ने कहा।
पहलू बोला- जंगल-झाड़ी रह कहां गए, यहां से वहां तक सब तो साफ हो गया। सियार रहेंगे भी तो कहां? वन नहीं है, खाली वन विभाग है।
- जंगलात वालों को जेब भरने से ही फुरसत नहीं है। बड़े-बड़े पेड़ कटवा कर खुद ही लकड़ियां बेच देते हैं और कोई जलावन के लिए भी दो-चार गटूठर सूखी लकड़ी-टहनी बीन ले तो वनरक्षक को चढ़ावा दो, नहीं तो लगाओ थाने का चक्कर। पंचम कोइरी ने कहा।
- सीधी उंगली से घी कहां निकलता है? या तो दिलावर की हिकमत अपनाओ, टाइम-टाइम पर बोतल से वनरक्षक का गला तर करो और जितनी लकड़ी काटनी है, काट लाओ, नहीं तो चौखड़ा वालों की तरह हिम्मत दिखाओ तो वनरक्षक का भूत भी झांकने नहीं आएगा। पहलू बोला।
पंचम ने पूछा, क्या किया चौखड़ा वालों ने?
- अब लीजिए, आपको पता नहीं है? किस दुनिया में रहते हैं? अरे, यह पूछिए कि क्या नहीं किया!
शिव प्रसाद ने बीच में ही बात लपक ली। बोले, पंचम को कैसे पता चलेगा, औरत की बीमारी को लेकर पंद्रह दिन से तो बेचारे बनारस में अस्पताल में पड़े थे। इसी बीच का तो मामला है चौखड़ा का, पर है बड़ा मजेदार मामला।
आप तो जानते ही हैं उधर का वह मुच्छड़ वनरक्षक तिवारी, साला है तो लम्पट आदमी, ऊपर से कड़क मिजाज भी दिखाता है। एक दिन रामकरन बढ़ई जैसे ही जंगल से जलावन की एक गटूठर लकड़ी लेकर निकला, तिवारी
ने उसे पकड़ लिया। लकड़ी भी रखवा ली और कुल्हाड़ी भी जब्त कर ली। रामकरन की एक नहीं सुनी। इसके पहिले भी तिवारी दो-चार लोगों के साथ ऐसा कर चुका था। गांव-घर की बहू-बेटियों पर बुरी निगाह भी रखता था वह। सो उस समय तो रामकरन चुपचाप गांव लौट आया। लेकिन पांच लोगों ने मिलकर एक प्लान बनाया। तीन दिन बाद सब एक साथ जंगल गए। साथ में रामकिशुन की औरत भी गई। सबने जंगल में लकड़ी इकटूठी की और अपना-अपना गटूठर भी बांध लिया। लेकिन सब जान-बूझकर प्लान के मुताबिक पीछे रह गए और रामकिशुन की औरत को आगे कर दिया। हरामी तिवारी की पहले से ही उस पर बुरी नजर थी। देखा कि वह अकेले आ रही है तो तिवारी उसके पीछे लग गया। धमका कर और साथ ही लकड़ी का लालच देकर जैसे ही उसका हाथ पकड़ा कि तभी पीछे से चार लोग आ गए। तिवारी तो एकदम से हड़बड़ा गया। बेटा की सब हेकड़ी गायब। सबने तिवारी को दबोच लिया और हाथ-पांव रस्सी से बांधकर सखुआ के पेड़ से जकड़ कर बांध दिया। रामकिशुन की औरत तो पहले ही चली आई। बाकी सबने तिवारी के कपड़े उतार कर साले की सब इज्जत उतार दी।
- एकदम से नंगा कर दिया क्या? पंचम ने पूछा।
शिव प्रसाद बोले- अरे सुनिए तो। एकदम से नंगा नहीं किया। गंजी और जांघिया में छोड़ दिया। तिवारी गिड़गिड़ाने लगा, बोला कि अब किसी को नहीं पकड़ेगा। लेकिन किसी ने नहीं सुनी, सबने अपना-अपना गटूठर उठाया और गांव चले आए। इसके घंटाभर बाद लकड़ी का गटूठर लिए उधर से निकला रामकरन बढ़ई, जैसे उसे कुछ मालूम ही न हो। हैरानी जताते हुए पूछा, अरे तिवारी जी, आप? यह क्या हुआ? कैसे हुआ, महाराज?
तिवारी क्या बोलता, उसकी हालत तो भीगी बिल्ली जैसी हो रही थी। मुच्छड़ का पानी उतर गया था। खंखारते हुए अटक-अटक कर बोला- रामकरन भाई, जरा सोचिए! मैं भी तो पेट के लिए नौकरी करता हूं। साहब साला कूकुर की
तरह जंगल-जंगल दौड़ाता है। नहीं तो क्या जंगल मेरे बाप का है या किसी से कोई दुश्मनी है?
- चलिए, रस्सी तो मैं खोल देता हूं लेकिन तिवारी जी! सब नहीं, कोई-कोई कूकुर ही कटखना होता है।
- अब भाई रामकरन, चाहे कूकुर कहो चाहे सियार, इस मुसीबत से छुड़ाओ, अब मैं इधर झांकने भी नहीं आऊंगा।
रामकरन बढ़ई ने तिवारी की रस्सियां खोल दीं। तिवारी ने जल्दी-जल्दी कपड़े पहने। रामकरन को गांजा पिलाया और जंगल के डीह बाबा की कसम खिलाई- यह बात किसी से कहना मत, बड़ी बेइज्जती की बात है।....जारी 
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2 comments: on "गाँव कहानी/आठ : वनरक्षक मुच्छड़ तिवारी"

विनय प्रजापति said...

मन भावन भाषा प्रयोग लुभावना है

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अभिनन्दन:
आर्यभटीय और गणित (भाग-2)

samatavadi said...

' जंगल हमारा-आपका है ,नीं किसीके बाप का है ’
’हमारा जंगल,हमारी लकड़ी- नाकेदार ने फिर क्यों पकड़ी’

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